Tuesday, December 27, 2011

कोई जाने ना......

चलो ज्योति थोड़ी देर टहल के आते हैं.......तुम्हे देर तो नहीं हो रही है...?

नहीं...नहीं...चलो......लेकिन तुम कुछ गर्म पहन लो.....

हाँ.....वो शाल दे दो....जरा...

मालिन माँ...मैं जरा घूम ने जा रहा हूँ......

अच्छा......

तुम हमेशा घूमने के लिए यहीं क्यों आते हो......आनंद....

ज्योति...एक अजीब सा सुकून मिलता हैं यहाँ...पर.....इस टीले पर बैठ कर....नीचे बहती गंगा...दिल-ओ-दिमाग मे एक अजीब सी शान्ति देती है.....और ये मंदिर.....बहुत शांत है.....गाँव से थोडा दूर है..इसलिए  लोगो की आवाजाही भी कम रहती है.....

तुमको अकेलापन पसंद है...आनंद..?

हाँ...ज्योति.....

लेकिन यारों दोस्तों में बहुत हंसी मजाक करते हुए देखा है मैने....

क्या हर हंसी के पीछे ख़ुशी ही  होती है.....ज्योति..?

ग़म छुपाते रहे मुस्कुराते रहे, महफ़िलों-महफ़िलों गुनगुनाते रहे
आँसुओं से लिखी दिल की तहरीर को, फूल की पत्तियों से सजाते रहे....


क्या बात है.....आनंद..कुछ परेशान हो....


नहीं ज्योति ...परेशान नहीं ...कहते हैं रात जितनी गहरी होती है...सितारे उतने ही साफ़ दिखाई पड़ती हैं.......और जाड़ों की रात....कभी छत पर जाकर आसमान को देखो....कितनी शान्ति , कितना सुकून मिलता है......वो देखो...चाँद के पास चमकदार तारा देख रही हो...ज्योति.....

हाँ.....

वो शुक्र है.... जिसको English में Venus कहते हैं....कहते हैं ना  men are from  Mars , Ladies are  from  Venus ...


अच्छा जी.....ऐसा क्यों....

क्योंकि Venus is  the  goddess of  beauty ....

ओहो....

हाँ जी......

आनंद...तुम इतने बात करने वाले हो...जब चुप रहते हो....तुमको घुटन नहीं होती......

होती है......बिलकुल होती......है...सर में भारीपन भी होता....लेकिन क्या करूँ.....किसको आती है मसीहाई..किसे आवाज़ दूँ.......

बिलकुल अकेले हो ना.....आनंद.....

हाँ......बिलकुल....अकेला...ज्योति....लेकिन....निराश नहीं.....हारा हुआ नहीं....हाँ थक जाता हूँ..कभी कभी....

ज्योति...तुमको डर  नहीं लगता.....

किस बात का डर.....आनंद..?

मेरे साथ इस बेनामी रिश्ते का डर.....

आनंद......ये जो नदी है......इसके दो किनारे हैं.....ये कभी मिल नहीं सकते ...लेकिन कभी एक किनारे की नदी भी नहीं होती...और रही बात....दुनिया से डर की......तो किस बात का डर.....मैं तुम्हारे  साथ रहना कोई पाप नहीं समझती.....कोई गलत नहीं समझती.....कोई दुसरा क्या समझता है...क्या सोचता है....यर मेरी सरदर्दी तो  नहीं है.....खैर ये बात practical नहीं है......संतुलन, balance ...ये बहुत अहम होता है..आनंद. अगर मैं अपनी सारी जिम्मेदारियों को निभा कर..कुछ समय तुम्हारे साथ बीतती हूँ.....अपने आप से जुडती हूँ, अपने real self को पाती हूँ.....तो किसी का क्या नुकसान ...... ये दुनिया, ये समाज.............समाज ...आनंद किस समाज की बात  करते   हो तुम......ये बना है की आदमी को अकेलेपन से बचा सके लेकिन......छोड़ो न आनंद ....इस समाज और दुनिया की  बातें.....

ज्योति.....हंसी आती है......अपने हालत पर, दुनिया पर और समाज पर.....

वो देखो एक नाव वाला कितनी मस्ती से गाता हुआ जा रहा है.......ओह रे ताल मिले नदी के जल में, नदी मिले सागर में.....सागर मिले कौन  से जल में...कोई जाने ना.......

ठंड बढ़ रही है..चलो वापस चलें.....

वापस तो जाना है ......आनंद.

1 comment:

वन्दना said...

कोई जाने ना……………सच कहा।