Friday, February 18, 2011

एक प्रयोग....या सच्चाई...

मेरे बारे में तुमसे कोई पूंछे,  तो कह देना,

वो इंसान तो अच्छा था, पर बदनाम बहुत था.

बोलियाँ तो लगी थीं बाज़ार में मगर,

वो इंसान बाज़ारू या बिकाऊ नहीं था.

कहने को तो हम भी उसके करीबी थे मगर,

उसको आदमी पहचानने का शऊर नहीं था.

इसलिए बना लीं दूरियाँ हमने......

सब उसके अपने थे कोई गैर नहीं था.

कोई गैर नहीं था..............कोई गैर नहीं था.





1 comment:

वन्दना said...

सब उसके अपने थे कोई गैर नहीं था.
कोई गैर नहीं था..............कोई गैर नहीं था.

कमबख्त कौन से युग मे पैदा हो गया
जहाँ साया भी अपना होता नहीं
फिर गैर तो गैर ही होते हैं
उम्र भर ये ही नही जान पाया
बदनामी ओढ कर
इंसानियत के चोले मे
वजूद को ढांप कर सो गया
कमबख्त कौन से युग मे पैदा हो गया

मेरे ख्याल से उसके लिये ये शब्द भी कम हैं…………बेहद उम्दा ख्याल को शब्दो मे ढाला है।