Sunday, December 12, 2010

Beyond Time......A new Experiment-2

आज काफी हल्कापन है.....आज मदहोश हुआ जाए रे...मेरा मन, मेरा मन. मेरा मन ......आज काफी दिनों  बाद धूप निकली...बर्फ पिघली....पर्वतों से भी... और रिश्तों की भी. कल ज्योति से जो बात हुई...उसने गलतफहमियों के जो बादल...एक रिश्ते पर ग्रहण की तरह छा रहे थे.....दूर हो गए......आपस की समझदारी से......और बात करने से...यूँ तो मैने देखा है....की चुप रहने से भी....इंसान काफी मुश्किलों से बच सकता है....लेकिन जब जरुरी हो.....तो बात करना भी जरुरी है..... वो एक कहवत है.....कि " मछली भी तभी मुसीबत मे पड़ती है, जब मुँह खोलती है" ....खैर...अंत भला तो सब भला......

मालिन माँ......आज जरा मटर का पुलाव बना दे.......

क्या.....क्या ...जरा फिर से बोल..........आज तूने कोई फरमाइश करी है खाने कि..........बेटा तबियत तो ठीक है, ना........आज बड़ा चहक रहा है...बेटा....

...... 2 लोगों के हिसाब से खाना बना दे माँ.......

क्यों....लड़की वाले आ रहे हैं क्या......मालिन माँ ने चुटकी ली......

अरे.............नहीं....... ज्योति से मैने कहा है....कि आज यहीं खा ले.....

लो....इसमे क्या नई बात है.....ज्योति बिटिया तो बनवा के भी खा लेती है......

अच्छा....अब पुलाव बना दे....और जब तक पुलाव बनता है....एक कप चाय दे दे....

अच्छा......

आओ ज्योति.....अरे वाह......किधर हो....

क्या  मतलब....

अरे... गुलाबी रंग में गुलाबी रंग दिखाई नहीं दे रहा था...इसलिए पूंछा....अच्छा  किया काजल लगा लिया.....

जाने किस किस कि मौत आई है,
आज रुख पे कोई नकाब नहीं......

हाय.....सदके जावाँ.....जान ले लो.

कितनी चमकदार धूप है.....ना. वो देखो मेरे बाग़ में गुलाब कितना इतरा रहा है...और डहेलिया तो जैसे कह रहा है...कि हम किसी से कम नहीं......गेंदा.........जाओ जरा गुलाब के बगल में खड़ी हो तो.......

क्यों...........अरे  जाओ तो............

लो...........अब बताओगे क्यों.......मैं  देख रहा था....कि ज्यादा सुंदर कौन है.

ओहो......तुम भी ना आनंद.............सातवें आसमाँ में बिठा देते हो.

सातवाँ......खैर......चाची कैसी हैं......

ठीक हैं....अच्छी हैं......खुश हैं......

सब मालिक की कृपा  है और सब पर मालिक की कृपा है......

एक खूबसूरत रिश्ता...जो कुम्हलाने लगा था....फिर से खिल गया  है....ज़िन्दगी कितनी सुंदर हो जाती....जब एक दूसरे को समझकर जी जाती है.....और एक दूसरे की लिए जी जाती है.....जहाँ प्रेम तो है....लेकिन जिस्मों से परे है.....जहाँ पर विश्वास है.....लेकिन  शर्तों पर टिका हुआ नहीं है.  जहाँ शक नहीं...विश्वास की जमीन हो...वहाँ प्रेम मर नहीं सकता. जहाँ पर अपने से ज्यादा दूसरे की चिंता हो..वहाँ स्वार्थ टिक नहीं सकता....जहाँ...दूसरे के दर्द में.....खुद की आंखे भीग जाती हों...वहाँ.....प्रेम ही हो सकता है......

ज्योति.....कल राघव का पत्र आया था.........राघव,  ज्योति का एकलौता भाई है....और शहर में नौकरी करता है....नैना उसकी बिटिया का नाम है.....

आप के पास भी आया......? कल मेरे घर भी आया . नैना की पहली सालगिरह है.....हाँ...बुलाया है.....

तुम कब जाओगी..........

तुम....मतलब.....क्या आप नहीं जाओगे.....? नहीं मैं जा नहीं पाउँगा......

खैर....मैं कारण नहीं पूछूंगी   .....नहीं तो तुम फिर मुझे समझा दोगे और मैं समझ जाउंगी......मेरे साथ यही तो एक कमजोरी है.......तुम मुझे कुछ समझाते हो....मैं तुरंत समझ जाती हूँ.......आनंद हँस पड़े. ....अच्छे लगते हैं...जब ठहाका  मार कर हंसते हैं.......हंसते कम ही हैं.

अरे नहीं.....ऐसी कोई बात नहीं है.....सुनो....ये ५०० रुपए रख लो....नैना बिटिया के लिए कुछ खरीद कर लेती जाना.

जी...जैसा हुक्म....

खाना लगा दूँ......मालिन माँ....ने पूंछा. ....ज्योति बिटिया.....कैसी है....? चाची कैसी हैं...?

दोनों ही ठीक हैं.....ज्योति का दो प्रश्नों  का एक उत्तर.

ये ले बिटिया...थाली पकड़.    और ये तू ले बेटा......

मटर पुलाव.......????? ज्योति का विस्मित होते हुए प्रश्न......क्या बात है....मालिन माँ....आज तो दावत कर दी आपने....

मेरा क्या...बिटिया....आज आनंद की फरमाइश थी......और वो ६-६ महीनी मे एक बार होती है.....सो पूरी करनी पड़ी.....

अच्छा सुन बेटा....ये ५० रुपए ले कर जा रही हूँ.....शाम को सब्जी लेती हुई आउंगी.....

ठीक है......

कल रात कितने बजे पहुंचे.....

१०:३० या १०:४० होंगे.......आजकल नींद और आखों के बीच की अठखेलियों ने दुखी कर रखा है......कल रात भी २ बजा दिया....नींद ने आते....आते....मैने नींद से कहा अब तो आखिरी  बस भी आ गयी....अब तो आ जाओ....तब कहीं आईं........

कुछ लिखा क्या...नया.

हाँ....

दिखाओ तो.....

तुम्हारी हर कहानी में दर्द क्यों होता है.........

क्यों हर प्रेम कहानी मे दर्द ही होता है......अगर दर्द ना हो तो प्रेम नहीं है......बोलो तो .....

और मैं कोई साहित्यकार या कवि तो हूँ नहीं.......जो कल्पना के पंख लगा कर उड़ जाऊं.....और स्वप्न लोक में विचरण कर वापस जमीन पर आ जाऊं.....मैं जो महसूस करता हूँ.....जो देखता हूँ...जो मुझपे गुजरती है....लिखता हूँ.

हूँ......

हूँ...तो ऐसे बोल रही जैसे सब समझ मे आ गया हो.........

क्यों....क्यों नहीं समझ सकती मैं........मैने भी तो प्रेम किया है.....दर्द मैं समझती हूँ.

1 comment:

वन्दना said...

मोहब्बत को कब जुबाँ की जरूरत महसूस हुयी है
ये हकीकत तो नज़रो से बयाँ हुयी है

मोहब्बत दिल हल्का भी कर देती है और भारी भी…………कितने सुहाने होते है मोहब्बत के मंज़र्।