Friday, July 9, 2010

तपस्वनी - 2

कब तक और क्यों इस बात की परवाह करते हो की कौन क्या कहेगा. भगवान् ने इंसान को जुबां दी है तो वो तो बोलेंगे ही. धोबी  ने सीता को बक्श दिया था क्या?

आप इस गाँव और इस मंदिर मे क्यों आई? मेरा सीधा सवाल.

ओह............. तो तुम को ये बात सता रही है.

नहीं ऐसी बात नहीं है.

जब आप गेरुआ नहीं पहनती, और घर अरिवार वाली हैं तो आप यहाँ क्यों?

देखो........... हर आदमी छुट्टियों मे कहीं न कहीं जाता है. मेरे बच्चे अपने बाबा दादी के घर गए, पति अपने व्यसाय मे हैं और मे कुछ दिन के लिए यहाँ चली आई. बस इतनी सी बात है. संन्यास या तपस्वनी का अर्थ गृह त्याग होता है क्या? कुछ दिन मे अपने आप के साथ रहना चाहती हूँ. मेरी अपनी भी तो जिन्दगी है. क्या मे वो जी नहीं सकती.

क्या आप को मोह नहीं है? मैने थोड़ा सा दार्शनिक होते हुए पूंछा.

मोह................ किस से.

परिवार, बच्चों, माया.................से

तुम बहुत अच्छे हो. क्योंकि तुम सीधी बात करते हो. परिवार , बच्चे , पति सब मेरी जिम्मेदारी है. वो मै जिम्मेदारी  समझ कर ही निभाती हूँ. तो मोह कैसा.

आप मेरे लिए एक पहेली बन गयी हैं. मैने डरते हुए कहा. एक कप चाय पियेंगी ?

वाह........... चाय. इतना डरते हुए क्यों पूंछ रहे हो?

मेरे अंदर एक कमजोरी है. मै विश्वास करता हूँ.

ये कमजोरी नहीं ताकत है. क्या तुम सब पे विश्वास करते हो?

नहीं....?

किस पे करते हो?

जिस को हम अपना मानते हैं. जिस को हम प्रेम करते हैं.

हाँ.......... प्रेम ही जीवन  है.

लेकिन ..............

प्रेम मे लेकिन नहीं होता. प्रेम अपने आप मे पूर्ण है.  तुम को क्या लगता है की हनुमान मे इतना बल था की वो पर्वत को उखाड़ लेते? नहीं.... राम के प्रति उनका प्रेम इतना था की, उस प्रेम ने उनको ये शक्ति दी. क्या हनुमान एक छलांग मे समुन्द्र पार कर सकते थे?? नहीं......... वो अपने प्रियतम के प्रेम मे इतने दुबे थे की उनको किसी चीज़ की चिंता नहीं थी, किसी चीज़ का डर नहीं था.

ये प्रेम की ताकत थी??

हाँ......... बिलकुल.

क्या आप ने प्रेम किया.............. माफ़ करियेगा.

अरे इसमे माफ़ी वाल कोई बात नहीं है. मुझे  तुम्हारी सादगी अच्छी लगी.

प्रेम किया या नहीं......... ये तो मे भी नहीं जानती. लेकिन प्रेम बनना जरूर चाहती हूँ. मै गुलाब बनना चाहती हूँ. उसमे कांटे और फूल दोनों ही होते हैं. जिसको को चाहिये , वही मिलता है. हमारा  नजरिया, हमारी दिशा निर्धारित करता है. मत देखो कौन क्या कहता है. कृष्ण के 16000 रानियाँ थीं, ये तो सब जानते हैं, लेकिन वो योगेश्वर भी थे, ये कितने लोग जानते हैं. तो हमारी सोच, हमारा भविष्य निर्धारित करती है. प्रेम करो और प्रेम बनो.

आप यहाँ कब तक हैं.............

मैं..................... पता नहीं.

तुम यहाँ मंदिर मे क्यों आते हो? तपस्वनी का सवाल मुझसे.

मै अवाक.............

बोलो........ किसी चीज़ के लिए तो तुम्हारे दिल मे भी प्रेम  होगा, तभी तो तुम यहाँ आते हो.

मै प्रेम के विरुद्ध नहीं हूँ. मेरा तर्क शुरू हुआ. लेकिन लोगों की इंसान को इस्तेमाल करने की आदत और फिर फ़ेंक देने की आदत से दुखीं हूँ. 

ओह............. तो तुम ने प्रेम किया है. चलो इतना तो शुभ है. 



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2 comments:

वन्दना said...

बहुत सुन्दर और ज्ञानमय उपदेश्………………सच भी तो यही है………………ईश्वर ने हमे भेजा ही इसलिये है कि हम प्रेम कर सके…………प्रेम की उस बुलन्दी पर पहुँच सकें जहाँ गोपियाँ थीं मगर वो गोपियाँ भी अपने कर्तव्यों से कभी विमुख नही हुयी और प्रेम का असली स्वरूप तो सिर्फ़ उन्होने ही जाना या कहो प्रेमस्वरूप ही बन चुकी थी……………बस इतनी बात तो समझनी है मगर इंसान इन झूठे रिश्तों मे फ़ँसा रहकर ज़िन्दगी के अनमोल क्षण यूँ ही बर्बाद कर देता है और जैसे खाली हाथ आता है वैसे ही खाली ही चला जाता है।

Udan Tashtari said...

बढ़िया...सार्थक!