Tuesday, November 1, 2011

जिन्दगी...मेरे घर आना.....

जिन्दगी...मेरे घर आना.....

बाबा...खुशियाँ  हमसे क्यों रूठ गयीं हैं......? खाना खाते राबिया का भोला सा सवाल.

किसने के कहा ...बेटी.....

कई दिन हो गए .....आप हँसे नहीं हो.....इस लिए पूंछ लिया.

ऐसा न है बेटी......कुछ तबियत ठीक नहीं रह रही है.....तू तो देख ही रही न सब.... 

हाँ बाबा..... देख रही हूँ.....

न तुम्हारे खाने का ठीक...न पीने का......न वक़्त पर सोते हो.....बाबा कुछ परेशान हो....

अब उस दस साल कि राबिया को क्या जवाब दूँ.....क्या उसको बोलूं...कि जिस पे तकिया था, वही पत्ते हवा देने लगे.......बागबाँ ने आग दी जब आशियाने को मेरे...

या उसको बोलूं.....कभी कभी यूँ भी हमने, अपने दिल को बहलाया है.. जिन बातों को खुद नहीं समझे, ओरों को समझाया है....

अरी राबिया....

हाँ अब्बा ....

बिटिया...जरा लालटेन में तेल दाल दे...और खिड़की बंद कर दे....लगता है सारी बारिश आज ही होवेगी....तू ने स्कूल का काम तो कर लिया है....न लाडो....

हां अब्बा...वो तो मैने शाम को ही कर लिया था...

तू बड़ी समझदार होगई है.....

और क्या पढ़ाया आज स्कूल में....तेरी मास्टरनी जी ने....

अब्बा....आज किसी फ़कीर और तपस्वनी कि कहानी सुनाई..थी.

अच्छा......बिटिया....फ़कीर तो में जानूं ..लेकिन ये तपस्वनी कौन होवे है...?

बाबा....जैसे हमारे महजब में फ़कीर होते हैं, ना , वैसे ही हिन्दू लोगों में जो औरतें पूजा पाठ कर ने कि लिए घर छोड़ देतीं हैं....उनको तपस्वनी कहते हैं...

अच्छा........

तो क्या कहानी सुनाई...मास्टरनी जी ने...

बाबा......तपस्वनी ने एक फ़कीर के लिए सब छोड़ दिया....और जब फ़कीर को उसकी सख्त जरूरत आन पड़ी....न अब्बा....तो तपस्वनी.....चली गयी.......

कहाँ चली गयी......

पता नहीं अब्बा.....

मैं क्या बताऊँ.....कौन कहाँ चला गया.........जिन्दगी बहुत खूबसूरत है....अगर इसको इसके उंच-नीच के साथ ले लो. लेकिन......कुछ तो मजबूरियाँ रही होगी, यूँ ही कोई बेवफा नहीं होता ..... अरी राबिया....

हाँ अब्बा.....

चाय पीयेगी....

अब्बा......अभी थोड़ी देर पहले तो तुम ने चाय पी है.....कुछ खा लो...ये लो....दो रोटी खा लो....

बड़ा ख्याल रखे है..... तू मेरा....


1 comment:

वन्दना said...

जाने वाले कभी नही आते जाने वालो की याद आती है……………दिल एक मंदिर है प्यार की जिसमे होती है पूजा ये प्रीतम का घर है