Tuesday, February 16, 2010

चलते - फिरते पत्थर

अरे............... सुंदर लाल, बहुत दिनों बाद दिखे। क्या सिंगापुर चले गए थे?
नहीं भाई साहब, शहर से बाहर चला जाऊं वही बहुत है, आप तो सिंगापुर कहके मजाक उड़ा रहे है।
अरे न रे सुंदर लाल न। मजाक क्यों करूंगा। देखो एक बात को समझो। जब भी हम लोग बड़े बड़े लोगो के बीच में होंगे, तो अंग्रेजी मे बात करंगे, अमेरिका, इंग्लैंड और विदेश  की बात करंगे। और ये जो तुम्हे जोर जोर से हसने कि आदत है न, इसे बदलो। पढे लिखो लोगो के बीच मे इसे असभ्यता समझा जाता है। अरे..... हाँ, देखो टाई पहनने कि आदत भी हमको डालनी पड़गी, क्योंकि टाई पहन कर आदमी कि कीमत बढ़ जाती है। टाई पहनने वाले झूठ नहीं बोलते , वो लोग सभ्य होते हैं। क्या यार सुंदर लाल, इतना भी नहीं समझते हो। मै कहाँ तक हर बात तुमको समझाऊंगा।
हम जिस समाज मै रहते हैं, वहां इंसान कि नहीं, कपड़ो कि इज्ज़त होती है। तुम्हे याद नहीं है जब श्री गदाधर राव जी के बच्चे की पार्टी में गए थे। मैं अंदर चला गया था और तुमको दरबान ने बाहर ही रोक दिया था। नहीं , इसलिए नहीं कि तुम्हारे कपड़े गंदे थे, बल्की वो कीमती नहीं थे। और तुमने टाई नहीं बांधी थी।
अरे ठीक है तुम अच्छे आदमी हो, भले आदमी हो, लेकिन ये तुम्हारे माथे पे तो नहीं लिखा है, न। देखो मेरे प्यारे भाई सुंदर लाल, मुझे एक शेर याद आ रही है- " हर आदमी मे होते हैं दस बीस आदमी, जब भी किसी को देखना, कई बार देखना"। तुम बहुत सीधे आदमी हो, और दूसरों को भी अपना जैसा समझते हो। बस यही पर तुम बाज़ी हार जाते हो।
देखो हिंदी मे कहावत है -- " जैसा देश , वैसा भेष"। तो तुम वैसे क्यों नहीं बन सकते । अरे लोग तुम को इस्तेमाल करते है, तुम उनको इस्तेमाल करो। ये दुनिया का नियम है। तुम भी इसी दुनिया के हो, दूसरी दुनिया के तो नहीं हो। अरे..... माना कि हमारे माँ-बाप ने हमको ये नहीं सिखाया , लेकिन जो उन्होने सिखाया, वो भी याद है, जो ये दुनिया सीखा रही वो भी याद रखो। भाई- बहन, ये बाते झूठी बाते हैं , ये लोगो ने फैलाई हैं। पैसा, रूतबा, गाडी, बंगला - ये चार वो चीजे हैं, जिसके आगे दुनिया झुकती है।
अरे बाप रे बाप...प्यार .............. ये क्या कह रहे हो.................. अरे तुम मरोगे। भाई मेरे प्यार के नाम पर ही तो लोग इस्तेमाल करते हैं , और काम निकल जाने पे पेप्सी के प्लास्टिक के ग्लास कि तरह फ़ेंक देते है। अच्छा ये मिसाल तुम नहीं समझे... तुम कैसे समझोगे तुम तो प्रेमी हो। भाई काम निकल जाने पर लोग दूध मे मक्खी कि तरह निकाल कर फ़ेंक देते हैं। अच्छा... ये बताओ वो क्या गलत करते हैं?? अरे... काम निकल गया , चीज़ फ़ेंक दी। तुम न सुंदर लाल, किसी दिन ऐसा मरोगे कि रोने वाले भी किराए पे लाने पड़ेंगे। तुम ने कभी चलते फिरते पत्थर देखे हैं। अरे भाई में त्रेता युग कि बात नहीं कर रहाहूँ , जहाँ राम का नाम लिख कर पत्थर भी तैर जाते थे। मैं बात कर रहा हूँ इस युग कि, इस युग मे चलते फिरते पत्थर देखे हैं। नही न.... सरकार मेरे, मैं तो उन पत्थरों के बीच रहता हूँ और हर रविवार को उन पत्थरों से हाँथ भी मिलाता हूँ। और बात भी करता हूँ। देखता हूँ। खुद हैरान होता हूँ। ये पत्थर हँसते भी हैं, बोलते भी हैं, घडियाली आंसू भी बहते हैं, और मौका मिलते ही आस्तीन का सांप भी साबित होते है। देखो, प्यार करो तो उसको चमड़ी तक ही रखो , जिस दिन तुम ने दिल पे लिया, अपने दिन गिनना शुरू कर देना।
चलो एक प्रयोग करते हैं, एक पत्थर लो, उस पर अगर रस्सी से कुछ दिन घिसो, तो उस पे निशाँ पड़ जाता है, लेकिन इन चलते फिरते पत्थरों कि खासियत होती है, कि इन पे निशाँ नही पड़ता। ये पत्थर इतने दिखावटी होते हैं कि कभी कभी मन करता हैं कि इन पत्थरों को अपने बैठक मे सजा लूँ। ये प्यार से सर पर हाँथ फेरते हैं, और अपना बना कर पीठ पे चाक़ू से वार करते हैं। एक बार मैने इंसानों को ढूँढने कि कोशिश करी तो खुदा से मिला। अरे वो खुदा नहीं जो तुम समझ रहे हो, यहाँ हर इंसान खुदा से कम नही होता। " न बस में जिन्दगी उसके, न काबू मौत पे उसका, मगर इंसान फिर भी कब खुदा होने से डरता है"। हमने देखा कई ऐसे खुदाओ को यहाँ,सामने जिनके वो सुचमुच का खुदा कुछ भी नहीं।
अब बताओ हम करे तो क्या करे। भगववान ने चीजों को बनाया इस्तेमाल करने के लिए और इंसान को बनाया प्रेम करने के लिए। हम चीजों से प्यार करते हैं, और इंसान को इस्तेमाल।
जय हो भगवान् ................. या तो तू गलत या मैं।

4 comments:

Shikha Deepak said...

जय हो .....

RaniVishal said...

Bahut Bhadiya ji..Badhai!
http://kavyamanjusha.blogspot.com/

निर्मला कपिला said...

वाह बहुत बडिया शुभकामनायें

Udan Tashtari said...

हम चीजों से प्यार करते हैं, और इंसान को इस्तेमाल।


बेहतरीन विश्लेषण! वाह!