Friday, December 2, 2011

तपस्वनी.....

शाम काफी गहरा चुकी थी..... ठंड की वजह से मंदिर में लोगों कि आवा-जाही भी गिनी चुनी थी. उपर से बारिश ने न रुकने की कसम सी खा ली है....ये जिस मंदिर का अब मैं जिक्र कर रहा हूँ...ये रानीखेत के चिलियानौला गाँव में चीड़ के जंगलों के बीच में पड़ता है....पुराना शिव मंदिर है....पास में ही एक छोटी सी पहाड़ी नदी है......मैं वहीँ रहता हूँ.....

चिलियानौला..एक छोटा सा गाँव है.....एक छोटा सा बाज़ार है....२ से ३ हजार की आबादी होगी....लेकिन आठ बजते बजते सुनसान सा हो जाता है.....एक आध गाड़ी की आवाज़ सुनाई दे जाती है......चन्दन सिंह कुवार्बी गाँव के पंच हैं....गाँव के सब से रईस  आदमी हैं..लेकिन भले और सीधे-साधे.....उन्होने ही  मुझे इस मंदिर में रहने की इज़ाज़त दी है.....और देखरेख करने की....

मैंने तो उनसे साफ़ साफ़ कह दिया..की देखो साहब...देखरेख जरुर करूँगा..लेकिन मंदिर में पूजा पाठ करने को न कहिये....क्योंकि वो मुझे आता नहीं है.....उनको मैं क्या बताता की मैं तो एक तपस्वनी को ढूँढने आया हूँ, उसको मनाने आया हूँ.....जो रूठ गयी है.....

नहीं...नहीं मुझसे नहीं......वो उलझ जाती है...अपने आप से उलझ जाना उसकी एक फितरत है...या एक अदा....पता नहीं...लेकिन उसको सुलझाने मैं मेरी अपने आप से अक्सर मुलाकत हो जाती है....लेकिन आजकल वो खो गयी है......खैर...मैं भी कहाँ अपनी रामकथा आप को सुनाने बैठ गया....
देह धरे को दंड है, सब काहू को होए...

लेकिन मैं एक बात बताता चलूँ.....ये तपस्वनी वो नहीं..जो गेरुआ पहनती हो.....ये वो है..जो अपने सारे दाईत्वों को निभाती है, हंसती भी है, मुस्कराती भी है..लेकिन सब से अलग अकेली रहती है....

अब आप भी कहेंगे ये क्या बात हुई....की समाज में रहती भी है और अकेली भी है....लेकिन होते हैं कई लोग ऐसे होते हैं...जो पानी में कमल के पत्ते की तरह दुनिया में रहते है.....वो राधा भी है, वो मीरा भी है. वो जिसकी दीवानी है..... वो कोई खुशनसीब ही होगा......मैं.....अरे न रे बाबा....ना ना......

आजकल उसने पर्दा कर लिया है......खुद से भी और मुझसे भी....

गुस्सा है.....हो सकता है..

रूठी है......हो सकता है...

आहत है...संभव है....

क्या कोई है जो उसको सम्हाल ले.....उसको जरुरत है......

तुम्हारी अपनी क्या हालत है...वो भी बयान कर दो.....

मेरी हालत......लो भला मुझे क्या होने लगा....

तुम क्यों सकुचाते हो अपना हाल  बयान करने  में....

ना रे बाबा ....बात सकुचाने की तो है ही नहीं...

जब हम किसी को प्रेम करते  हैं....तो अपना दर्द कहाँ रह जाता है....

नहीं फुर्सत यकीँ जानो, हमे कुछ और करने की,
तेरी यादें, तेरी बातें बहुत मसरूफ रखती हैं........

बस यही तो....अपनी बातों को एक शेर के पीछे छुपा लेने की ये आदत.....

नहीं रे मन...नहीं.......

वो तपस्वनी बहुत परेशान है......

जब तक वो खुलेगी नहीं....वो बहेगी  नहीं.....वो डूबती जायेगी.....वो ख़तम होती जायेगी...
अरे वो अपने आप में अथाह समुद्र है..कुछ भी बर्दाशत करने की कुव्वत है उसमें....और मैं उसको डूबने दूँ.......संभव नहीं....है.

तो क्या करोगे.....

पता नहीं...

तो फिर परेशान क्यों.....

प्रार्थना तो कर सकता हूँ....

वो ठीक है, और उचित भी....

लेकिन उसको यकीं तो हो जाए....की मैं अपनी तपस्वनी को ढूंढ रहा हूँ...

वो जानती है......तुम अपना कर्तव्य करो....फल की चिता मत करो....

तुम से ज्यादा उसको तुम्हारी चिंता है....

लेकिन वो नाराज है.......

वो नाराज नहीं है...वो आहत है.......

जाओ ...अब मंदिर जाओ ....

क्या मंदिर..जब तपस्वनी ही नहीं....

तुम अगर उसको समझते हो ....तो जहाँ तुम हो, जिस हाल में तुम हो..वो वहीँ है...

मैं जानता हूँ, समझता हूँ.....लेकिन..फिर भी इंसान हूँ.....ना....

तपस्वनी.....एक बार तो बोलो....या क्या मैं ऐसे ही विदा लूँ...तुम से नहीं..संसार से...

1 comment:

वन्दना said...

एक ही बार मे पूरी कहानी लिख दी………जो जिसका हो जाता है वो फिर मुड कर कहाँ कहीं और देखता है और जब उसकी राह उस गली तक पहुँचती ही नही तो कैसे वो देखेगी …………फिर भी सबके दिलो के अपने अपने मोड होते हैं ………शायद एक मोड उस फ़कीर का भी हो और उस तपस्विनी का भी…………जरूरी तो नही ना मरने के बाद ही मुक्त हुआ जाये शायद वो जीते जी मुक्त हो रही हो।