Thursday, January 20, 2011

दहलीज

नहीं है तुमको इजाज़त दहलीज पार करने की,
मत जिद करो, देखो मान भी जाओ,
जब तुम दहलीज पार करते हो,
मेरे उपर रुसवाई का एक पर्दा पड़ जाता है....
तुम अपने घर में ही रहो,
क्यों घर से बाहर जाना चाहते हो,
बाहर की दुनिया तुम्हारी अहमियत नहीं समझती,  
देखो खुल कर मैं नहीं समझा  सकता,
क्योंकि, तुम एक आंसू हो और मैं एक पुरुष.....
तुम जानते हो ना तुम्हारी दहलीज,
मोती बन कर बसो, वहीं रहो.
पुरुष की आँख में और आंसू.....
जरुर घडियाली होंगे....दुनिया है कुछ भी कह सकती है...




2 comments:

वन्दना said...

क्योंकि, तुम एक आंसू हो और मैं एक पुरुष.....

बहने दीजिये ना……………क्यों रोक रहे हैं …………दुनिया का क्या है कैसे भी नही जीने देगी……………बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति।

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

'duniya hai kuchh bhi kah sakti hai '

bhavporn ...
sundar.........rachna .