Tuesday, March 16, 2010

नारी तुम केवल श्रधा हो....

नारी तुम केवल श्रधा हो.... इसमे कुछ भी असत्य नहीं है.

लेकिन मै अपनी बहनों से ये जरूर जानना चाहता हूँ कि कहाँ है वो नारी जिसको हमारे शास्त्रों मे शक्ति स्वरूपा कह गया है. कहाँ है वो नारी जो पत्नी बन कर अपना सर्वस्व दे देती है, जो माँ बन कर नयी जिन्दगी देती है, यमराज से सत्यवान को वापस भी लाती है और दुर्गा बन कर महिषासुर का वध भी करती है.

इस पुरुष प्रधान समाज मे मेरी बहनों, आप को अपनी जगह, फिर से हासिल करनी होगी. जब तक महिषासुर मरेगा नहीं, समय बदलेगा नहीं. कब तक आप पुरुषो कि ज्यादतियों को बर्दाशत करेंगी. किस के सहारे  बैठी है आप लोग या हम लोग. क्या उपर से कोई दुर्गा जन्म लेगी? क्या कोई अवतार जन्म लेगा? दुर्गा तो आप के अंदर ही है, उसे बाहर आने का वक़्त है.

कैसा समाज है हमारा? नौ साल कि बच्ची के साथ बलात्कार होता है, हम चुपचाप देखते है. क्यों.......? क्योंकि वो हमारी बच्ची नहीं है. हमारा अभिजात्य वर्ग चाय के कप के साथ अखबार पढता है और चुप रहता है. हमारे नेता  उसको राजनीति कि रोटियां सेंकने का माध्यम बनाते है. हमारे नेता हमको इंसान नहीं अपना वोट बैंक मानते हैं और हम गर्व करते हैं कि चलो हम तो पिछडे वर्ग मे आते हैं, हम तो माध्यम वर्ग मे आते है आदि आदि .....

तेरी नीची नज़र खुद तेरी अस्मत कि मुहाफ़िज़ है, तू इस नश्तर कि तेज़ी आज़मा लेती तो अच्छा  था. 

क्यों आप के दिलो दिमाग से ये बात उतर गयी है जो हाँथ थपकी देकर बच्चे को सुला सकती है वही हाँथ जरुरत पड़ने पर जान भी ले सकती है. किस बात का इंतज़ार कर रही हैं आप लोग................ बहनों हम लोगो के सामने रानी लक्ष्मी बाई का भी उदहारण है जिन्होने  बच्चे को पीठ पे बाँध  कर दुश्मन से लोहा लिया था. अगर हम पन्ना ढाई को जानते है तो रज़िया सुलतान को क्यों भूल जाते हैं. आप के अंदर दोनों हैं........ उठो और अपने आप को पहचानो .............. अगर आप को मुझमे  भी महिषासुर  नज़र आता है तो शुरुआत मुझसे  ही सही...... 

तेरे माथे पे ये आँचल बहुत ही खूब है लेकिन, तू इस आँचल से एक परचम बना लेती तो अच्छा था.

आप आगे बढ़ो, दूसरों कि तरफ मत देखो कि कोई और आगे बढेगा तो हम भी आगे बढ़ेंगे. जब तक हम दूसरों कि तकलीफ को अपनी तकलीफ नहीं समझेंगे , हमारे अंदर खून नहीं खौलेगा. जब तक हम अपने आप को दुसरे से अलग कर के देखते रहेंगे ......................... पुरुष समाज आप पे राज करता रहेगा. महिषासुर जिन्दा रहेगा. इज्ज़त लुटती  रहेगी, बहने अपमानित होती रहेंगी, बहुएं जलती रहेंगी,

अब आप सोचो................... कि आप क्या चाहती है.

5 comments:

kunwarji's said...

"तेरी नीची नज़र खुद तेरी अस्मत कि मुहाफ़िज़ है, तू इस नश्तर कि तेज़ी आज़मा लेती तो अच्छा था."
".............. अगर आप को मुझमे भी महिषासुर नज़र आता है तो शुरुआत मुझसे ही सही...... "
अब आप सोचो................... कि आप क्या चाहती है.

बिलकुल सही कहा है आपने!आप से पुर्णतः सहमत!

कुंवर जी,

वन्दना said...

nari kewal shraddha nhi hai wo durga bhi hai kali bhi hai bas koi aap jaisa jagane wala chahiye..........bahut badhiya likha hai.

Anonymous said...

janaab, nari ke samman men koi kami nahi hai. hamare gharon men aaj bhee naari kaa hee shaasan chalta hai.

lekin midea aur anya bahari asar ke kaaran pata nahi kis sashaktikaran ki baat kar rahe hain log.

pariwar kyaa binaa nai ke sashakt hue achchhi tarah chalte rahe hain?

han yah baat digar hai ki samaj ke kisi khas varg men unpe atyachar ho raha hai. lekin poore bhaarat kee aisee sthiti nahee kahee ja sakti.

JHAROKHA said...

dev jibahut hi katu saty kaha aapane vastav me yadi har vykti bhi apane andar yahi bhavana rkhkhe to kaya majal koi bhi istarah vaqt v-vakt naari apmaanit hoti dekhata rahe.
log yekyo bhool jaate hai ki jaisa mahakavi jai shankar prasad nekaha tha ------abala naari teri yahi kahaani
aanchal memhai doodh ,aankho me panni.
par ab vo samay nahi raha.aajyadi narri mamata ka swaroop hai to jaroorat padne par kaali ka avtaar bhi.aapke ati sudar aalekh ke liye dhanyvaad. poonam

Mired Mirage said...

यह श्रद्धा, त्याग आदि सदियों की कंडिशनिंग है। यह सरलता से नहीं खत्म होगी। पुरुष तो अपने को जबरन इस मानसिकता से तब रोक सकता है जब उसे कड़ी सजा का भय हो। परन्तु स्त्री जिसे युगों से यही सिखाया गया है कि सहो और सहती रहो, अपनी बेड़ियों को सरलता से नहीं उतार सकती। कुछ सीमा तक यह प्रयास तब सफल हो सकता है जब घर में माता पिता तथा स्कूल में अध्यापक उन्हें उन पर की जाने वाली हिंसा का पुरजोर विरोध करना सिखाएँगे। हर बेटी को यदि यह कहा जाए कि यदि कोई तुम पर हाथ उठाए तो उस हाथ को यदि शारीरिक बल से नहीं तोड़ सकती तो न्यायिक बल से तोड़ दो। जो हाथ तुम पर बल प्रयोग करता है उसको कभी भी मत थामो।
घुघूती बासूती