Sunday, November 14, 2010

कि घर कब आओगे.....?

दिल पे हैरत ने अजब रंग जमा रखा है.... कितने रूप हैं इंसान तेरे...????

मै तो एक रूप को भी ठीक से समझ नहीं पाता हूँ की दूसरा सामने आ जाता है और जब पहले को छोड़कर दूसरे को समझने की चेष्टा करता हूँ तो तीसरा सामने आ जाता है........ बड़ी पशोपेश  मे हूँ......भगवान् कसम.
तारीफ  करनी पड़ती है..... की इंसान, ओह , माफ़ कीजियेगा, आदमी की, कि कितनी सहूलियत से इन अलग अलग रूपों मे समा जाता हैं..... कई बार तो उसको खुद भी लगता होगा कि उसका असली रूप क्या है...... जब वो अकेले मे बैठ कर सोचता होगा...... समझ रहे हैं ना आप..... "जब वो". याद कीजिये निदा फ़ाज़ली साहब कि वो शेर...

हर आदमी मे होते हैं दस बीस आदमी,
जब भी किसी को देखना, कई बार देखना.

सच है...... अभी आप किसी से मिलकर जाइए, दुबारा  मिलिए तो खुद सोचना पड़ता है.... ये वही है जिससे मे अभी मिला था..... और रंग भी वो आदमी इतनी काबलियत से बदलता है..... कि खुद लगता है कि नहीं..... ये आदमी असली है... वो नहीं, जिससे मै पहले मिला.

आजकल तो मुझे भी अकले रहने का वक़्त ही नहीं मिलता....हाँ.... सच कहा रहा हूँ. जब कभी तनहा बैठता हूँ....तो विचारों  का तांता सा लगा रहता है....... इस का विचार, उसका विचार, इनका विचार, उनका विचार....... उफ..... मै कहाँ रहा गया हूँ...... मै कहाँ खो गया हूँ. yes ....... मैं खो गया हूँ..... अच्छा एक शेर पेश करता हूँ....उसको इस जमीन से जोड़ीयेगा  तो.....

तेरा ख्याल मेरे साथ साथ चलता है.....
मेरी ज़िन्दगी है, या सूरजमुखी का फूल.

मेरी ज़िन्दगी दूसरों के ख्याल, दूसरों के तसुवारात मे इतनी घुलमिल गयी है.... कि उसको अपने होने का एहसास भी नहीं होता.... कम्बखत  मारी........  और जब ये फितरत बन जाए...... तो?  मै रिमोट कण्ट्रोल बनकर रह जाता हूँ.... रह गया हूँ. मेरा अपना भी वजूद है..... ये तो मै भूल ही गया हूँ.

कुछ तो दुनिया कि इनायात ने दिल तोड़ दिया, और कुछ तल्खिये हालत ने दिल तोड़ दिया,
हम तो समझे थे कि बरसात मे बरसेगी शराब,आई बरसात, तो बरसात ने दिल तोड़ दिया.

ये दिल के टूटने का मौसम है..... और ख़ास कर वो दिल जो धडकते हों.  हर धडकते हुए पत्थर  को लोग दिल समझते हैं....... उम्र बीत जाती है, दिल को दिल बनाने में.....कल मेरी अपनी ज़िन्दगी से मुलाक़ात हुई.... तो उसने मुझसे पूंछा ..... कि घर कब आओगे.....?

हाय अल्लाह...... मै तो बेवक़ूफ़ बन गया.... मेरी अपनी ज़िन्दगी पूंछ रही है कि घर कब आओगे....?

तो मै किसकी ज़िन्दगी जी रहा हूँ........ दिखावे की...?

कहीं ये सच तो नहीं....... बोलो तो.

1 comment:

वन्दना said...

तो मै किसकी ज़िन्दगी जी रहा हूँ........ दिखावे की...?

कहीं ये सच तो नहीं....... बोलो तो.
कितना बडा सच कह दिया।