Saturday, January 8, 2011

जाने क्यूँ....2

कहीं ऐसा तो नहीं है...हर्ष की प्रार्थना ने तुम्हारा प्रेम आग्रह.....स्वीकार नहीं किया इसलिए तुम ऐसे हो गए हो.....

नहीं ज्योति.....प्रेम किसी पर थोपा तो नहीं जा सकता......मान लो की तुम किसी को प्रेम करती हो.....अब ये कोई प्रेम का नियम तो नहीं है की वो भी तुमको प्रेम करे..........मुझे तकलीफ इस बात से हुई जब...उनके लेखनी, उनके विचारों...मे मुझे एक gap  दिखा.....जिसको, प्रार्थना ने स्वीकार भी किया...यहाँ पर उसकी ईमानदारी की मैं तारीफ़ भी करता हूँ....

तो तुम परेशान क्यों हुए......

मैं परेशान हुआ....ज्योति..जब कथनी और करनी में अंतर दिखा....मैं ऐसा नहीं हूँ.

हर आदमी एक जैसा नहीं होता हर्ष.........ज्योति और हर्ष के बीच चल रहे इस संवाद का मैं पूरा आनंद ले रहा था.

तो क्या लेखक की  समाज के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं है....अब मेरा दखल देना लाजमी हो रहा था.

हर्ष....जैसे मैं पहले भी तुमको समझा चुका हूँ....की हर लेखक समाज के लिए नहीं लिखता...कुछ लिखना है, इसलिए लिखतें  हैं....तुम प्रार्थना से प्रेम करते हो....तो करो.....क्योंकि सच्चा  प्रेम तो मुँह से निकले शब्द और कमान से निकले हुए तीर की तरह है....जो वापस नहीं आता. रही बात multiple  characters  की.... तो वो उनकी खुद की समस्या है.....हाँ ये जरूर है की जब तो वो इस समस्या से अच्छी तरह से निकल  ना जाएँ....   तब तक जो उनके करीब हैं...वो परेशान होते हैं...लेकिन प्रॉब्लम तो ये है की कभी कभी उनको ये लगता ही नहीं....की multiple personality या multiple characters एक हद तक पहुँचने के बाद एक बीमारी भी बन जाती है....जिसे medical terms मे personality disorder कहते हैं. 

मैं तुमको १०० रूपये का एक नोट दूँ और १०० रुपए के सिक्के....तो तुम किस को लेना पसंद करोगे....

१०० रुपए का एक नोट.....

क्यों....

कौन १०० रुपए के सिक्के जब मे रख कर घूमेगा..

yes ..... इसी तरह multiple personality को जीने से अच्छा है....एक किरदार को जीना...लेकिन ये बात मेरे या तुम्हारे समझने से solve नहीं होगी.....ये तो तब होगी जब इसको जीने वाला किरदार....इस बात को समझ ले....और अपने आप को ढूंढ कर निकाले.....

आनंद...तुम भी दार्शनिक हा गए....हो.....कहीं संसार से विरक्ति तो नहीं हो रही है....ज्योति की चुटकी....

हाँ...संगत का असर तो होगा ही....मेरा जवाब.

चलो...खाना लगा दिया है....मालिन माँ का आदेश.

चलो....खाना खा लें..नहीं तो मालिन माँ......

भाईसाहब एक बात बोलूं.....

आज्ञा है.....

जो आके रुके दामन पे सबा, वो अश्क नहीं है पानी है,
जो अश्क ना छलके आखों से उस अश्क की कीमत होती है....

मैं तो प्रार्थना से प्रेम करता हूँ. ...उसकी मर्जी वो जाने.....जाने क्यूँ....

अब इसके आगे सुनो....

ऐ-वाइज़े नादाँ करता है, तू एक कयामत का चर्चा ,
यहाँ रोज़ निगाहें मिलती हैं, यहाँ रोज़ कयामत होती है.......ये शेर ज्योति की नज़र...         

इति.

2 comments:

वन्दना said...

देखा अपने गुमान लगाने लगे सभी ……………होता है ऐसा जब हम कुछ थोडाबहुत सुनकर ही किसी के बारे मे अपने विचार बना लेते हैं……………जबकि वहाँ समस्या होती ही नही…………क्या पता क्या कारण हो प्रार्थना का जो वो नही स्वीकार करती हो हर्ष का प्रेम और ना ही अपने बारे मे ज्यादा बताती हो…………तो क्या सिर्फ़ अपने अनुमान से ही हम किसी को बिमारी ग्रसित बना सकते हैं……………वाह! ये तो कमाल कर दिया खुद ही डाक्टर बन गये ………………देव साहब ज़िन्दगी बहुत बडी है पता नही किसकी क्या समस्या हो……………लेकिन कहानी को यदि आप कहीं और ले जा रहे हों तो बात अलग है ……………आप करेक्टर को बीमार दिखाकर पाठको मे एक उत्सुकता पैदा करना चाह रहे हो तो अलग बात है ……………क्योंकि होने को तो कुछ भी हो सकता है किसी के भी साथ्…………ये सिर्फ़ मेरा दृष्टिकोण है एक नारी के प्रति हो सकता है दूसरो का न हो इसलिए उम्मीद करती हूँ आज पहली बार की गयी आलोचना से आप व्यथित नही होंगे …………ये सिर्फ़ एक स्वस्थ चर्चा है…………।

Puneet said...

dev shab
likhte toaap khoob hai he insaan bhi kum achhey nahi hai.. jis khoobi se aapney prarthna aur harsh k bare mein likha ye bat mere dil ko choo gayee.
har ek harsh k dil mein ek prarthna hoti hai aur prarthna shayad use bhool bhi jaye harsh use aaj tuk nahi bhula paya. shayad isliye multiple personality jee raha hai.
जिस्म की बात नहीं थी उनके दिल तक जान था,
लम्बी दूरी तय करने में वक़्त तो लगता है....