Friday, February 11, 2011

पुरानी दिल्ली-1

ज्योति.... तुम तो जानती ही हो...इतिहास की छात्रा रही हो....की पुरानी दिल्ली की किस्मत मे कितनी बार लुटना लिखा था.

अब क्या इतिहास पढ़ोगे ?.....आनंद.

क्या इतिहास पढूं....ज्योति.

तो फिर ये इतिहास का ज़िक्र क्यों आया.....?.......कुछ तो है की जिसकी परदादारी है.....

खाली दिमाग शैतान का घर......इसलिए.

आनंद.....अगर तुमको बताना होता है....तो तुम बिलकुल सीधे तरीके से समझा देते हो.....लेकिन अगर तुमको कोई बात नहीं बतानी है तो तुम आदमी को "China to Peru" घूमा देते हो.

हूँ......... तुम समझने लगी हो मुझे. अब खतरनाक हो गयी हो.....

अच्छा जी......तो अब क्या करेंगे...आप ? साथ में police protection रखेंगे .........

अजी सरकार......police  की गिरफ्त से भली तो आप की गिरफ्त है.

बाते करवा लो....आप से....बस. ..... बातों के धनी हो तुम .....आनंद.

ज्योति.....जानती हो कुछ दिल ऐसे होते हैं.....जैसे पुरानी  दिल्ली....

क्या मतलब.....

पुरानी दिल्ली कितनी बार बसी...कितनी बार उजड़ी.....कितनी बार इसको लूटा गया....कमबख्त .....मेरा दिल ना हुआ...पुरानी दिल्ली हो गया..... कितने ही तैमूर आये, कितने ही बाबर आये...कितने फिरंगी आये....लेकिन ये कमबख्त...फिर भी धडकता रहता है.... और धडक रहा है... 

ले बेटा....... ये रही दवाई. मालिन माँ की गलत समय पर दखलंदाजी......कैसी है ज्योति बिटिया ...?

मैं ठीक हूँ ......आप कैसी हैं. ....ये दवा किसकी है.

इतनी देर से बतिया रही है......ये नहीं पता की दवा किस की है......बिटिया जिसकी तबियत खराब होती है...वही दवा लेता है....

ज्योति ने मेरी तरफ ऐसे देखा देखा..जैसे मैने कोई गुनाह किया  हो.

अच्छा माँ....मैं चलती हूँ.....

कहाँ जा रही हो...बैठो.....ज्योति.

क्यों क्या करूँ बैठ कर.....हम आपके हैं कौन...?

मेरी मुस्कराहट ने बता दिया...की मैं चाहता हूँ की वो कुछ देर और बैठे. .....

अब आप मुँह से कुछ फूटेंगे...या मुँह मे दही जम गया है....?

तुमको देख कर तो खून जम जाता है...दही जमना तो बच्चों का खेल है.

बस फिर वही बातें......मैं क्या करूँ आप का....?

सही बात है....ना होता मैं तो क्या होता....

आनंद......क्या बात है...मैं देख रही पिछले दो महीनो से की तुम हर दूसरे या तीसरे दिन.....बीमार पड़ रहे हो.....आखिर क्या बात है...वो कौन सा राज दफन है तुम्हारे सीने मैं...जो अंदर  ही अंदर तुमको घुन की तरह चाटता जा रहा है....और तुम चुपचाप दर्द को पीते जा रहे हो.....क्या महादेव बनने का इरादा है...?

मैं ज्योति की तरफ देखता रहा.....

ऐसे मत देखो....आनंद. तुम जानते हो....की मुझे आपकी चिंता होती है....

मैं जानता हूँ....रि सखी.....

क्या .......कौन सा इतिहास आज खुल गया......जिसके राज तुम्हारे सीने में दफन हैं.....  आनंद?

इसको सीना नहीं कहते हैं....सखी.....इसको ताजमहल कहते हैं.....ये इक मकबरा ही तो है....जहाँ मेरे अरमानों की कब्रें बनी हैं......चलता फिरता कब्रिस्तान हूँ मैं..........और इस कब्रिस्तान में किसी और की कब्र नहीं...सारी कब्रें , मेरी खुद की हैं....

आनंद..............जरा गौर से दखो....इन्हीं कब्रों के उपर हरी घास भी जम रही है....आशा की हरी घास......चलती रहती है....जरा गौर से "निराशा" को देखो तो उसी में तो आशा है........

वाह.....तुम तो मुर्दों में भी जान डाल देती हो..... सही कह रही हो......निराशा में भी आशा है....वाह.

बस करिए.....कुछ भी बोल देते हैं.

कैसी विडम्बना है....ना सखी.....जब तुम कमजोर पड़ीं तो मैं ने इक कोशिश करी तुम्हारे साथ खडे होने की.........और आज तुम...............

अरे.............आनंद...तुम्हारी आँखों में पानी.......
                                                                                                                                                  क्रमश:

1 comment:

वन्दना said...

बहुत बढिया चल रहा है प्रसंग्…………ऐसी दिल्ली तो हर दिल मे बसती है फिर चाहे उसमे मकबरे ही मकबरे हों।