Thursday, October 28, 2010

एक छोटी सी मुलाक़ात

तुम साथ नहीं  हो..... लेकिन फिर भी दूर नहीं लगते हो. 

तुम शरीर की परिधि से बाहर निकल गए , लेकिन दिल आज भी तुम्हारी यादों से सजा हुआ है.... जैसे किसी दुल्हन का हाँथ मेहंदियों से रचा हुआ......

तुम आये तो लगा जैसे गाँव आबाद हो गया.... हर तरफ तुम्हारी चर्चा  , तुम्हारा ज़िक्र.... अच्छा लगता था. लोगों से तुम्हारी बाते सुनना........ अब मन करता है कि....

या तो तेरा ज़िक्र करे हर शख्स, या कोई हमसे गुफ्तगू  ना करे.

घर पर भी सब लोग पूंछते रहते हैं कि तबीयत तो ठीक है, आज कल बहुत खामोश रहती हो..

क्या जवाब दूँ.....? बोलो तो.

आजकल यहाँ बरसात का मौसम है..... लेकिन अब वो बारिश नहीं होती......जो सालों पहले हुआ करती थी.... जिसकी ठंडी बूंदे जब बदन पर पड़ती थी तो एक आग सी  पैदा करती थीं..... नहीं होती अब वो बारिश..... याद है जब मे एक रोज़ कॉलेज मे रुकी थी बारिश कि वजह से, और तुम एक छाता ले कर मुझे  लेने आये थे,   चलते चलते जब मेरा हाँथ, तुम्हारे हाँथ से छु गया था, तो तुमने अपने आप को ऐसे सिकोड़ लिए जैसे कछुआ अपने आप कि सिकोड़ ले...... बहुत अच्छा लगा था. पहले मै समझी थी कि पापा ने तुमको मुझे लेने भेजा है, लेकिन बाद मे पता चला कि तुम खुद मुझे लेने आये , क्योंकि तुमको पता था, कि मेरे पास छाता नहीं है.... कितना ध्यान रहता था तुमको मेरा....लेकिन मै वो बात समझ नहीं पाई.......

कल तुमसे बात हुई, मुलाकात हुई तो ऐसा लगा जैसे रेगिस्तान मे बारिश हुई ........  एक तूफ़ान सा  मेरे अंदर और एक शान्ति तुम्हारे अंदर.... देखी मैने. कितने सुखी हो तुम....... और मैं.... जैसे सब अपने हों, जैसे कोई भी अपना नहीं.... आज भी वक़्त गुजर गया......किसी कि तलाश जारी है...... कोई अपना, बिलकुल अपना. तुम समझ तो रहे हो....ना.

लेकिन मुझे गुस्सा भी है तुम्हारे उपर.....बहुत गुस्सा.  तुमने कभी भी अपने दिल कि बात नहीं कही....कितने संकोची हो तुम....... और लोग तुमको पता नहीं क्या क्या कहते हैं...... कब तक और क्यों सहन करते हो....? इतना अपमान.... हाँ.... अपमान... लोग क्या क्या नहीं कहते हैं...... लेकिन भगवान् जाने तुम किस मिट्टी के बनी हो...?

याद है....मेरे घर के बाहर जो गुलमोहर का पेड़ था......तपती दोपहर मे तुम मुझे वहाँ बैठ कर पढाया करते थे.... उस गुलमोहर कि छाँव में...... वो गुलमोहर तुम को आज भी याद करता है..... और वो होली..... अरे बाप रे .... भांग पी कर क्या हुडदंग मचाया था...... सारा गाँव सर पे उठा लिया था तुमने...वो हुडदंग याद करती हूँ और कल जो तुमको देखा तो सच मे तुमको फ़कीर कहना अच्छा लगा.

जब १२ एक इम्तेहाँ मे मेरा एक पर्चा  अच्छा नहीं हुआ....तो बाप रे क्या डांटा था तुमने..... सारे शब्द याद हैं.... लेकिन वो डांट बहुत अच्छी थी.... अब कब डांटोगे....

तुम से कुछ देर मिलकर मेरे अंदर इतना सब चल रहा है..... और तुम्हारे अंदर....? चल तो तुम्हारे अंदर भी रहा होगा.... लेकिन तुम्हारी जब्त करने कि आदत......तौबा... तौबा....

जानते हो.... तुम्हारी  भाभी और भाई साहब से मुलाक़ात हुई.... मैने ऐसे ही पूंछा कि तुम कहाँ हो..... तो भाई साहब बोले..... क्या पता कहाँ हैं....कितना समझाया, नौकरी कर लो, शादी कर लो.... लेकिन वो तो बड़े साहब हैं.....

भाभी कहने लगीं.....भैया.... तो पता नहीं अब हैं भी कि नहीं.... कुछ खबर नहीं.

कैसे बोल सकता है कोई ऐसे.... बोलो तो.

सुनो.... पापा तुमको याद करते हैं.....वो जो एक गजल तुमने उनको सुनाई थी....

यारों  घिर आई शाम चलो मैकदे चलें, याद आने लगे हैं जाम चलो मैकदे चलें.
अच्छा नहीं पियेंगे जो पीना हराम है, जीना ना हो हराम चलो मैकदे चलें.

वो आज भी याद करते हैं......

पिछली बार जब घर गयी थी तो कुसुम मिली थी.... कुसुम कि तो याद होगी..... वही जो मेरे घर संगीत सीखने आती थी.... तुमको याद कर रही थी.....वो कहती थी कि तू तपस्वनी बनेगी..... तू, उसको याद कर रही है..... और वो अपने मुँह से कुछ बोलेगा नहीं. मर जाएगा , लेकिन मुँह नहीं खोलेगा......उसको पता है..... कि वो कहाँ है और तू कहाँ.....

तुम धनुषकोटि जा रहे हो...... लेकिन यहाँ भी तो ध्यान हो सकता है.....क्या ईश्वर  यहाँ नहीं है....?

संसार से भागे फिरते हो....भगवान् को तुम क्या पाओगे......बुरा मत मानना , मेरे हो, इसलिए ऐसा कह रही हूँ...

प्रेम ही ईश्वर है.... तुम ही ने सिखाया था और अब...... लौट आओ...... जिदगी अब भी तुम्हारा इंतज़ार कर रही है..... मेरे फ़कीर.

1 comment:

वन्दना said...

ओह!कुछ भी कहने मे असमर्थ हूँ……………।एक अलग ही दुनिया मे ले जाती है आपकी ये कहानी……………जैसे कोई दिल ही निकाल लिये जा रहा हो।