Wednesday, March 31, 2010

ईमान के शीशों पे बड़ी गर्द जमी है.

ऐ- मालिक , बरस जाये यहाँ नूर की बारिश, 
ईमान  के शीशों पे बड़ी गर्द जमी है.  
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होने लगी है शाम चलो मैकदे चलें,
याद आ रहा है जाम, चलो मैकदे चलें.
दैरों-हरम पे खुल के जहाँ बात हो सके,
है एक ही मुकाम, चलो मैकदे चलें.
अच्छा नहीं पियेंगे , जो पीना हराम है,
जीना न हो हराम, चलो मैकदे चलें
ऐसे फिजां मे, लुत्फे-इ-इबादत न आएगा,
लेना है उसका नाम, चलो मैकदे चलें


Tuesday, March 30, 2010

एक जरा सा दिल टूटा है, और तो कोई बात नहीं.....

भगवान् के  काम, समझ से बाहर के होते हैं. दुनिया बनाई, समझ मे आती है. लोग बनाये , समझ मे आता  है. दिमाग दिया, समझ मे आता  है. अब दिल बने की क्या जरूरत थी, ये बात मेरी समझ से परे है. अरे जब दिमाग दे दिया था तो उसी में कुछ ऐसा इंतजाम कर देता जो दिल का काम भी करता रहता था. वो तो बड़ा कारसाज़ है कर देता तो आज कितने लोग कितनी तकलीफों से बच जाते. दिल का दौरा नहीं पड़ता, दिल टूटा नहीं करते, लोगों को दिल से खेलने का मौक़ा नहीं मिलता. न दिल होता , न भावनायें होती, न संवेदनाएं होती. आदमी कितना सुखी होता. वफ़ा ये बेवफा जैसे अलफ़ाज़ ही ईज़ाद न हुए होते. न प्यार, न मुहब्बत, न नफरत -- कुछ नहीं. दुनिया कितनी सुंदर होती. न मंजनू होता, न रांझा.

खैर , अब इसके दुसरे पहलू को देखते हैं. अगर दिल बना ही दिया , तो फिर लोग भी  दिलदार होने चाहिये. आज के लोगों, जो दिल होने का दावा करते हैं, वो कहानी याद आती है, जब एक गीदड़ ने शेर की खाल पहन ली और अपने आप को शेर समझने लगा. आज के लोगों ने ईश्वर के घर को (दिल मे ईश्वर का निवास होता है) , तिजारत का सामन बना दिया, Business का सामन बना दिया, खेलने का खिलौना बना दिया, तोड़ने का सामन बना दिया, बस दिल को दिल ही  न बना पाये. लेकिन दावा पूरा है, की हमारे  पास भी दिल है......................  अपना दिल , दिल, दूसरे का दिल, पेप्सी का ग्लास - Use & Thorw.

अच्छा, भगवान् भी तो ऐसे लोगों का हिसाब रखता होगा? जैसी करनी, वैसा फल. आज नहीं तो निश्चित कल. ये मैने एक बस मे लिखा हुआ देखा था. लेकिन ये दिल के व्यापारी, खुश बड़े देखे हैं मैने. क्योंकि दिल एक ऐसी चीज़ है, एक ऐसी commodity है जिसके ग्राहक और खरीददार मिलते भी थोक में हैं. एक ढूँढो , मिलते हैं हजारों. ये दिलों के व्यापारी. ये एक खटमल - मच्छर  की तरह होते हैं. जो अलग - अलग लोगों का खून पीना पसंद करते  हैं. ये देखने मे काफी मिलनसार और मीठा बोलने  वाले होते हैं. हमदर्दी का मरहम हाँथ मे और आस्तीन मे खंजर छुपा कर रखते है. सर पे हाँथ फेरते हैं और पीठ पे वार करते है.

ये तो हुई बात उन लोगों की जिन के लिए दिल एक commodity है. अब जरा उन लोगों का हाल देखते हैं जो दिल को दिल मानते हैं. ऐसे लोग कम तादाद मे मिलते है. और ये लोग पिछडे  वर्ग मे गिने जाते हैं. इनको कुछ लोग दकियानूस के नाम से पुकारते हैं. ये लोग दुसरे के दिल के खातिर अपने दिल पे कुछ भी सहन करने के ताकत रखतें हैं. दुसरे की ख़ुशी की खातिर , अपनी खुशियों को कुर्बान करना, इन लोगों के बाएं हाँथ का खेल होता है. ये अपने दिल को पेप्सी का ग्लास, और दूरी को दिल को कांच का ग्लास समजने की गलती अक्सर करते है. इन लोगों की आंखे हमेशा  सूखी रहती है. दिल रोता है. ये लोग एक जोंक की तरह होते हैं, जिसको चिपक गये , चिपक गये. वहां से हटाया , तो मौत. और उस मौत को ये मौत नहीं मानते, कहते हैं की हम उनके दिल में तो ज़िंदा हैं. अरे भाई जिसके  दिल मे ज़िंदा होने की बात कर रहे हो, ये तो तय कर लो की उनके दिल है भी या नहीं. कहीं ऐसा तो नहीं की शेर की खाल मे गीदड़ हो.

तोड़ो, फेंको करो कुछ भी, दिल हमारा है, क्या खिलोना है.......

Monday, March 29, 2010

हे राम , ये मैने क्या किया.....................

अगर ईश्वर विलाप कर सकता या अफ़सोस कर सकता तो अपनी बनाई हुए दुनिया को देखा कर उसके मुँह से यही निकलता -----"हे राम ये मैने क्या किया.......................".

Thursday, March 25, 2010

आओ राजनीति करें.....

मेरा बड़ा मन था कि में भी राजनीतिज्ञ बनूँ, नेता बनूँ और देश के लिए कुछ करूँ। देश सेवा के लिए नेता बनना तो जरूरी हैं, न। कई बार सोचा कि चुनाव लडूं, लेकिन कमबख्त जेब नहीं इज्ज़ाज़त देती। सोचता हूँ अपने चुनाव के लिए किसी बड़े कोर्पोरेट कंपनी से बात करूँ। आज कल तो हर चीज़ मे प्राइवेट के भागदारी होती है, इस मे कुछ हर्ज़ मुझे नज़र नहीं आता और बड़े बड़े लोगो के चुनाव का खर्चा भी तो प्राइवेट कंपनी उठाती हैं। बोलो हाँ कि ना? लेकिन मै कोई नामी गिरामी नेता तो हूँ नहीं या सिनेमा का एक्टर  या खिलाड़ी, जिस पर पैसा कोई लगाये. मै तो इंसान हूँ और इंसानों पे पैसा कौन लगता है आजकल?

लेकिन आज कल के आदरणीय नेताओ को देखकर तो नेता शब्द गाली लगने लगा है. आज कल कि राजनीति तो गुंडों,मवालियों या जोकरों का अड्डा है. और संसद सबसे बड़ा अखाड़ा. सोचता हूँ एक बार नेता बन जाऊं, पांच  सालों के लिए, उसके बाद संन्यास. जी हाँ..... पांच साल मै इतना तो कमा ही लूंगा
आप क्या राय देना चाहेंगे?

चलो बाँट लेते हैं अपनी सजाएँ

 जो मै ऐसा जानती , प्रीत करे दुःख होये,
नगर ढिंढोरा पीटती , प्रीत न करियो कोए.


लेकिन मै प्रीत या प्रेम के विरुद्ध नहीं हूँ , यदि वो प्रेम है.

क्योंकि प्रेम का दर्द ............... अल्लाह........ इस का मज़ा ही कुछ और है. जिसने भी प्रेम किया होगा, वो मेरी इस बात से सहमत होगा. इस आग मे जलने का मज़ा ही कुछ और है.

 " उसी को देख कर जीते हैं, जिस काफिर पे दम निकले" .

कितना सही और कितना सच कहा ग़ालिब ने. इस आग मे जलना, वो भी उसके हाँथो जिसे हम प्रेम करते हों, किस्मत वालों को ये दर्द नसीब होता है.


मेरा दिल , जो हैं न, धडकता बहुत है. लोग कहते हैं बीमारी है, मै कहता हूँ मुझे ज़िंदा होने का एहसास दिलवाता हैं ये दिल. हर धडकते हुए पत्थर को लोग दिल समझते हैं, उम्र  बीत है दिल को दिल बनाने में. . और जब भी उसकी याद आती है, तब जो दर्द उठता है , वल्लाह.............. क्या मज़ा देता है. और जानते हो, जब तुम ये दर्द किसी के साथ बाँट न सको और सारा का सारा दर्द अकेले ही बर्दाशत करना पडे.  ये मज़ा दुगना हो जाता है


मेरे मित्र श्रीमान सुंदर लाल जी कटीला, मेरी इस बात से बड़े खफा - खफा से रहते हैं की तुमको जो बात कहनी है सीधे कहो.... भूमिका क्यों बांधते हो. मै उनको कैसे समझाऊं कि-


कौन सी बात कहाँ , कैसे कही जाती है,
ये सलीका हो, तो हर बात सुनी जाती है.








Wednesday, March 24, 2010

ये हमारे नेता हैं........

ये हमारे नेता हैं........ महिलाओ के संसद मे आरक्षण हो जाने से इनकी तो नानी मर गयी..... ऐसा लग रहा  है.  बेचारे अपना काबू खो बैठे हैं और जो अनाप शनाप उनके मुँह मे आ रहा बोल रहे हैं या  बक रहे हैं , ये निर्णय आप के उपर. महिलाओ के बारे मे उनकी सोच पता चल रही है. लेकिन खामोश....... ये हमारे नेता हैं. 

और मजे कि बात तो देखिये , उनके प्रवक्ता उनकी वकालत कर रहे हैं. क्या ये मुर्दों कि संसद है? इतना गुर्दा इनमे नहीं है कि कि गलत बात को गलत कह सकें, चाहे वो पार्टी के नेता ही कह रहे हों? पिछलग्गू, चाटुकार, भ्रष्ट और गुंडों कि पनाहगाह बन गयी है हमारी संसद. जो तिहाड़ या किसी और जेल मे हैं, वो थोडे से बदकिस्मत नेता हैं.

चलो वो तो जो कर रहे हैं, कर रहे हैं, हम क्या कर रहे हैं? हमीं तो उनको वोट देकर संसद मे भेजते हैं. रुपयों कि माला पहनाते हैं. खून मे तोलते हैं. और फिर गालियाँ देते हैं. गुर्दा तो हमारे अंदर भी नहीं हैं, ये मुट्ठी भर  नेता (मजबूरी मे मैं नेता का शब्द इस्तेमाल कर रहा हूँ, क्योंकि एक पब्लिक फोरम पे असभ्य भाषा का प्रयोग वर्जित होता है) हमारी मजबूरी हैं, या जरुरत - सोचना  पड़ेगा. हमारी क्या मजबूरी है जो सब कुछ जानते  हुए भी हमको इनको चुनना ही पड़ता है- शायद कोई भी पढ़ा लिखा शरीफ राजनीति मे नहीं जाना चाहता है, क्योंकि वो गाली गलोज नहीं कर सकता, माइक नहीं तोड़ सकता , असभ्य टीका टिप्पड़ी नहीं कर सकता. तो इसका मतलब हमें इन गुंडों और मवाली जैसे नेताओ को झेलना ही पड़ेगा. क्यों मै सच कह रहा हूँ , न?

और अगर कोई आवाज़ उठाने कि कोशिश करता है तो उसकी माँ, बीबी और बेटियों का जीना हराम कर देते हैं ये नेता और इनके गुर्गे.

लेकिन ये हमारे नेता हैं......... इसीलिए ये हमारे नेता है.

पूंछते हो हाल मेरे कारोबार का, आइने बेचता हूँ मैं, अंधो के शहर  में.

Tuesday, March 23, 2010

हमको फिर एक विवेकानंद चाहिए

बहुत डांट पड़ी, बहुत ताने सुनी इस बात पर की मै ब्लॉग अपने उपर या सुंदर लाल के उपर ही क्यों लिखता हूँ. सामाजिक समस्याओं के बारे मैं क्यूँ नहीं लिखता हूँ. मै कहता हूँ किस समस्या के उपर लिखूं? अकेला चना भाड़ तो नहीं फोड़ सकता है. रुपयों की माला के उपर लिखूं या पुलिस अधिकारी ने जो बलात्कार किया उसके उपर लिखूं? नेताओ के उपर लिखूं या IPL मै बह रहे पैसे के बारे मैं लिखूं? सब के उपर हमारे मीडिया ने आँख गड़ा ही रखी हैं. फिर भी क्या हो गया.

हम भारतीयों की एक कमजोरी को सारे राजनेता बखूबी जानते हैं कि ये कुछ दिन तक हल्ला मचाती है फिर शांत हो जाती है या आश्वासन कि एक रोटी इसके सामने फ़ेंक दो, ये दुम हिलाने लगती है. कुम्भकरण तो ६ महीने ही सोता था, लेकिन हम लोग सोते ही रहते हैं. हम कब जागेंगे, ये तो भगवान् भी नहीं जानता. रोज़ सवेरे हमारी आँख खुल जाती है, और हम अपने अपने काम मे लग जाते हैं, इसको अगर हम जागना कहते  हैं, तो भगवान् भी हमारी सहायता नहीं कर सकते. 

जिस देश मे कसाब जैसे आतंकवादी को बचाने के लिए भी वकील तैयार हो, वहां का राम भी रखवाला होने को तैयार नहीं होगा. जहाँ रक्षक ही भक्षक बन गए हो, वहां मै अकेला क्या कर लूंगा.

क्या कोई अंत है इसका??? जब तक कोई ऐसा इंसान न पैदा हो जिसमे आत्मा को झकझोर ने कि काबलियत हो, हम नहीं जगने वाले.

ऐ- काश बरस जाये यहाँ नूर कि बारिश ,
ईमान के आइने पे बड़ी गर्द पड़ी है.

हमको फिर एक विवेकानंद चाहिए.