Saturday, January 29, 2011

कुछ अनकही....

आज शाम बड़ी ठंडी हवा चल रही है.....मंदिर में कोई नहीं है.....पंडित जी किसी पास के मंदिर में कथा बांचने गए हैं.....और मुझ जैसे नास्तिक को मंदिर की देखभाल करने का कह गए हैं.....मंदिर के बाहर पोखरे में तैरते हुए आरती के दिए....कैसे जगमगा रहे, झिलमिला रहे हैं.....लगता है इस गाँव मे हर दूसरे दिन कोई त्यौहार होता है....एक मन कहता था की तुम भी आज मंदिर आओगी...लेकिन एक मन कहता था की तुम नहीं आओगी...क्योंकि तुम शुरू से ही मंदिर कभी पूजा करने के लिए तो गयी नहीं हो......

तुम जानती हो तपस्वनी...जिस दिन तुमने अंजलि के हाँथो रोटी और सब्जी भिजवाई थी....वो क्या बोली मुझ से.....कहने लगी " बाबा...ये लो मेरी दीदी ने आप के लिए भिजवाई है ये रोटी और सब्जी."...मैने पूंछा की कौन सी दीदी हैं....तो कहने लगी की वो शायद  आप को जानती हैं.....मैने पूंछा कैसे ...तो बोली...की जब मैने दीदी को बताया की आप ने कुछ खाया नहीं...तो वो नाराज़ हो गयीं......और कहने लगी की क्या करूँ में उनका.......शुरू से ही ऐसे हैं....बाबा...आप दीदी को जानते हैं क्या...? मैं उस बच्ची को क्या जवाब देता.....बोलो तो.

तपस्वनी....आजकल शरीर साथ नहीं दे रहा है.....रह-रह के ज्वर आ जाता है. परसों तुम मंदिर आई थीं..तुम्हारे साथ एक सज्जन भी थे....संभवत: तुम्हारे पति थे.....अच्छा लगा तुम दोनों को देख कर. तुम उस नीली साड़ी में ऐसी लग रहीं थीं....कोई परी उतर आई हो.....और गले में सफ़ेद मोतियों की माला. ....में थोड़ा संकोची स्वभाव का हूँ...इसलिए सामने ना आ पाया.....माफ़ करना...तुम बरगद के पेड़ की तरफ भी आईं थीं...लेकिन मैं वहाँ पर नहीं था....बाद मैं पता चला की तुम और तुम्हारे पति , इस मंदिर के managing trustee भी हो. .....अच्छा है..राधा यहाँ भी कृष्ण की देखभाल कर रही है.

रात के नौ बज गए हैं...पंडित जी अभी तक आये नहीं हैं......सब जा चुके हैं.....सब शांत....दिए अभी भी टिमटिमा रहे हैं....आज मंदिर में बहुत चढावा आया है...  सब कुछ वहीं कृष्ण के चरणों में रख दिया....पता नहीं क्यों...तपस्वनी...अब मन इस ज़िन्दगी से हट गया है....और दूसरी दुनिया में जाने को उतावला हो रहा है....तुम उस दिन जब मुझसे से मिली....तो तुम्हारे अंदर  भी मैने निर्लिप्तता का भाव महसूस किया. कैसे तुमने अपने अंदर २२ सालों से उस आग को जिन्दा रखा....जलती हुई शमा पर तो कई पतंगे कुर्बान हो जाते हैं...लेकिन तुम ने तो अपने आप को कुर्बान कर दिया...वो भी उस शमा पे जो कोई देख नहीं सकता....जो दिल के अंदर जलती रहती है...हर वक़्त, हर समय....

पंडित बाबा भी कई दिनों से कुछ कहना चाह रहे हैं...वो मेरा पास आते भी हैं, बैठते भी है....लेकिन वो नहीं कह पा रहे हैं, या पूंछ पा रहे हैं.....जो वो कहना या पूंछना चाहते हैं....मैं समझ रहा हूँ.....मुझे भान है इस बात का कि वो समझ रहे हैं कि इस फ़कीर कि तपस्वनी कौन है....तुमको वो अपनी बेटी मानते हैं....बहुत तारीफ़ करते हैं....अच्छा लगता है.....गाँव के लोग अब भी कितने सीधे होते हैं ना.....तपस्वनी.

मैं तुम्हारी तरफ से चिंतित रहता हूँ.... तुमको दिवाली के दिन  देखा था....मुँह कुछ और बोलता है और आंखे कुछ और....क्या तुम्हरे चारों तरफ कोई ऐसा नहीं जो तुमको जो तुम हो वो स्वीकार कर सके....लो पंडित जी आगये...और अंजलि भी.

आइये बाबा.....कैसा रहा आज का प्रवचन.

कैसा प्रवचन बेटा...वो तो ज्ञानियों का काम है. हम तो प्रेमी हैं......हम तो राधा और कृष्ण कि प्रेम कथा ही सुना सकते हैं.

मैं चुप...

बेटा.....इस मंदिर कि जो देखभाल करते हैं....उन्होंने एक दिन खाने पर बुलाया है...चलेगा...?

मैं क्या करूंगा जाकर....?

चल...मिल ले. " तुलसी इस संसार में सब से मिलिए धाये, ना जाने किस वेश मे नारायण मिल जाए."

वो तो ठीक है..बाबा..लेकिन...पंडित जी मेरी कशमकश को समझ रहे थे.

मैं तो उनको जानता नहीं.....ना वो मुझे.

क्या पता बेटा.....किस का किस से किस जन्म का नाता हो.....राधा बिटिया ने कहा है कि फ़कीर को भी ले कर आना , बाबा. ....और तू नहीं जानता कि वो कितनी जिद्दी है.....

हाँ बाबा...मै क्या जानूं....लेकिन आप तो जिद्द ना करो. .....लो अंजलि चाय ले कर आ गयी....लो बाबा चाय पियो...तुमको तो शाम से चाय नहीं मिली होगी.....? कितना ध्यान रखते हैं ये लोग........सब तुम पर गए हैं क्या....तपस्वनी.

तो तू नहीं जाएगा....

नहीं बाबा...मुझको माफ़ करो....मेरी तरफ से उनसे भी माफ़ी मांग लेना.

मैं जानता हूँ तपस्वनी तुम को गुस्सा तो बहुत आया होगा मेरे ना आने पर...लेकिन सिक्के का जब तुम दूसरा रूख देखोगी तब तुम मुझे माफ़ कर दोगी.

मिलना था इत्फ़ाक, बिछडना नसीब था

वो इतनी दूर हो गया, जितना करीब था....

कुछ अनकही....

1 comment:

वन्दना said...

कहानी अपनी कसक के साथ सुन्दरता से बढ रही है।