Sunday, December 12, 2010

चलो ज़िन्दगी को मुहब्बत बना दें.......

चलो ज़िन्दगी को मुहब्बत बना दें.......

आजकल साहब बड़े मूड में हैं.........कहीं किसी  हँसीं  से तो पाला नहीं पड़ गया.........आज आनंद के साथ कई दिनों बाद घाट पर आई..... तो बिना कुछ पूंछे नाव वाले  को बुला लिया....और चल दिए.....boat-ride पर......कहने लगे कि लोग long drive पर जाते हैं.... हम आज long boat  ride पर चलते हैं.... ...लेकिन सच बोलूं.....तो मैं सपनो कि दुनिया में थी....शांत.... चारों तरफ माहौल शांत...ठंडी हवा.......और शबाब पर चांदनी.....आनंद आज पूरी तरह से गजलों के मूड में.......एक शब्द में अगर कहूँ...तो पूरा रोमांटिक माहौल.......

कुछ और बोलो......

क्या बोलूं......मैं इस माहौल को उतारने कि कोशिश कर रहा हूँ......

अगर हम कहें, और वो मुस्करा दें,
हम उनके लिए ज़िन्दगानी लुटा दें......

ज्योति.....दुआ करो...कि ये जो रिश्ता है...यूँ ही हरा-भरा बना रहे....विश्वास कि जमीन, और प्यार कि फुहारें..... कौन सा पौधा नहीं जम जायेगा......तुम ने रिश्तों को बनाने और बना कर निभाने.....कि आग में जिस तरह अपने आप को जलाया है.....वो मिसाल है...और इसिलए तो उस आग में  तप कर सोना बन गयी हो......तुम्हारी शान मे एक शेर पेश करूँ.....

इरशाद.....

तमाम जिस्म ही घायल था, घाव ऐसा था,कोई ना जान सका रखरखाव ऐसा था...
खरीदते तो खरीददार खुद ही बिक जाते, तपे हुए खरे सोने का भाव ऐसा था.

सरकार....आज इतनी मेहरबानी....? 

ये कम है. ...एक गजल तुम पे लिखूं, वक़्त का तकाजा है बहुत.....

बस करो....आनंद. मैं और सम्हाल ना पाउंगी......

मैं भूला नहीं हूँ...ज्योति......अभी एक साल पहेली ही....जो , मैं तो हादसा ही कहूंगा, तुमने और चाची ने बर्दाशत किया है.....जब रमन  आकर रहा था तुम्हारे पास....और परिणाम.....

आते - जाते हर दुःख को नमन करते रहे,
उंगलियाँ जलती रहीं, और तुम हवन करते रहे.....

इसीलिए.....मैं बहुत इज्ज़त करता हूँ.....

चाहते नहीं हो...........?

क्या....... इज्ज़त करना....?

आनंद.....कितनी आसानी से नासमझ बन जाते हो तुम......लोग कहतें हैं कि तुम बहुत सीधे हो...

वो तो मैं हूँ....देखो जी....मैं चालाक नहीं हूँ.....ये इल्जाम नहीं लग सकता मेरे उपर कि मैं चालाक  हूँ.

हाँ...ये तो है......

ज्योति....
.सच्चा  प्रेम वही है, जिसकी त्रप्ति आत्मबली पर हो निर्भर,
त्याग बिना निष्प्राण प्रेम है, करो प्रेम पर प्राण निछावर. 

आज सिर्फ आनंद को देखने का मन है......बहुत समय बाद आज आनंद ज़िंदा हुए हैं....मैं उनको रोकना नहीं चाहती नदी  कि तरह बहने दो उनको...आज ये खुल  रहे हैं.....देखतें हैं...इस खान में से मेरे लिए हीरा कब निकलता है.......

काफी देर हो गयी......भाई नाव घाट पर लगा दो....नहीं चाची....आज गाँव निकाला दे देंगी......

चलो...तुमको घर छोड़ दूँ.....

छोड़ दूँ........

तुम शब्दों के जाल में क्यों उलझाना चाहती हो मुझको.......

मैं.... शब्दों के जादूगर  तो तुम हो.......अभी तो मैं उस जादू से बाहर नहीं आ पाई हूँ....जो तुमने अभी बिखेरा है.

जादू शब्दों मे नहीं होता है....उन शब्दों को कहने वाले में होता है....लो और ये बात में किसको बता रहा हूँ...तुम तो खुद एक जादूगरनी हो...या कहूँ......


गुजरो जो बाग़ से तो दुआ मांगते चलो, जिसमे खिलें हो फूल वो डाली हरी रहे.....

सच कह रहे हो आनंद......

1 comment:

वन्दना said...

काश! ऐसा मौसम हमेशा बना रहे पतझड कभी आये ही नही
मोहब्बत क्या है और ज़िन्दगी क्या ये कभी जान पाये ही नही