Sunday, November 28, 2010

इस बार ये जिद तुम्हारे कृष्ण से.....

मै पत्र को हाँथ मे पकडे वहीं सोफे पर बैठ गयी.........क्या मेरी दुनिया खत्म...?

मंदिर जाऊं.....ना जाऊं..... जाईं... ना जाऊं......

जाऊं तो क्यों जाऊं....... ना जाऊं तो क्या ना जाऊं........ ये किस तरह के जाल मे फंसा कर चले गए........

तुम ऐसे जा नहीं सकते.......मेरा विश्वास इतना कमजोर नहीं है.

कब मै उठी... और कब मंदिर   कि तरफ चल दी.... पता नहीं......

हवा को क्या हो गया है...... इतनी तेज.....आंधी तो नहीं..... अब और आंधी क्या आएगी......

मंदिर आ गया.......पंडित जी खामोश बैठे  हैं, अंजलि कि आंखे सूख चुकी हैं..... अब इनसे क्या पूंछू..... या कैसे पूंछू कि फ़कीर कहाँ है......

पंडित जी ने मुझे देखा..... हाँथ से बरगद के पेड़ कि तरफ इशारा कर दिया और खामोश. मै पेड़ कि तरफ बढ़ी और रुकी..... क्या कर रहे हो...... कैसे देखोगी उसको........ अंजलि मेरे पास आई.... और मेरा हाँथ पकड़ कर पेड़ के तरफ ले चली......दीदी.... ये प्यार बाँटते थे.....
शांत, ध्यान मे मग्न...... मन मानने  को तैयार नहीं कि ये नहीं हैं...... वापस पंडित जी के पास ..... सब कुछ जाने के लिए.

कैसे हुआ ..... बाबा?

बेटी..... दीवाली से ३ रोज़ पहले आया था..... बिलकुल खामोश. प्रणाम करके मंदिर के अंदर चला गया और अपनी कृष्ण से बाते करता रहा....... बाहर आया..... एक कप चाय मांगी...... और तब से पेड़ के नीचे इसी मुद्रा में हैं..... ना खाना, ना पानी...... मेरी भी इतनी भी हिम्मत नहीं कि हाँथ पकड़ कर देखूं कि नब्ज चल रही है कि नहीं.......

ऐसा मत बोलो बाबा.....

अंजलि.... मेरे कमरे में खूटी पर उसको झोला  टंगा है...ला दे बिटिया.

अभी लाई बाबा..

ये लो......

लो बेटी... ये उसका झोला है...... जो उसने खुद मुझे दिया कि बाबा इसको अपने पास रख लो.....

मैने झोला में से सामान निकला..... एक डायरी, कलम, घडी, १२ रुपए और एक चिलम. 

उत्सुकता .... डायरी खोल कर पढने कि...... पहला पन्ना....२४/०५/२००४.

माँ...... " इस जमाने के लायक कैसे बनूँ.....इतना नीचपन मेरे बस का नहीं..."  तुम तो चली गयी...... दुनिया बिखर  के रह गयी.

१२/०७/२००४- भाई साहब के घर गया , एक कप चाय हाँथ मे देती हुए भाभी ने पूंछा.... भैया कितने दिन कि छुट्टी ली है...? माँ.....मे एक दिन रुक कर चला गया.

डायरी का पाचवां पन्ना...... पैदल चलते आज ढाई महीन हो गया.... अब तो भिक्षा मांगने कि आदत पड़ गयी..... २ रोटी मे काम चल जाता है. कुछ गाँव वाले तो मुझे २ रोटी वाला फ़कीर कहने लगे हैं.

डायरी के अंतिम कुछ पृष्ठ....आज भारत के द्कस्हीं हिस्से मे पहुँच  गया......देखो तपस्वनी के दर्शन होते हैं कि नहीं....... सुना था कि इसी गाँव मे रहती है.....

प्रेम......अगर व्यक्त करके समझाना पड़ा... तो प्रेम मे कमी है..... दिया कभी जल कर नहीं कहता कि मै जल गया, उसकी रौशनी बताती है. कभी ना कभी तो उस तपस्वनी को पता चलेगा.... कि यू ही कोई फ़कीर नहीं बन जाता. मै इस गाँव के कृष्ण मंदिर में रहूंगा.... कुछ दिन.....

अपने उद्गम को लौट रही, अब बहना छोड़ नदी मेरी.
छोटे से अणु  मे सिमट रही, ये जीवन की पृथ्वी  मेरी.  

बाबा....अब आप क्या करोगे.....

ये कहाँ का था....... बिटिया...वहाँ   भिजवा दे........

ये कहीं का नहीं था..... और ये सब का था..... इसलिए आज इसका कोई नहीं है.

लेकिन... फ़कीर...... तुम जानते  हो ना....मै कितनी जिद्दी हूँ.....

इस बार ये जिद तुम्हारे कृष्ण से.....

सुनते हैं कि मिल जाती है हर चीज़ दुआ से,
एक रोज़ तुम्हें मांग के  देखेंगे ख़ुदा से.

1 comment:

वन्दना said...

हर बार की तरह रौंगटे खडे कर दिये और आँख मे आँसू भर दिये………………इस प्रेम को सिर्फ़ महसूस कर सकती हूँ मगर शब्द नही मिल रहे कि व्यक्त कैसे करूँ……………ये कहानी अपने साथ बहा ले जा रही है……………।बेहतरीन लिखते हैं आप्……………अगली कडी जल्दी प्रकाशित करियेगा और एक अनुरोध है कि जब ये पूरी हो जाये तब सारी कडियाँ एक बार मे इकट्ठ प्रकाशित करियेगा तब उसे पढने का अलग ही रोमांच होगा।