Thursday, August 19, 2010

सन्नाटा....

मै किस पर लिखूं....?

तुम पर.....? न बाबा न. जब नाम तेरा प्यार से लिखतीं हैं उंगलियाँ, मेरी तरफ जमाने की उठतीं हैं उंगलियाँ.

समाज पर लिखूं.........अंधो के शहर मे आइने बेचने जैसा है.

नेताओं पर लिखूं.......? कीचड़ मे पत्थर फेंकू क्या...?

अब बचा कौन......मै खुद. मेरी कलम पर जमाने की गर्द ऐसी थी, मै अपने बारे मे कुछ भी न लिख सका यारों.

अब एक और है जिस पर मै कुछ लिख सकता हूँ........तन्हाई. तन्हाई  की अपनी एक आवाज़ होती है. कभी कभी ये सांय- सांय की आवाज़ मे होती है...... लेकिन मुझे अक्सर अपनी ही आवाज़ सन्नाटे की आवाज़ लगती है. सन्नाटा तो मैने कभी सुना ही नहीं. अपने अंदर इतनी आवाजें आती हैं की सन्नाटा तो अजनबी बन गया है.

मेरी तन्हाई , तुम ही लगा लो मुझको सीने से, की मै उकता गया हूँ इस तरह घुट घुट के जीने से.

आप ने दीवारों के बारे मे कभी कुछ सोचा है.......नहीं न.

दीवारों के कान तो होते हैं... सब जानते हैं. मगर दीवारों के मुँह भी होना चाहिये..... हर वो शख्स जो अपने आप को चार दीवारों के बीच पाता होगा, और वो भी तनहा.... वो मेरी इस बात से जरुर इतेफाक रखेगा. के दीवारों के मुँह भी होना चाहिए. आखिर कभी कोई तो हो हम से भी चार बाते करने को. हमारी सुनने को.......कहाँ तक कोई अपने आप को किताबो के बीच गला दे... कहाँ तक. किताबी कीड़ा बनना , मुझे शुरू से ही नामंजूर था. मुझे ये बात नागवार गुजरती है है क्योंकि किताब पर किताबे, किताब पर किताब पढते रहने से, मुझे तो ये भी समझ मे नहीं आता की जो मे सोच रहा हूँ, ये मेरी अपनी सोच है , या किसी किताब से उधार ली हुई. क्या मेरी सोच भी मेरी न रही. ये तो अकेलापन की तरफ एक और कदम बढ़ गया मैं. ...... आप क्या सोचते हैं.

और मजा देखिये.... मेरे इस अकेलापन का फायदा उठा कर..... यादों का और विचारों का तो मेला लग जाता है. एक का बाद एक.... मेरे सीने पर इनकी दस्तक सुनाई पड़ती रहती है..... और मै एक के लिए बार बार उठ कर कहाँ तक दिल का दरवाजा खोलूं.....इसलिए दरवाजा खुला ही रखता हूँ. और यादे..... मुझे  अकेला   पा कर डुबो देना चाहती हैं, और वही डूबते हुए मन को सहारा भी देतीं हैं....... सारे ख्याल तुम्हारे ..... सारी यादें तुम्हारी..... मै तो सागर के लहरों पर जैसे डूबता और उतराता रहता हूँ....... दिल एक खेल का मैदान बन जाता है..... अकेलेपन मे. ....... मानते हो न.

कल मै कुछ देर के लिए अपने आप से दूर चला गया...... और वो अकेलापन अजीब ही था.... भयावह.... क्योंकि वहाँ पर तुम नहीं थे. तब महसूस किया की जब तुम साथ होते हो.....

अब उस शेर की कीमत समझ मे आई......

तुम मेरे पास होते हो गोया, जब कोई दूसरा नहीं होता.

मै भी खामोश होता जा रहा हूँ.... क्योंकि मेरे पास बात करने को कई लोग हैं......लेकिन तुम नहीं. और मै एक दिन खामोश हो जाऊँगा. मै जब चुप हो जाऊं... तो तुम तुम दुनिया से ये जरुर कहना.......

क्या बताऊँ कैसे उसने दर बदर खुद को किया,
उम्र भर किस किस के हिस्से का सफ़र उसने किया.
तुम तो नफरत भी न कर पाओगी, इस शिद्दत के साथ,
किस बला का प्यार उसने बेखबर तुझको  किया.

देखा..... अकेलापन कितना छा जाता है मुझ पर. और फिर मै जब एहबाब के बीच जाता हूँ.....तो खुद को कैसे पेश करूँ...... ये एक नयी समस्या.

तुम तो समझती ही होगी...... जैसा चाहो....... .और अकेलपन मे जब उसकी याद आती है, तो सच मानियेगा, फूल निकलते हैं शोलों से, चाहत आग लगाये तो. ये सिर्फ वो ही समझेगा.... जो खुद इस आग मे कभी जला हो. ये अजीब फासले होते हैं जो और करीब ला देते हैं... और करीब..... और करीब..... लीजिये बुला लिया आप को ख्याल में, अब तो देखिये हमें कोई देखता नहीं......

1 comment:

वन्दना said...

अपने अंदर इतनी आवाजें आती हैं की सन्नाटा तो अजनबी बन गया है.
क्या बताऊँ कैसे उसने दर बदर खुद को किया,
उम्र भर किस किस के हिस्से का सफ़र उसने किया.
तुम तो नफरत भी न कर पाओगी, इस शिद्दत के साथ,
किस बला का प्यार उसने बेखबर तुझको किया.

जब सब आपने कह दिया तो अब बचा ही क्या किसी के कहने के लिये………………ये अन्दाज़ -ए- बयाँ काफ़ी पसन्द आया।