Tuesday, April 20, 2010

जून कि भरी दोपहर

भाईसाहब नमस्कार, एक जानी पहचानी आवाज़ कान मे पड़ी. मै अपने आँगन  मे पड़े छप्पर के नीचे कुछ सोया सा कुछ जगा सा, लेता हुआ था.

आँख खोल के देखा  तो मिश्र जी सामने खड़े थे. अरे हाँ.... मैने परिचय तो करवाया ही नहीं. जिन स्टेशन मास्टर का मैने जिक्र किया था उनका नाम है श्री सत्यानन्द मिश्रा. आइये मिश्रा जी, मैने उठते हुए कहा. मिश्रा जी मेरी खटिया पर ही बैठ गए और बिलकुल अपनेपन से, थाली मे रखे  हुए गुड़ के २ टुकडे मुँह मे डाल कर , लोटा भर पानी पे कर बोले गर्मी मे तो वाकई जल ही जीवन है.

कहाँ से आ रहे हैं, आज क्या छुट्टी पर है. मैने पूंछा. अरे नहीं भाई. खाना खा कर स्टेशन जा रहा था, सोचा आप से मिलता चलूँ. इस वक्त तो न कोई सवारी गाडी का वक़्त है न मालगाड़ी का. मैने कहा, मिश्रा जी कितना आराम है. मिश्रा जी गहरी सांस ले कर बोले, अब आराम का वक़्त ख़त्म होता सा लगता है. अरे ऐसा क्या हो गया? मै पूंछ बैठा. अरे भाई बनारस ट्रान्सफर हो गया है. अगले महीने कि पहली तारीख को ज्वाइन करना है. मिश्रा जी कुछ थके हुई आवाज़ मे बोले.

तो इसमे परेशान होने कि क्या बात है? अरे.... क्या जिन्दगी भर गाँव मे ही रहना है? मैने पूंछा.

भाई डरता हूँ, शहर से. अरे नहीं मिश्रा जी. शहर इतना भी डरावना नहीं होता. हाँ थोड़ा सम्हाल के रहना पड़ता है.
यही तो मुझसे नहीं हो पता. मिश्र जी ने जवाब दिया. हम तो जीते है तो जीते हैं. गिन - गिन के जिन्दगी हमसे न जी जायेगी.

मै समझ रहा था, मिश्रा जी कि पीड़ा और उनका डर. मिश्र जी-- गाँव कि सादगी , गाँव मे ठीक थी. शहर मे यूँ जियोगे तो मर जाओगे. मैने मिश्रा जी को उनके बच्चो का वास्ता देकर समझाया कि भाई उनको पढ़ाई - लिखाई के लिए , आगे बढने के लिया क्या शहर नहीं भेजोगे. आप कि तो जिन्दगी कट गयी. भाई शहर मे भी अच्छे लोग रहते हैं. वो अलग बात है, कि कुछ समय के बाद वो गाँव वापस लौटने के लिए तरसते  हैं.

अच्छा भाई अभी चलता हूँ, सवारी गाडी आने का वक़्त हो चला है. मै भी मिश्रा जी के साथ, घर बंद करके चल पड़ा , आज पोखरे पर पहुँचने मे देर हो गयी थी.

पंडित जी प्रणाम...... मैने दूर से ही उन्हे देखा कर कहा. वो बोले-- आज कहाँ रह गए बेटा. मैं तो खाना बना कर तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूँ. उनका ये वाक्य सुनकर मे चोंक गया. अभी ४ दिन से ही तो उनसे बोलचाल शुरू हुई है, और इतना अपनापन. ओह...... ये तो  गाँव के हैं. दिल से आवाज़ आई. शहर के होते तो पानी मांगने पर भी, शक कि निगाह से देखते.

हाँ... पंडित जी, कुछ आँख लग गयी, फिर मिश्रा जी आ गए थे. फिर सोचा कि बाज़ार से कुछ खरबूजे लेता चलूँ. शाम को मंदिर मे बच्चो के साथ मिल कर खायेंगे. पंडित जी इतने खुश हो गए... कि न जाने मैने कौन सी बात कह दी.

खाना हुआ, फिर वहीं बरगद के नीचे चटाई बिछा कर वहीं लेट गया. पंडित जी वहीं बगल मे खटिया डाल कर आराम करने लगे. कितने साल बाद गाँव आये हो? अचानक पंडित जी का सवाल मेरे कान मे पड़ा.

करीब १८ साल हो गए. कितने दिनों के लिए आये हो....... दूसरा सवाल पंडित जी का.
यहीं बसने कि सोच रहा हूँ. माँ बाप तो नहीं रहे, उन्होने जो सम्बन्ध बनाये थे, उनको निभाने कि सोच रहा हूँ.

बहुत कठिन बात कर रहे हो. बेटा. आप को पता है, आप के पिता जी इस गाँव के लिए क्या थे......... वो जो कचहरी के पीछे स्कूल है, उसमे आज भी तुम्हारे पिता जी नाम लिखा हुआ है. तुम्हारे पिता जी ने ही वो स्कूल शुरू लिया था. ५ बच्चे थे. घर घर घूम कर बच्चे इकठे किये थे उन्होने. और शुरू मे तो स्लेट और बत्ती भी खुद ही देते थे.  बसेसर से पूंछो  तो वो आज भी पिता जी का नाम किसी देवता कि तरह लेता है. तुमको पता है क्यों.......... उसकी अपंग बेटी  को मुफ्त मे घर जा कर पढ़ाते  थे, और वो मुन्नी , आज  शहर मे किसी बड़े ऑफिस मे साहब है.

मैने कहा पंडित जी...... आज मै उसी बरगद कि छाँव मे ही हूँ. कोशिश तो ये है कि जो काम वो जहाँ छोड़ कर गए , में वहीं से उस काम को शुरू करूँ......... आगे " होइए वही जो राम रची राखा" . तुम ठीक कह रहे हो बेटा...... आगे बढ़ो...... देखो जो बीज वो बो गएँ हैं, वो दरख़्त बने, ये जिम्मेदारी  तुम्हारी है......

वो देखो दूर जो धुल का गुबार देख रहे हो, ४.३० वाली बस आ रही है. आज रमेश आ रहा है. उसने B.A. का इम्तेहान पास कर लिया है.

रमेश पंडित जा का इकलोता बेटा है. जिसकी माँ के मृत्यु  उसके बचपन मे ही हो गयी थी. अच्छा....... तभी आज पंडित जी ने चावल, के साथ तोरे कि सब्जी भी बनाई थी और साथ मे गन्ने का ठंडा रस भी.......  क्रमश:


 

2 comments:

आशुतोष दुबे said...

acchi post hai .
हिन्दीकुंज

aanch said...

अच्छी है....मगर हिंदी में टाइप करते समय...हिंदी शब्दों को ठीक से लिखें तो...पढने में और अच्छा लगेगा...