Wednesday, January 5, 2011

क्रमश: 2

असंभव......आनंद के मुँह से पहला शब्द जो निकला वो यही था. .....

मैं बहुत दिनों से आप से बताना चाह रही थी...लेकिन साहस ना बटोर पाई......की आप क्या सोचेंगे.....

मैं क्या सोचूंगा........अरे पगली......मैं एक बात जानता हूँ......की सूरज की तरफ मुँह कर के थूकने से अपना ही  चेहरा गंदा होता है.......चाँद को गाली देने  से , चाँद पर कोई असर होता है.....मुझे ये चिंता नहीं है....की उसने क्या किया....जिसको तुमने ऊँगली पकड कर चलना सिखाया.....मुझे चिंता ये है.....की मेरी छुई-मुई , जिसको अंदर से देखने की जहमत किसी ने नहीं उठाई.....उसका क्या हाल है.....कितनी बिखर गयी है....

तेरी मुस्कराहटें छीन कर जो चमन में गुंचे बिखर गए,
तो ये इम्तियाज़ ना हो सका , वो बिखर गए कि संवर गए.

सब तुम्हारी हंसी  में खो गए...... लेकिन......कोई तुम तक ना पहुँच पाया.

आनंद.....

हाँ ज्योति.....मैं नहीं बोलता हूँ.....लेकिन तुम्हारी एक-एक चीज़ों का , एक एक एहसासों का मुझे ध्यान है.....और मै ये भी जानता हूँ...की जिस दिन ये ज्योति जलेगी.....कुछ को रौशनी मिलेगी...और कुछ इस रौशनी मे चेहरा छुपाते नज़र आयेंगे. मुझे इंतज़ार है उस दिन का और उस ज्योति का.......शराफत वहीं तक ठीक है, जहाँ तक वो कायरता ना कहलाये.....
क्रमश: 

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