Friday, March 5, 2010

दुखवा मैं का से कहूँ मोरी सजनी.....

दुखवा मैं का से कहूँ मोरी सजनी, भर पाई मैं हो कर इनकी पत्नी...... ये जो हैं न, अब मैं क्या कहूँ. न इधर के हैं ,न उधर के. इनको पैदा होना चाहिए था द्वापर या त्रेता युग में और हो गए कलियुग में. चलो कोई बात नहीं, पैदा होने पर मेरा कोई कण्ट्रोल तो है नहीं, लेकिन हे भगवान्, अगर इनको कलियुग में पैदा करना था तो कलियुग वाले गुण भी तो दिए होते. गुण सतयुग वाले और जन्म कलियुग में . होगई न इनकी जिन्दगी बेकार. और इनके साथ साथ मेरी भी.

कमाल के आदमी हैं ये. मैं सही कह रही हूँ. आज के दौर में भी ये, औरों के बारे में सोचते हैं. अरे.... जहाँ अपने अपनों का गला काटने में गुरेज नहीं करता, वहां जब ये दूसरों के बारे में सोचते हैं, तो बताओ , हे सखी, मैं करूँ तो क्या करूँ. मैने  कई बार सोचा कि इनको दुनियादारी सिखा कर, इंसान बना लूँ, लेकिन नहीं. मुझे अचरज होता है इनको देख कर. लोग इनको इस्तेमाल कर के , दूध में से मक्खी की तरह निकाल कर फ़ेंक देते है, और ये हज़रत, उनको शुक्रिया अदा करते हैं, और लो कर लो बात, उल्टा  मुझे समझाते है, कि देखो, वो ऐसे हैं तो वो हैं, मैं किसी के लिए अपने आप को क्यूँ बदलूं. कसम से मेरे तन बदन  मे आग लग जाती है.

जब मैं इनको समझाने बैठती हूँ तो ये इतनी नादानी से मेरी बात सुनते हैं, जैसे इनको कुछ पता ही नहीं कि दुनिया में क्या हो रहा है. इतनी चोट खा चुके हैं , अपनों के हाँथो लेकिन, पता नहीं कौन सी मिटटी से बनाकर भेजा है उपर वाले ने. कोई चीज़ इनको विचलित नहीं करती. ये तो हांथी के जैसे है. हांथी चलता रहता है, कुत्ते भौंकते रहते हैं. कौन इनको क्या कर रहा , क्या कह रहा है कोई फर्क नहीं, जो सोच लिया वो करना है.

किताबें पढ़ना, लेख लिखना, ग़ज़ल सुनना, शेर सुनना, बच्चो के साथ खेलना, रोते को हँसाना, निराशा को आशा में बदलना,  मरते हुए को जिन्दगी देना यही इनका काम है. खाना मिला तो ठीक नहीं मिला तो ठीक. क्या करूँ मैं इनका-- बोलो रे सखी बोलो.

इनसे ज्यादा कुछ कहो तो एक ही लाइन --- मैं इस जमाने के लायक कैसे बनूँ, इतना छोटापन मेरे बस का नहीं.

न चिड़िया की कमाई है, न कारोबार है कोई,
मगर वो हौसले से आबोदाना ढूंढ लेती है.

भगवान् ही जाने................ इनका क्या होगा............ मुझे ये अच्छे भी लगते हैं.

7 comments:

सुलभ § सतरंगी said...

चलिए आपके पोस्ट के माध्यम से अपना एक हमजबां मिला, वैसे मुझे पता है ऐसे लोग बहुतायत में हैं. आप खाम्खा दुखवा बता रही हैं. आप बस खुश रहिये.

शशांक शुक्ला said...

चलिये अच्छा है। लोग बचे है अभी

JHAROKHA said...

Bahut badhiya-----hindi blog jagat men apka svagat hai.

kshama said...

Are wah! Sach to yah hai ki,aap aur aapka pariwar khush qismat hai!

shama said...

न चिड़िया की कमाई है, न कारोबार है कोई,
मगर वो हौसले से आबोदाना ढूंढ लेती है.

भगवान् ही जाने................ इनका क्या होगा............ मुझे ये अच्छे भी लगते हैं.
Bas...iseeme sab sama gaya!

जयराम “विप्लव” { jayram"viplav" } said...

कली बेंच देगें चमन बेंच देगें,

धरा बेंच देगें गगन बेंच देगें,

कलम के पुजारी अगर सो गये तो

ये धन के पुजारी वतन बेंच देगें।

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संगीता पुरी said...

इस नए चिट्ठे के साथ आपका हिंदी ब्‍लॉग जगत में स्‍वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!