Friday, February 4, 2011

तपस्वनी और फ़कीर....

ज़िन्दगी चलती रही......तुम मिली और फिर जुदा हुईं.....लेकिन ज़िन्दगी फिर भी चलती रही. लेकिन इस बार तुम्हारे  बिछड़ने का बाद...ज़िन्दगी तो चलती रही...लेकिन ज़िन्दगी का मजा जाता रहा.....तुम अपनी सारी जिम्मेदारियों को निभाते हुए....दिल में एक अलख जला....उसी में जलती रहीं.....और मैं तुमको देखता रहा...समझता रहा. फिर तूफ़ान का आना भी लाजमी था.....जब मौलवी साहब और उनके कुनबे ने मुझे दफन करने में  कोई कसर ना छोड़ी थी...दफन कर भी दिया था......और याद है तुमको तपस्वनी...यही मौलवी साहब इश्क के उपर घंटो तहरीर देते रहते हैं....खैर.....मैं अकले कैसे लड़ा उन मौलविओं कि जमात से...और लड़ने के बाद अकेला ही रह गया......या अकेला कर दिया गया....

जब इन मौलवी साहब ने मुझे इतना लहुलुहान कर दिया...कि मैं किसी काबिल ना बचा.....तो मेरी हालत उस आदमी कैसी हो गयी...जो डूब रहा है...और बचने के लिए हाथ पैर मार रहा हो.....उस वक़्त तिनके का सहारा भी काफी होता है....और उस वक़्त तुम खड़ी हुईं....और तुम ने ना सिर्फ मुझको बचाया बल्कि अपनी ज़िन्दगी दे कर मुझे अपना कर्जदार बना लिया.....लेकिन इन मौलविओं कि जमात का दिल अभी भरा नहीं था....वो तो मुझ पर निशाना  साधे ही बैठे थे.... मेरा वो खुतूत जो हवाओं के साथ उड़ता हुआ...मौलवी साहब के सहन में गिरा और एक जोरदार धमाका हुआ.....लेकिन इस बार के धमाके में तुम भी नहीं बच पाइं, खून के कुछ छीटे तुम्हारे दामन पर भी गिरे....और तुम्हारा दामन भी मैला  हुआ....और मैं अपने आप को इस गुनाह के लिए कभी माफ़ नहीं कर पाया....मेरी वजह से तुम्हारे दामन पर दाग.....या अल्लाह....इस से तो मौत ही बेहतर है.

फिर मैं सब कुछ छोड़ चला....और फ़कीर बन गया.....लेकिन इस बार गाँव-गाँव, गली-गली तुमको अपने साथ लिए घूमता रहा.....कई मदिरों में गया.....तो तुम साथ थीं.....कई मस्जिदों में भी गया....वहाँ भी तुम साथ थीं....एक दिन ख़ुदा से मिला...वहाँ भी तुम साथ थीं.....

ना गरज किसी से वास्ता, मुझे काम अपने ही काम से,
तेरे ज़िक्र से, तेरी फ़िक्र, तेरे नाम से तेरे काम से.

मैने अल्लाहताला से दरख्वास्त करी कि " या ख़ुदा.....अगर इश्क का ये अंजाम है....और ये तेरी मर्जी है....तो मेरे सर आँखों पर" ...मैं अपनी धुन में जीने लगा....गाँव-गाँव, गली गली....मुहब्बत बांटने लगा...और मेरी इस मुहब्बत का स्रोत तो तुम ही थीं तपस्वनी.....कितनी बार लोगों ने मुझे पागल करार दिया, कितने ही लोग मुझ पर हँसते थे...कितने लोगों के जहर बुझे हुए...अलफ़ाज़ इस दिल को चीर कर गए.....कितनी बार कई माएँ अपने बच्चों को मुझसे ....पागल है..... ये कह कर दूर खींच लेतीं थी......लेकिन मेरी नज़र कभी भी इन पर नहीं गयी...और सब कुछ मुझसे अलग होता गया...छूटता गया.....और मैं फ़कीर बन गया......मैने दो चार किताबे तो पढ़ी हैं लेकिन, शहर के तौर तरीके मुझे कम ही आते हैं.....इस लिए जिसने जब चाहा मुझे इस्तेमाल किया.....और वो भी मुझे लोगों ने बताया कि ...बेवक़ूफ़ ..तुझे इस्तेमाल कर रहे हैं....जा भाग जा.....

लेकिन तपस्वनी....भाग कर जाता तो कहाँ जाता.......मेरे जहन में हमेशा ये बात बिजली कि तरह कौंधती थी....कि जब वो.....दिल के अंदर एक आग को सालहों-साल जला कर रख सकती है....और खुद ही उसमे जलती है तो क्या तू....लोगों कि चंद बाते बर्दाश्त नहीं कर सकता......ज़िन्दगी कि कई तकलीफों में तुमको सामने रखकर....या तुमको पुल बनाकर मैने उन तकलीफों को पार किया....

पंडित जी बुला रहे हैं.....अभी आता हूँ....देखो इंतज़ार करना........तपस्वनी .

शिद्दत कि धूप , तेज हवाओं के बावजूद,
मैं शाख से गिरा हूँ, नज़र से गिरा नहीं.

लेकिन अब हालात बहुत बदल गए हैं.......

हम दुश्मन को भी पाकीज़ा सजा देते हैं... 
हाथ उठाते नहीं......नज़रों से गिरा देते हैं




1 comment:

वन्दना said...

कहानी प्रवाह मे चल रही है और आनन्द का तपस्विनी से रिश्ता भी किस किस मोड से कैसे गुजरा इसका बहुत ही खूबसूरत चित्रण किया है।