Monday, April 19, 2010

जून की भरी दोपहर

जून की भरी दोपहर, सारा गाँव सूना पड़ा....... ऐसा लगता है की भगवान् सूरज ने भी तय कर लिया है की पहली किरण के साथ ही आग बरसाएंगे. 

लेकिन मुझे गाँव की दोपहर बहुत पसंद हैं. दोपहर होते होते जब सब लोग घर के अंदर बंद हो जाते हैं, मैं एक झोले मे भुना हुआ लैया- चना, गुड़, हाँथ मे एक kitaab  और एक पानी की बोतल ले कर गाँव के भ्रमण पे निकल पड़ता हूँ. सर के उपर एक गमछा, बस इतना बहुत है. मेरे गाँव का रेलवे स्टेशन जहाँ सिर्फ दो रेल गाड़ियां ही आती है, मेरी पसंदीद जगह है. छोटा सा गाँव है और मेरे गाँव मे सुरक्षा कोई बहुत बड़ा मुद्दा नहीं है, इसलिए रेलवे स्टेशन का स्टेशन मास्टर साहब से मेरी मित्रता हो गयी है. स्टेशन पर एक चाय की दूकान है, जब ट्रेन आती है तो चाय वाला....... गरंम चाय ...... की आवाज़ सुनाई देती है......फिर दूर तक सुनसान. स्टेशन पे दो प्लेटफोर्म  हैं १ और 2. प्लेटफोर्म २ के पीछे , मुश्किल से १ किलोमीटर दूर कलि जी का एक छोटा सा मंदिर है , उसके बगल मे एक बड़ा सा बरगद का पेड़ है, और मंदिर के सामने एक बड़ा सा तालाब है, जिसको काली जी का पोखरा कहते हैं.

बरगद के पेड़ की बड़ी बड़ी शाखाएं , पोखरे के उपर आती हैं और वही बरगद का पेड़ मेरी पूरे दिन की आराम करने की जगह है. गाँव के छोटे बच्चे, बरगद के पेड़ के उपर चढ़ जाते हैं........ और छपाक से पानी मे कूद पड़ते हैं. इनको कोई डर नहीं , इनको कोई चिंता नहीं, ये जिन्दगी जीते है. अभी यहाँ पोखरे मे नहाने के बाद, खेत पर काम कर रहे , अपने बाबू के लिए कपड़े मे लिपटी हुई मोटी मोटी गरम रोटियाँ, एक प्याज, ढेर सारा सा गुड़ और एक लोटा पानी लेकर जायेंगे और फिर खेत मे खेलेंगे.

मंदिर के पुजारी , रोज़ ही मुझे देखते थे, शुरू शुरू मे तो शक की निगाह से देखते थे , लेकिन कुछ दिन देखने के बाद, कि मुझसे उनको कोई नुक्सान नहीं है, मुझसे थोड़ी थोड़ी बात भी करने लगे .  दिन वो अपने लिए चावल उबालते  है और कोई सब्जी. पिछले २-४ दिनों से वो मुझे भी एक अलमुनियम कि प्लेट मे थोड़ा चावल और सब्जी दे देते हैं. उनसे मेरी धर्म और आध्य्तम को लेकर काफी बातचीत होती है. प्रेमी  जीव हैं. जब मैने उनसे शहर के बारे मैं और शहर के लोगों के बारे मैं बताया, तो वो चोंक  से गए. बोले नहीं बेटा ऐसे नहीं होते हैं  लोग. मैने पूंछा कि आप शहर कब से नहीं गए हो? तो वो बोले कभी नहीं. कभी जरूरत ही नहीं पड़ी. मैने कहा पंडित जी सबसे अमीर आदमी आप ही हो. उन्होने पूंछा क्यों? मेरे पास तो १०० रुपए भी नहीं हैं. मैने कहा, पंडित जी, मेरे हिसाब से , अमीर वो नहीं, जिसके पास बहुत धन हो, बल्कि अमीर वो है, जिसके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं हो". पंडित जी, मेरी व्याख्या सुनकर मुस्करा के बोले तुम पढे  लिखे हो, मै तुम से जिरह नहीं कर सकता, लेकिन जो तुम कह रहे हो, शायद ठीक है.

मंदिर से बायीं तरफ थोड़ी दूर पर गाँव का बस अड्डा है. पूरे दिन मे ३ बसे आती हैं.  वो आती हैं और धुल उड़ाती हुई चली जाती हैं. शाम होने को है, पंडित जी ने मुझसे पूंछा तुम रहते कहाँ हो? मैने कहा मेन रोड पर बच्चा सिंह के मकान मे. मंदिर मे लोगों के आने का क्रम बढने लगा, शाम कि आरती का वक़्त हो रहा था. थोड़ी देर मे, लोग पोखरें मे हाँथ , मुँह धोकर, मंदिर में अगरबत्ती और धुप जलाने जागे. और कुछ ही  देर मे सारा वातवरण, राम-मय   हो गया. गाँव के मंदिर मे, भजन, कि आवाज़ आने लगी.

मेरा भी जाने का वक़्त हो रहा था...... शाम को ८ बजे के बाद मे गाँव के बच्चो को अपने घर मे पढ़ाता था.......उनके आने का वक़्त हो चला था. बछो के लिए बाज़ार से कुछ फल, कुछ पेन्सिल्स, लेनी थी......
पंडित जी से आज्ञा ली, और चल दिया...... रास्ते मे स्टेशन मास्टर से मुलाक़ात हुई, बोले भाई मेरा ट्रान्सफर शहर मे हो गया है. कुछ शहर और शहर के लोगों के बारे में बताओ.
मैने कहा---- वहां के लोगों कि खासियत है सबसे बड़ी, हबीब लगते हैं लेकिन रकीब होते हैं.

वो बोले भाई विस्तार से समझाओ, मैने कहा, भाई साहब, कल आता हूँ, फिर बात करेंगे.

क्रमश:  

3 comments:

संजय भास्कर said...

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

Shekhar Kumawat said...

bahut sundar



shekhar kumawat

http://kavyawani.blogspot.com/

ajit gupta said...

बेहद खूबसूरत पोस्‍ट। आगे की कड़ी का इंतजार रहेगा। ऐसे ही लिखते रहिए। बचपन में हम भी ऐसे ही माँ की आँख बचाकर धूप में खेलते थे और गाँव से तो आपने ननिहाल की याद दिला दी।