Wednesday, November 24, 2010

इसलिए ये पत्र लिखा.....

दीदी......... अंजलि की हांफती हुई आवाज़.

क्या है..... क्यों हांफ रही है....... अरे तू तो रो रही है...... क्या हुआ....? बाबा तो ठीक हैं ना.....

दीदी..............

ले पानी पी...... अब बता क्या हुआ.......?

दीदी........ फ़कीर.............

अरे क्या हुआ फ़कीर को....... वो तो धनुषकोटि में हैं ना......

नहीं दीदी.........

वहाँ गए थे......... लेकिन दिवाली से कुछ दिन पहले ही मंदिर मे आये और वहीं रह  रहे थे......

थे...... मतलब ?

अब वो नहीं हैं........

चले गए......कहीं..... बिना बताये गायब हो जाने की आदत से मे वाकिफ थी.

हाँ.... दीदी.... फ़कीर ... चले गए...... लेकिन शरीर यहीं छोड़ कर गए.....

क्या...............?

हाँ दीदी....... फ़कीर नहीं रहे.

............................................... कैसे अंजलि.... वो कब आये ............

में सोचती ही रह गयी..... की अभी कुछ दिन पहले ही तो मैने तय किया था..... की कोई रिश्ता नहीं रखूंगी उनसे. क्या बुरा मान गए......

दीदी.... आप मंदिर आ रहे हो ना..... अंजलि का भीगा हुआ स्वर.

नहीं..... मै ना आ पाउंगी. कैसे कहूँ..... कि मैं क्यों  नहीं आ सकती

अच्छा दीदी....... मैं जाती हूँ.... अंजलि धीरे धीरे चली गयी.

दीदी....... ये पर्चा फ़कीर कि जेब से मिला .... किसी तपस्वनी को लिखा  है......

दिखा तो.....

"मै कभी अपने दिल कि बात तुमको बता ना सका..... मैने तो तुमको तपस्वनी समझ लिया, लेकिन तुम कैसे चुक गयी...... कि मै फ़कीर बन गया. तुम मेरे साथ या मेरे पास नहीं थीं... लेकिन मै तुमको अपनी शक्ति समझता था, समझता हूँ.... लेकिन पिछले कुछ दिनों से .... ना जाने क्यों....... एक अजीब सा अकलेपन समाता जा रहा था मुझमे. लग रहा था कि किसी अपने ने दामन समेटने कि प्रक्रिया शुरू कि है और मेरा तुम्हारे सिवा कोई नहीं था. मैं बोल नहीं पाया...... कभी भी.... मुझे  लगता था... कि तुम समझती हो...... और तुम समझती भी हो..... लेकिन......

तुमको याद होगा ....... एक दिन मैने तुमसे कहा था...... कि ऐसा लगता है कि मेरे अंदर वो शक्ति है कि मैं जब चाहूँ.... शरीर छोड़ सकता हूँ......... आज मै ध्यान मै बैठ रहा हूँ...... इस विचार के साथ..... कि बस और नहीं....अगर हो सके तो मुझे समझने कि कोशिश , एक बार और करना......मै उतना बुरा नहीं था..... जितना मुझे समझा गया........ अपना बहुत ध्यान रखना. कई बार तुमसे मुलाक़ात कि चेष्टा भी करी... लेकिन... पंडित और मोलविओं के डर से कदम ना उठ सके.

तुमने ... हमेशा संबंधो को बनाये रखने कि कोशिश कि.... और ये बात मुझसे अच्छा और कौन जानता है. अगर इस पत्र को पढ़कर तुम्हारी पलकों पर एक भी आंसू आया....... तो मैं समझूंगा कि ज़िन्दगी काम आ गयी.

मेरे मौला, इस तपस्वनी कि ज़िन्दगी मे इतनी ख़ुशी भर दे...... कि इसको कभी भी मेरी याद ना आये......

मै जानता हूँ कि तुम मेरे आखरी वक़्त मे मेरे पास नहीं आओगी........ इसलिए ये पत्र लिखा.....

1 comment:

वन्दना said...

उफ़ ! रौंगटे खडे हो गए…………वेदना का बेहद मार्मिक चित्रण किया है ……………उसे अब तो जाना चाहिये एक बार और पुकारना चाहिये शायद वो उस अवस्था से वापस आ जाये ।