Monday, August 2, 2010

लेकिन फिर भी सुबह होती है..........

वो क्या हैं न, की मेरी लिखने की आदत तो अच्छी है, लेकिन कुछ भी लिख देने की आदत गन्दी है. सोच समझ कर लिखना चाहिये, ऐसा बड़े बुढे कह के गए हैं और मै उनसे इत्फ़ाक भी रखता हूँ. लेकिन सोच समझ कर लिखने मै स्वाभाविकता खत्म हो जाती है. ऐसा मेरा सोचना है. जो सोचते हो  वो लिखो, मेरा ये सिद्धांत  है.  और इस चक्कर मे, मैं कई बार मुँह की खा भी चुका हूँ. लेकिन वो क्या है न:-

हिम्मत से सच कहो तो बुरा मानते हैं लोग,
रो रो के बात कहने की आदत नहीं रही.

एक वक़्त था, जब कुछ भी लिखने से पहले, कुछ भी बोलने से पहले, मैं सोचता था की अमुक को कैसा लगेगा, अमुक क्या सोचेगा, अमुक को तकलीफ होगी आदि आदि ..... लेकिन मुझे हादसों ने सजा सजा कर बहुत हसीन बना दिया, मेरा दिल है जैसे किसी दुल्हन का हाँथ, मेहंदियों से रचा हुआ. दूसरों के बारे में  सोच सोच कर, इतने जख्म खाये , की इंसान के उपर से विश्वास ही उठ गया. अपने जख्मो के दाग गिन गिन कर, दोस्तों का हिसाब  रखते हैं. खैर, छोड़िए शिकवा- गिला.  

जो लोग दूर थे वो हमेशा दूर ही रहे,
जो पास थे उनसे मेरी तबियत न मिल सकी.

तन्हाई..... इस का अपना मजा है. खूब बाते होती हैं, तन्हाई में....... अपने आप से. आत्म-विश्लेषण का भरपूर मौका मिलता है. तन्हाई की अपनी आवाज़ होती है. जिसमे डूब कर पता चलता है.... की अरे ये तो मेरी ही आवाज़ है. कल मैने अपनी ज़िन्दगी से पूंछा ....... कुदरत के नियम इतने सख्त क्यों होते है?

कुदरत के नियम और सख्त? मेरी ज़िन्दगी ने मुझसे सवाल किया

हाँ......... क्या अपने आप को मिटाना इतना आसान है? मेरा सवाल.

क्या तुम थे? जिन्दगी का पलटवार.

मतलब????? मेरा अचरज

अरे तुम तो हो ही नहीं. इस हाड़- मांस को तुम खुद समझते हो? कितने नादान हो. ज़िन्दगी ने मेरा मजाक उड़ाया.

कुदरत कितनी मेहरबान है, इसका अंदाज तुम लगा ही नहीं सकते, क्योंकि तुम अपने बनाये हुए जालों से बाहर निकल ही नहीं पाते. तुम ने खुदा की दी हुई इस कुदरत के साथ इतना खिलवाड़ किया, तो अब क्या उसकी भरपाई नहीं करोगे? तुम्हारे अंदर खुदा खुद बैठा, ताकि तुम को अकेलापन न महसूस हो, लेकिन तुम................. छोड़ो.

लेकिन मै हार गया हूँ.

क्या.................................................?

हाँ....................... कब तक लडूं, अपने आप से और ओरों से. और फिर मुस्कराहट भी होनी चाहिये.

एक हंसी...... अपने आप को खुदा की औलाद भी कहते हो और हार भी मानते हो. ये बात कुछ जमी नहीं. 
पानी के बहाव के साथ तो कोई भी तैर सकता है, जो लहरों को चीर कर, बहाव के विरुद्ध तैरे, वो इंसान, कलेजे वाला होता है. अब तुम खुद सोचो..........

बाते करना , और , ज़िन्दगी जीना इसमे फर्क होता है.

कोई फर्क नहीं होता है. खुदा ने तुमको हर वो नेमत बक्शी है, जो तुम्हारे लिए जरूरी है, ज़िन्दगी जीने के लिए. तुम उसको न पहचानो, उसका इस्तेमाल भी न करो, तो बताओ गलत कौन? जो चलता है, वही गिरता है. जो पानी मे कूदता है, वही तैरना सीखता है. तुम क्या उम्मीद करते हो जब तैरना सीख लोगे, तभी पानी मे कूदोगे. तो किनारे बैठो.

ज़िन्दगी, अब बता कहाँ जाएँ, सारे रास्ते तो बंद नज़र आतें हैं........ मेरा एक सवाल.

अल्लाह-ताला से दुआ करो, और यकीन रखो. हर रात की सुबह होती है. कहीं रात बारह घंटे की होती है तो कही छह महीनो की, लेकिन फिर भी सुबह होती है..........

4 comments:

राजेन्द्र मीणा said...

भाई हौंसला रखिये और जो मन कहे बस वही लिखिए ,,,ऐसा लिखो ...जो मन को सकूं दे बस वही सबसे बढ़िया है ...आपके सुखद भविष्य की शुभकामनाओं के साथ ,,,,,!!!

माधव said...

nice

परमजीत सिँह बाली said...

अपने मनोभावों को बहुत सुन्दर शब्द दिए हैं।बधाई।

JAGDISH BALI said...

आपका बलोग पढ़ा ! यह एह्सास हुआ कि कोइ और भी मेरी तरह भी सोचता है !