Saturday, January 29, 2011

मानो या ना मानो.

मेरा परिचय भी तो तुम्ही ने मुझसे कराया था....नहीं मैं तो टुकड़ों में बँटी हुई ज़िदगी जी रहा था....मैंने अपनी ज़िन्दगी जी ही कब.....जब तुमने अपने आप को मुझको दिया...उस समय मैं ये सोच रहा था कि मेरा कौन सा टुकडा तुमको स्वीकार करे....बहुत मुश्किल होता किसी कि उपरी परत को चीर कर उसके अंदर जाना.....और फिर वहाँ से उसको पहचानना. किस के  पास इतना वक़्त है..... प्रेम भी तो घड़ी कि सुइयों के हिसाब से होता है......पता नहीं वो प्रेम होता है....या अग्नि की शांति.....प्रेम तो चोबीसों घंटे ता उम्र का होता है...ऐसा बड़े बुजुर्ग सिखा गए हैं.....और तुम जानती हो तपस्वनी....प्रेम भी आजकल कर्तव्य समझ कर होता है.....प्रेम के लिए प्रेम कहाँ होता है......वो बिरले ही होते हैं...जो प्रेम करते हैं, क्योंकि वो प्रेम करते हैं.

कल रात बहुत तेज तूफ़ान था.....हवा, बारिश और बिजली तीनो ने ही हंगामा मचा रखा था....पंडित जी, मैं और अंजलि मंदिर के बरामदे मैं बैठे हुए प्रक्रति का ये अद्भुत नज़ारा देख रहे थे.....और हम तीनो को उसको देखने का नज़रिया अलग था......अंजलि डर रही थी.....जब हवा की तेजी से बरगद का वो विशाल पेड़ लहरा रहा था, पंडित जी अपने कृष्ण की कृपा मान...सब कुछ देख रहे थे..और किसी का अनिष्ट ना इसकी प्रार्थना कर रहे थे....और मैं..अपनी तपस्वनी को देखने की ख़ुशी मैं...इसे प्रक्रति का उपहार मान रहा था.

कल दोपहर, तुम्हारे पति पंडित जी से मिलने आये थे. शायद मंदिर मे ३-४ कमरे बनाने का प्रस्ताव था. ताकि....जो लोग बाहर से आते हैं...उनके रुकने का बंदोबस्त हो सके. मुझसे भी दुआ-सलाम हुई. पंडित जी ने मेरा परिचय कराया....तुम्हारे पतिदेव ने मुझसे प्रश्न किया कि इस उम्र में संन्यास.....क्या कहीं आप अपनी जिम्मेदारियों से भाग तो नहीं रहे हैं. तुम्हारे पति के इस सीधे प्रश्न ने मुझे बहुत प्रभवित किया. सीधा सवाल, सीधे आदमी से....तुम समझ रही हो ना....सीधा सवाल , सीधे आदमी से.

मैने पूंछा कि ये आप कैसे कह सकते हैं कि मैं जिम्मेदारी से  भाग रहा हूँ..ये भी तो संभव  है कि मैं कोई जिम्मेदारी निभा रहा हूँ.....कोई ये कैसे तय कर सकता है कि अमुक आदमी जिम्मेदारियों से भाग रहा है या उनको निभा रहा है....

नहीं , नहीं.....इतनी कम उम्र मैं आप फ़कीर बन गए..इसलिए जिज्ञासावश पूंछ लिया....अगर आप को बुरा लगा तो माफ़ी चाहता हूँ.

अरे नहीं...भाई माफ़ी मांग कर मुझे लज्जित ना करिए....आप का प्रश्न बिलकुल स्वाभाविक है...और मैं इसका स्वागत करता हूँ. देखिये हम सब समाज का हिस्सा हैं....और जिस समय हम किसी के प्रति अपने कर्तव्य का पालन कर रहे होते  हैं....संभव है कि उसी समय हम किसी दूसरे कर्तव्य से विमुख हो रहे हों.....तो क्या ये जिम्मेदारी से भागना होगा....?

नहीं....

तो फिर ऐसी situation मे क्या करना चाहिए....?

Priorities fix करके अपनी ड्यूटी निभानी चाहिए.

exactly ....मैं इस वक़्त वही कर रहा हूँ. समाज, परिवार इन सब के बीच रहते हुए...हम ये क्यों भूल जाते हैं कि हमारी अपने प्रति भी कोई ड्यूटी है.....ये स्वार्थ या कोई selfish approch नहीं है...मेरा ऐसा मानना है....अगर मैं आप को किसी चीज़ के लिए convenience करना चाहता हूँ, तो पहले मैं तो convenience हूँ. या अगर मैं ख़ुशी बांटना चाहता हूँ, तो पहले मेरा खुश होना या खुश रहना जरुरी है..नहीं तो वो एक दिखावा होगा, छल होगा....और हम सब इसी छल में अपनी ज़िन्दगी गुजार देते हैं.... और दोष भगवान् के नाम. जिस तरह से हम अपनी ज़िन्दगी जीते हैं, तो हम दूसरों को भी तो उनकी ज़िन्दगी जीने दें.......जैसे वो चाहते हैं....क्यों हम लोग.....अपनी बेनामी शर्तें लगा देते हैं....   

Yes , I agree with you...तुम्हारे पति का जवाब. इसलिए मैं तो अपने परिवार के सदस्यों को पूरी स्वतंत्रता देता हूँ.

अरे.....please do not take  it personal. मैं तो एक आम सी बात कह रहा हूँ. .....जिसको हम अपने हिसाब से स्वतंत्रता कहते हैं...क्या ये संभव नहीं कि वही दूसरे के हिसाब से दासता हो.....जेल के अंदर कैदी भी तो आज़ाद होता है.....हम दूसरे कि स्वतंत्रता को अपने परिप्रेक्ष्य में क्यों देखते हैं....

पंडित जी...इस वार्तालाप को बड़े ध्यान से सुन रहे थे....और हर बात को अपने अनुभव कि कसौटी पर तौल रहे थे...ये में उनके हाव-भाव से जान सकता था. तपस्वनी....पिछले  कई दिनों से जब से तुम मंदिर आ रही हो...मैं तुमको देख रहा हूँ.....जितनी जेवरों से तुम लदी रहती हो.....ऐसा लगता है....कि किसी लक्का कबूतर को सोने से लाद दिया गया हो...सिर्फ उड़ने  कि मनाही  है.....

May I leave now with your permission ....तुम्हारे पति ने बड़े अदब के साथ मुझसे पूंछा.

Sure .... it was a pleasure to meet you . और मैं क्या कहता..उनके अदब का मैं कायल हो गया.

तपस्वनी...ज़िन्दगी तुम्हारी है....इसको जियो..जैसे तुम चाहती हो....इस पर अधिकार किसी का है तो सिर्फ जानकी नंदन का. अगर तुम किसी कि उत्तरदाई  हो तो सिर्फ उनकी.....मेरा मतलब ये नहीं कि बगावत कर दो...लेकिन ज़िन्दगी जियो.....तुम जब अपनी ज़िन्दगी जीती हो.....मैं भी ज़िन्दगी जीता हूँ....मानो या ना मानो.  

3 comments:

वन्दना said...

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (31/1/2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
http://charchamanch.uchcharan.com

वन्दना said...

रोचक प्रस्तुतिकरण्।

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

bahut rochak evam sundar prastuti.