Saturday, December 18, 2010

मानते हो ना....

ज्योति....................

ये तो आनंद कि आवाज़ है...... इतनी रात गए......? सब ठीक तो है.....

काका.....जरा दरवाज़ा खोल दो......कोई आवाज़ दे रहा है.

देखता हूँ....बिटिया.......अरे आनंद बाबू!!! आप इतनी रात गए...... सब ठीक है ना.....

हाँ काका....सब ठीक है.............अरे.....ये क्या......आप का तो बदन तप रहा है. ...... आप यहाँ बैठो.....मैं बुलाता हूँ....अरे बिटिया......

आनंद तुम......क्या हुआ.....?

कुछ नहीं......

बिटिया.....ये चल नहीं पा रहा था....मेरा हाँथ पकड़ कर तो अंदर आया है. बदन तप रहा है इसका....

ओहो.............तुम्हारा तो माथा तप रहा है. ....कुछ दवा ली....?

नहीं..... शाम के बाद अचानक ज्वर सा लग रहा था....चाची को मत जगाना......काका एक कप.....

हाँ.....चाय बन जाएगी....लेकिन अचानक ज्वर क्यों......काका....जरा चाय बना दोगे.....?

पता नहीं.......

क्या बात है, आनंद.......क्यों परेशान हो......? सब यहीं हैं.

ज्योति....मैं आज पहली बार अकेलपन से घबरा गया...इसलिए इतनी रात गए दस्तक दे दी. मन को साधते- साधते , कभी कभी मन डगमगा जाता है.....आज कई सालों बाद.....मैकदे चला गया.......सोचा कि अपने आप से दूर जाने का ये रास्ता भी आजमा कर देखते हैं......

तो आज आजमाया है क्या.....?

हाँ........इसलिए.....मैं अब चलता हूँ....मेरा यहाँ बैठना उचित नहीं है....मैं आज असभ्य हो गया हूँ. तुमको अपना मानता हूँ....इसलिए चला आया.....रिक्शे वाले ने भी पैसे नहीं लिए....कितनी दया का पात्र बन गया हूँ...

ऐसा मत कहो...आनंद... हर आदमी तुमको प्यार करता है.....इस गाँव में.

लो बेटा...चाय पी लो......दवा लानी है क्या.....काका ने पूंछा.

नहीं काका.....दवा मेरे पास है.

मैं आनंद को देख रही थी....ये इंसान कितना सरल और कितना क्लिष्ट है..... कितनी सहजता से कह दिया कि तुमको "अपना" मानता हूँ ......प्रेम करता है....बोलता नहीं है......तड़पता है..... शांत रहता है.....रोता है..लेकिन हंसता रहता है. ....है ना सरलता और क्लिष्टता का अनकहा संगम.

ज्योति......समय कितना हुआ होगा...मैं तो घड़ी भी पहनना भूल गया...

एक बजने में १० मिनट बाकी हैं....

ओह......तुम भी आराम करो...जाओ जा कर सो जाओ....मैं यहीं सो रहूंगा. सवेरे चला जाऊँगा.....

कितना सोच रहा है....ये आदमी. ज्वर से शरीर तप रहा है.....लेकिन मर्यादा का पूरा ध्यान है.....निराला है ये.

ज्योति.....आँख बंद होते हुए.....आनंद कि आवाज़......क्या हर बात शब्दों से बोलकर ही समझाई जा सकती है..?  भावनाओं को मैं समझा नहीं सकता......अगर भावनाएं शब्दों कि गुलाम हैं.....तो जो बोल नहीं सकते...वो प्रेम नहीं करते...?

भावनाएं  कब शब्दों कि गुलाम हुई हैं......ये वो हकीकत है जो निगाहों से बयां होती है ....आनंद.
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सवेरा हुआ....नीचे आ कर देखा तो आनंद जा चुके थे.....काका..... आनंद गए क्या....?

हाँ बिटिया ...वो तो सवेरे ६ बजे ही चला गया था......

६ बजे......

हाँ..... काफी देर तक मुझसे बात करता रहा.......रात में....

क्या कह रहे थे......शायद मैं अपने बारे में सुनना चाहती थी.

माँ.....मैं आनंद जी के घर जा रही हूँ......

क्या हुआ...इतने सवेरे क्यों.......

रात भर कि सारी कथा माँ...को सुनाई.......

अच्छा जा.....

आ ज्योति बिटिया......मालिन माँ...दरवाजे पर ही मिल गयीं.....

आनंद हैं.......

हाँ...वो पीछे आँगन मे बैठा है....

अरे ज्योति......तुम कब आईं....कल रात मे तकलीफ दी.....उसके लिए माफ़ करना.

अच्छा मैं चलती हूँ........

अरे...बैठो......

तबियत कैसी है......

पहले से बेहतर.....

आनंद....अपना भी मानते  हो.....और माफ़ी भी मांगते हो....

ज्योति.....कल अपने आप से दूर भागने कि कोशिश में फेल हो गया.... अपने आप से दूर भागा और अपने के ही पास गया. कल पहली बार मुझको लगा कि अपना मानते हो.....तो जाओ उसके पास...अधिकार है तुम्हारा और मैं चला गया. कई बार एस होता है..कि हम अपने मन मे ही दूरियां बना लेते हैं... जबकि दूसरा बाहें पसार कर हमको सीनी से लगाने को बेताब होता है.

जहनो मे दीवार ना हो तो , मिलना कोई दुशवार नहीं है.

मानते हो ना....

2 comments:

AS said...

Excellent. The message conveyed in a great way. I liked it

वन्दना said...

ज्योति.....कल अपने आप से दूर भागने कि कोशिश में फेल हो गया.... अपने आप से दूर भागा और अपने के ही पास गया. कल पहली बार मुझको लगा कि अपना मानते हो.....तो जाओ उसके पास...अधिकार है तुम्हारा और मैं चला गया. कई बार एस होता है..कि हम अपने मन मे ही दूरियां बना लेते हैं... जबकि दूसरा बाहें पसार कर हमको सीनी से लगाने को बेताब होता है.

जहनो मे दीवार ना हो तो , मिलना कोई दुशवार नहीं है.

मानते हो ना....

उफ़! ये मोहब्बत
खामोश मोहब्बत
मेरे इज़हार को
बेताब मोहब्बत
आह!कैसी ये मोहब्बत

बस अब कुछ कह नही पा रही इससे आगे सिर्फ़ इस मोहब्बत को अन्दर महसूस करने की कोशिश कर रही हूँ जिसका आपने इन्तखाब किया है ्।
देव जी, आपका लेखन सचमुच अद्भुत है मै तो कायल हो गयी हूँ।