Tuesday, December 7, 2010

इजहार......

ज्योति....अपने घर चली गयी. मैं उसके सवालों से नहीं उसकी मनोदशा को लेकर चिंतित था. मै उसके मनोभावों को लेकर चिंतित था. क्या मैं गलत हूँ.....? आज काफी समय बाद मेरे अंदर ये शोर मचा. वो शोर...जिसको मैं काफी समय पहले दफना चुका था. अलमारी से गरम चादर निकाल कर मै नदी के किनारे घूमने निकल गया.

ऐसा क्या हुआ...जो मुझे विचलित कर रहा है.....?

मै जिस  दौर से गुजरा हूँ...आम इंसान को तोड़ने के लिए काफी था. नहीं..... मुझे ज्योति से मिलना चाहिए.....चलो. उसीके घर चलते हैं.

क्या मैं अंदर आ सकता हूँ...........

आप......ज्योति का विस्मित सा स्वर.

हाँ...मैं..................क्यों मैं अंदर नहीं आ सकता हूँ??

आनंद .... ये तुम्हारा ही घर है......उसके मुँह से शब्द निकल गए.  यहाँ तुमको , अगर पूंछ कर आना पड़े.....तो.

अच्छा अब तो से आगे मत बोलना .....

लो बाबूजी .... काका ने एक कुर्सी रखते हुए कहा.

आता हूँ.... जरा चाची को पा लागन तो कह दूँ.

चाची राम - राम.....

अरे.... आनंद बेटा...कब आया तू? तबीयत कैसी है...अब?

अभी आ आया हूँ...चाची और तबीयत तो रानी लक्ष्मी बाई की कृपा से पहले से ठीक है.

ईश्वर की कृपा तो सुनी थी.....ये  रानी लक्ष्मीबाई की कृपा.....? ज्योति.... के चेहरे पर एक हलकी सी मुस्कराहट.

अरे...... चाची.... अब क्या बताऊँ....

लो बाबूजी पानी पी लो............

अब ठंड मे ठंडा पानी पिला दो...काका. इतने दिनों बाद तो चलने लायक हुए हैं.......फिर लिटा दो बिस्तर पर. ज्योति की डांट काका को.

बेटा चाय..पिएगा....?

चाची... जरा अदरक और तुलसी डाल देना. गले को आराम मिलेगा.

अभी लाई....

बैठो लक्ष्मी बाई......ज्योति से मेरा आग्रह.

ये लक्ष्मी बाई- लक्ष्मी बाई क्या लगा रखा है.... बैठते हुए ज्योति का विरोध.

आज बुरा लगा.... सवेरे जो मैने कहा....? मेरा प्रश्न ज्योति से.

नहीं.....

ज्योति..... जो कुछ समझता हूँ....तुमको अपना समझ कर बोल देता हूँ.... अगर बुरा लगा हो...तो मै माफ़ी......

ये क्या कह  रहे हैं......क्या इसलिए आये हो?

सच बोलूं तो हाँ.......तुम्हारे जाने के बाद काफी देर तक सोचता रहा....और मंत्रमुग्ध हो गया तुम्हारी साफगोई पर. कितनी हिम्मत कर के तुमने आज अपना दिल खोला मेरे आगे.

मुरीद तो मै हो गयी आप की....कुछ भी नहीं छुपाया आपने. मेरे सारे सवालों के जवाब दे दिए. कितना संतुलन. मैने आपकी दुखती रग पर हाँथ रखने का पाप आज किया है. बहुत अच्छा किया की आप घर आये. कम से कम दिल को तसल्ली तो हो गयी..नहीं तो आज नींद ना आती. .................बिना रुके हुए ज्योति सारी बातें कहती चली जा रही थी ..मै सुनता रहा......

लो बेटा ...चाय लो.

लाओ चाची..... आज खाने मे क्या बन रहा है.....? रोटी सब्जी.....खाना खा कर ही जाना.

जी चाची....वो बढ़ गयीं रसोई की तरफ.

शुक्रिया..... आप ने खाने के लिए कहा. ज्योति का स्वर.

अरे...भाई...मुझे भी भूख लगती है...?

आनंद ...... आप बहुत सुलझे हुए इंसान हो. मै आप को खोना नहीं चाहती.

खोना...मै भी नहीं चाहता. कई सालों से एक स्वस्थ रिश्ते की खोज मे भटक रहा था. उस खोज पर दुबारा  निकलने का साहस नहीं है.  अगर एक सवस्थ रिश्ता चाहिए... तो एक दूसरे को समझना पड़ता है.....कई बार अपने आप को छोड़ना पड़ता है. जब किसी दूसरे को स्वीकार करें.... तो उसकी हर अच्छाई और हर बुराई के साथ स्वीकार करें....तभी रिश्ता पूर्ण होता है. नहीं तो .... रिश्ते शर्तों पर बनते हैं.......

ठीक कह रहे हो आनंद..... लेकिन..जहाँ मेरा रिश्ता हुआ... वो अगर ऐसा ना सोचते हुए तो?

किसी को अपने साथ लाने के लिए पहले उसको समझो. अपने आप को लादो मत उसके उपर. पति होने के नाते , वो एक इज्ज़त जरूर  चाहेंगे....स्वाभाविक है. और एक पत्नी होने के नाते... तुम थोड़ा  सा प्रेम चाहोगी.... वो भी natural है....लेकिन.....अगर तुमको , उनको अपने साथ लाना है.....तो अपने अंदर एक flexibility जरूर रखना. जैसे बच्चे के साथ बच्चा   बन कर ही खेला जाता है..... और जब वो आप का हो जाए.....तो फिर जो उसको सीखाएँ....बोलो है की नहीं.....?

ज्योति.... ज़िन्दगी बहुत सरल है.....हम सोच-सोच कर, अपनी तरफ से किन्तु-परन्तु लगा कर उसको complicated बना देते हैं......और जब सब उलझ जाता है..... तो किस्मत और भगवान् को दोष देते हैं......बोलो.... इसमे भगवान् का क्या दोष? लो एक शेर सुनो.....

ज़िन्दगी जीने को दी, जी मैने.                                            (बोलो हाँ.... ज्योति ...हाँ)
किस्मत मे लिखा था पी, तो पी मैने.                                   (बोलो हाँ.... ज्योति ...हाँ)
मै ना पीता तो उसका लिखा गलत हो जाता,                       (बोलो हाँ.... ज्योति ...हाँ)
उसके लिक्खे को निभाया, क्या खता की मैने.                       (बोलो हाँ.... ज्योति ..... चुप)

आप भी ना....आनंद...क्या करूँ, मै आप का.

काका..... जरा चाची से पूंछो....के नाराज़ होना है तो होलें....लेकिन  क्या एक कप चाय और मिल जायेगी.

जी..... बाबूजी .... अभी लाया. आप तो वैसे भी इतने टेम बाद आये हो.

आनंद.................... आप लोगों को कैसे जीत लेते हो...?

ज्योति....मेरे बारे मैं.....जो तुम्हारे मन पर प्रभाव है उसको दूर  करो.

क्या प्रभाव..है.... हाय  राम... जरा जानूं तो.

अगर किसी को जीतना है...... तो प्यार बांटो. जहाँ तक मेरा अनुभव जाता है... दुनिया मे हर आदमी दो चीज़ों का भूखा होता है.....

वो क्या भला.......

प्यार और सम्मान....सम्मान का मतलब फूल-मालों से लादना नहीं होता है.

ठीक कह रहे हैं आप......मैं समझती  हूँ.

जो हम देते हैं- वही हमें  वापस मिलता है. ये दुनिया का, कुदरत का नियम है....प्यार दो-प्यार ही वापस मिलेगा, इज्ज़त  दो- इज्ज़त  ही वापस मिलेगी.......

कई बार ऐसा भी होता है...आनंद, की हम तो प्यार बांटते हैं, बदले में गालियाँ मिलती हैं.....अपमान मिलता है....

हाँ ये भी होता है..... लेकिन, दूसरे ने हमे साथ क्या किया...ये बाद मे आता है. हमारा  जो स्वभाव है, जो धर्म है... उस से हम तो विमुख ना हुए..... ये जरूरी है. कर्तव्य    करा...और आगे बढ़ गए. क्यों हम उसके परिणाम जानने  के लिए उससे चिपक जाते हैं... तकलीफ तब होती है....ज्योति.

जिसकी फितरत ही है डसना, वो तो डसेगा,
मत सोचा कर मर जावेगा, 
तनहा-तनहा मत सोच कर, मर जावेगा,

ये सब इतना आसान नहीं है ...आनंद.

मुश्किल भी नहीं.....हमारे उपर है...की हम सूरज की तरफ देखते हैं... या  परछाइं  की तरफ. 

अच्छा एक बात और पूंछु....

बोलो...

जिसको भी आप ने प्रेम किया....क्या उसने कभी आप का हाल-चाल जाने की नहीं कोशिश  करी...? अगर आप जवाब ना देना चाहें....तो रहने दीजियेगा.

नहीं ज्योति.....ऐसा अब कुछ नहीं है...जिससे मै विमुख हूँ. रही बात हाल-चाल जानने की..... किस के पास वक़्त है.... और किस को जरूरत है..? प्लास्टिक के ग्लास मे कोका-कोला पी कर ग्लास को हम जेब या पर्स मे तो नहीं रखते... use and throw.

आनंद...अब आगे कुछ मत बोलो..... कोई कैसे कर सकता है आप के साथ....?


कुछ तो मजबूरियां रही होंगी,
यूँ ही कोई बेवफा नहीं होता....... खैर छोड़ो.....इन बातों को. मेरा जवाब.

अभी भी आप उसके पक्ष मे बोलते हो......

पगली... ये प्रेम है....कोई चुनाव का मैदान नहीं जहाँ पक्ष और विपक्ष हो.

चाची...... पेट में चूहे दौड़ रहे हैं.......

बस बेटा ....... लगा रही हूँ.....

क्यों झूठ बोल रहें हैं........घर में तो चाय और चुरुट से पेट भर जाता है.....माँ को खुश कर रहे हैं...?

ज्योति....अगर उनको इस बात से ख़ुशी मिल रही है.... तो इसमे कोई नुकसान तो नहीं है?

आनंद...किनती छोटी छोटी बातों का ध्यान रखते हो आप....?

पागल.... ये बाते ध्यान रखने वाली नहीं हैं........हम बड़ी बड़ी खुशियों की तलाश मे , छोटी छोटी खुशियों को नज़रंदाज़ कर जाते हैं......जो हमारे चारों तरफ बिखरी पड़ी हैं......

लाओ चाची...वाह....मूली के पराठे और मेथी का साग......साथ में अदरक की चटनी.... चाची ... तुझे सलाम.

बस कर कर.... चल खा....

और रानी लक्ष्मी बाई की थाली......?

ला रहीं हूँ...उसके लिए भी.

आप जानते हो...आनंद मुझे सबसे बड़ी चिंता किस बात की है...? जब में  चली जाउंगी.... दूसरे घर..तो आप की देखभाल कौन करेगा? आप तो मुँह खोलोगे  नहीं....?

बस चाची .... और नहीं......दो दिन का खाना खा लिया, आज.

सांप हैं क्या आप?

लो सुन लो चाची क्या पूंछ रहीं हैं..... आप की बेटी.

क्या.....?

पूंछ रहीं है की क्या मैं सांप हूँ....?

हाय  राम.... क्यों?

अरे माँ.... सांप जाड़ों मे एक दिन मे इतना खा लेता है की फिर ३- ४ दिन की फुर्सत.

चाची समझा लो बिटिया को......... कहीं डस लिया तो अनर्थ हो जायेगा......

तो डस लो..... डसो तो सही....

मे ज्योति के चेहरा देखता रह गया.

चलो अपना लड़ाई-झगडा खुद ही निपटाओ.

अच्छा चाची... अब चलता हूँ.....

ठीक है  बेटा... आते रहना.

जी... चाची से विदा लेकर मैं बाहर निकला ... ज्योति दहलीज तक आई......

अच्छा .... अब इज्ज़ाज़त  दो.....

आनंद....... ...........

बोलो........

............कुछ नहीं......

उसकी झुकी हुई नज़र.....एक नाज़ुक सी मुस्कराहट सब कह गयी......

इजहार......

6 comments:

वन्दना said...

इज़हार कब शब्दो का मोहताज़ हुआ है
ये जज़्बा तो नज़रों से बयाँ हुआ है

अब और कुछ कहने की जुबाँ ने इजाज़त नही दी
कुछ लफ़्ज़ पढे, लगा तुम्हें पढा और खामोश हो गयी

वन्दना said...

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (9/12/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा।
http://charchamanch.blogspot.com

Rashmi savita @ IITR said...

अगर किसी को जीतना है...... तो प्यार बांटो. जहाँ तक मेरा अनुभव जाता है... दुनिया मे हर आदमी दो चीज़ों का भूखा होता है.....

वो क्या भला.......

प्यार और सम्मान....सम्मान का मतलब फूल-मालों से लादना नहीं होता है.
really true

Rashmi savita @ IITR said...

अगर किसी को जीतना है...... तो प्यार बांटो. जहाँ तक मेरा अनुभव जाता है... दुनिया मे हर आदमी दो चीज़ों का भूखा होता है.....

वो क्या भला.......

प्यार और सम्मान....सम्मान का मतलब फूल-मालों से लादना नहीं होता है.
really true

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति ....

सत्यम शिवम said...

बहुत ही बेहतरीन रचना...मेरा ब्लागःः"काव्य कल्पना" at http://satyamshivam95.blogspot.com/ आप आये और मेरा मार्गदर्शन करे....धन्यवाद