Friday, July 9, 2010

मांग........

मुझपे कुछ लिखो........... एक मांग.

आजकल मे बाहर वालों से कम , अपने आप से ज्यादा बात-चीत करता हु. इसलिए समझ गया की ये मेरे दिल की आवाज़ है, एक मांग है.

तुम पे, और मैं लिखूं.......?

हाँ क्यों..........?

नहीं........... तुम पे लिखना, अपने आप पे लिखना नहीं होगा? 

नहीं......... जब तुम अपने आप पे लिखते हो तो अपनी दुनिया से बाहर जाकर देखने की तुम्हारी आदत तुमको अपने आप से दूर कर देती है. इसलिए मुझपे लिखो.

एक शेर अर्ज़ कर सकता हूँ...........?

इरशाद.

लब क्या बताएं , कितनी अज़ीम उसकी जात है.
सागर को सीपियों से उलचने की बात है.

वाह.......... शब्दों मे घुमाना तुम्हें खूब आता है. चलो अब लिखना शुरू करो.

कहाँ से शुरू करूँ, तुम्हारा तो न आदि है न अंत. और मै तो तुमको कुछ सालों से ही जानत्ता हूँ.

मै तो तुम्हारे साथ शुरू से हूँ.

वो मै मानता हूँ लेकिन क्या मै तुम्हारे साथ शुरू से था? समस्या यहाँ से है.

तुम्हारे किस रूप के बारे मैं लिखूं? हर रूप तो मैने देखा है. ब्रह्मा, विष्णु, महेश, दुर्गा, काली हर रूप मै तो तुम मेरे सामने आये हो. तुमको  माँ की तरह ध्यान रखते हुए देखा है, तुमको दोस्त की तरह मुश्किलों से बचाते हुए देखा है, तुमको प्रियतम की तरह सर्वस्व न्योछावर करते हुए देखा है. तुमको एक तपस्वनी के तरह खुद को जलाते हुए देखा है. तुम मुनि भी हो , ऋषि भी,  रम्भा भी हो और मेनका भी. कितने रूप हैं तुम्हारे और कितनी सहजता से तुम अपने आप को हर रूप मे ढाल लेते हो. 

तुम इतने पवित्र हो, की तुम्हारे अंदर मालिक ने अपना निवास बनाया. तुम अन्तरिक्ष की तरह असीम और एक इंसान की तरह सीमित भी हो. अपने आप को सब के अंदर देखना, और सब को अपने अंदर महसूस करना, तुम्हारी विशेषता है. जिसको कृष्ण ने गीता मे कहा " यो माम पश्यति सर्वत्रम, सर्वं च मयी पश्यति". तुम ईश्वर के प्रिय हो. जो ईश्वर का प्रिय हो, वो मेरा है.

तुम एक गीत हो तो एक ग़ज़ल भी हो. तुम खूबसूरत हो तुम बदसूरत भी हो. अवसर के अनुसार अपना रूप प्रकट करने की शक्ति तुमको अलग ही खड़ा करती है. गरल पी कर अमृत बांटने की तुम्हारी आदत, कितने ल्लोग महसूस करते है.

पर दुर्भाग्य तुम्हारा पीछा भी नहीं छोड़ता. कितने लोग तुमको जो तुम हो वो देखते हैं. कितनी बार तुमको अपने वास्तविक रूप को छोड़कर लोगों की जरूरतों के हिसाब अपने आप को उनके सामने व्यवहार करते हुए देखा है, बच्चों के साथ तुम तो बिलकुल बच्चे हो जाते हो. और जब तुम्हारा दार्शनिक रूप मेरे सामने आता है, तो मे सहम सा जाता हूँ. कई बार तुमको अच्छी तरह से पढने की कोशिश की, हर बार असफल हुआ.       

तुम जल हो. जैसे जिस बर्तन मे जल डालो, वो उसी का रूप ले लेता है, वो हो तुम.

और क्या लिखूं तुम जल हो या जीवन....................... अब तुम बोलो.

हु................

क्या हु.............. बोलो. क्या मैने गलत लिखा.

नहीं........ तो तुम भी महसूस करते हो..... तुम्हारे पास मैं हूँ. इस बात का ज्ञान है तुमको.

तुम हो तो मै हूँ.

अगर मै अपने आप को हटा लूं, तो सिर्फ तुम ही तुम हो. 

कैसी अजीब शर्त है दीदार की लिए, 
आंखें जो बंद हो तो, वो जलवा दिखाई दे. 

ये खासियत है तुम्हारी. तुम्हारी बारे मे कुछ जानना हो तो मै खुद को अलग करूँ तभी कुछ लिख सकता हूँ.  तुम प्रेम स्वरुप हो. मै जब अपने आप को तुमसे अलग करता हूँ, कितनी दिखावे की जिन्दगी जीता हूँ. तुम्हारे साथ जो मै हूँ, वो हूँ. ओरों के साथ, मुझे जो नहीं हूँ, वो भी बनना पड़ता है. कितना बोझ उठाता हूँ, मै.

1 comment:

वन्दना said...

गज़ब का लेखन्………………………बेहद सुन्दर अभिव्यक्ति।