Thursday, April 1, 2010

63 साल हो गए...........

63 साल हो गए........... या हो जाएंगे. हमको आज़ाद हुए.

 कहते हैं 12  साल मे तो घूरे के दिन भी, फिर जाते हैं. हमको तो 63 साल हो गए. अब भी कितने परिवार हैं, जिनको दो टाइम का खाना नसीब नहीं हो पाता, कितने घर हैं, जहाँ बच्चे स्कूल नहीं जाते. कितने गाँव हैं जहाँ रौशनी नहीं है, कितने गावं है जहाँ पीने का पानी नसीब नहीं है.

63 साल हो गए........... या हो जाएंगे. हमको आज़ाद हुए.

हम चाँद पे चले गए, अन्तरिक्ष मे घूम आये, इंसान के बुनियादी जरूरतें रोटी , कपड़ा और मकान. इसको भूल गए. सरकार आई और सरकार गयी. गाँव मे अन्धेरा था, गाँव मे अन्धेरा है. गाँव प्यासे थे, गाँव प्यासे है. लोग इलाज के अभाव मे मरते थे, मर रहे है. स्कूल तब भी कम थे , आज भी कम हैं.


63 साल हो गए........... या हो जाएंगे. हमको आज़ाद हुए.

लोग तब भी बहादुर थे, आज भी बहादुर हैं. तब जान देने मे नहीं झिझकते थे, अब जान लेने मे नहीं  झिझकते. तब इंसान ज्यादा थे, अब आदमी ज्यादा हैं. तब प्यासे को पानी पिलाना धर्म था, अब पानी पिलाना business है. तब गरीब आदमी रोटी और प्याज  खा कर काम चला लेता था, आज प्याज और आटा गरीबों की रेखा से उपर है. सरकार  काम बहुत कर रही है.

63 साल हो गए........... या हो जाएंगे. हमको आज़ाद हुए.

न्याय व्यस्था तब भी थी, न्याय व्यस्था आज भी है. वो अलग बात है कि  तब के मुकदमो का फैसला आज तक नहीं हो पाया. तब अगर किसी के घर पे छापा पड़ जाये, तो शर्म कि बात थी, आज गर्व कि बात है. तब दिल बोलते थे, अंतरात्मा  बोलती थी, आज पैसा बोलता है.

63 साल हो गए........... या हो जाएंगे. हमको आज़ाद हुए, 63 साल .

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