Saturday, February 5, 2011

तपस्वनी और फ़कीर....समापन


तो ये है...मुझ से तुम तक का सफ़र.....कितने मोड़ों से मुड़ता हुआ, कितनी बार टूटता हुआ, कितनी बार जुड़ता हुआ, कितनी बार बिखरता हुआ, कितनी बार संवरता हुआ....मैं तुम्हारे शहर पहुँच ही गया...यहाँ से अनंत कि यात्रा शुरू होगी....क्योंकि ...तपस्वनी...अब पाने को कुछ रहा ही नहीं.....तुमको देखना था, देख लिया.... अब उसकी याद आने लगी है.....या वो मुझे याद कर रहा है...पता नहीं.....अब वो ही वो बसता है.....तुम्हारा नाम लेता हूँ तो उसका ही अक्स उभरता है.......मेरा कृष्ण है वो...पार्थ का सारथि है वो....मेरा है वो...बस वो अपना बना ले मुझको.....तपस्वनी.

दरिया में यूँ तो होते हैं कतरे ही कतरे  सब,
कतरा वही है, जिसमे कि दरिया दिखाई दे.

तुम वो कतरा हो...जिसमे मुझे वो दिखाई देता है...और उसमे तुम दिखाई देती हो...खुद को ढूंढता हूँ तो तुमको पा जाता हूँ..पता नहीं..तुम इक गोरख धंधा हो. अब मन स्थिर और शांत है..ये जो एकांतवास जानकी नंदन ने मुझे दिया है ना....अब इसकी अहमियत समझ में आ रही है..शायद वो मुझको अपने और करीब ला रहा है ...इसिलए तो दूर किया है..ताकि विरह की ये आग और भड़के...और इतनी भड़के कि जिस में मेरा "स्व"....ही जल कर खाक हो जाए...तभी तो वो मिलेगा....यही तो उसके मिलने कि शर्त है.....अजीब है..लेकिन है....

कैसी अजीब शर्त है दीदार के लिए,
आंखें जो बंद हो तो वो जलवा दिखाई दे.

तुम तो राधा हो ही.....तुम तो उसकी हो ही....मुझे  अपने आप को पार्थ बनाना पड़ेगा..तभी तो वो मेरा सारथि बनेगा....बोलो..ये सच है ना...आज यहाँ मुझे २ महीने हो चलें हैं....जब से निकला हूँ पहली  बार किसी जगह इतना लंबा विश्राम लिया है....लेकिन अब और जाऊं कहाँ....कृष्ण भी यहाँ..राधा भी यहाँ...मैं तो फ़कीर  हूँ...

मैं तो कुत्तवा राम का, मोतिया मेरा नाम,
गले राम कि जेवड़ी, जित खींचे तित जाऊं.

तुम समझ जाओगी....मैं जो भी कुछ लिखता चला जा रहा हूँ.....प्रेम का जो उदाहरण तुमने स्थापित किया है, ना तपस्वनी..वो भी इस जमाने में जहाँ प्रेम को बाजरू बना दिया गया है........उसने तुमको उस ऊँचाई पर बैठा दिया है....जहाँ पर तुमको देखने के लिए, जब मैं सर उपर उठाता हूँ....पंजो के बल पर खडे होके तब भी मैं तुमको नहीं देख पाता हूँ.....सच है ना....आदमी कितने भी पाँव क्यों ना उचका ले....चाँद को तो नहीं छू सकता....लेकिन मेरी तपस्वनी...मै इस सत्य से भाग नहीं सकता कि...

चाँद के साथ कई दर्द पुराने निकले,
कितने गम थे जो तेरे गम के बहाने निकले.

इस फ़कीर कि इक इल्तजा है.....मानोगी.....खुश रहना. .........................इति. 

1 comment:

वन्दना said...

क्या कहूँ कुछ कहने को बचा ही नही…………शायद यही अंत होना था और सही भी है…………मौन हूँ ।