Tuesday, September 14, 2010

एक दिल दे कर खुदा ने दे दिया क्या क्या मुझे

काफी बेचेनी  है आजकल? सब कुछ लिख देने का मन करता है. लेकिन पट्टियां जिस्म पे बांधू तो कहाँ तक बांधूं. कभी कभी तो खुदा से भी शिकायत करने का निश्चय भी कर बैठता है ये मन.......

ग़म मुझे, हसरत मुझे, वहशत मुझे, सौदा मुझे,
एक दिल दे कर खुदा ने दे दिया क्या क्या मुझे.

बाखुदा...... एक दिल  दे कर खुदा ने दे दिया क्या क्या मुझे..... ना देता दिल....तो. मतलब अगर देना ही था तो पत्थर वाला दिल दिया होता. मेरी हालत बिलकुल ऐसी है जैसे एक आज़ाद पंछी को पिंजरे मे कैद कर दिया गया हो. जिस्म का पिंजरा दे दिया और उसके उपर मौत का पहरा भी लगा दिया. जब तक मौत का पहरा नहीं हटेगा, पंछी उड़ भी नहीं सकता...... देख रहे हैं ना आप...... कैसे कैसे खेल खेलता है वो.

जो नकाबे रुख उलट दी, तो ये शर्त भी लगा दी,
उठे हर  निगाह  लेकिन, कभी बाम* तक ना पहुंचे.         * छत , ऊँचाई

दिल चाहता है की कोई तो हो, जिसके साथ बैठ कर अपने आप को खोल दूँ.... कहाँ तक गठरी उठा कर दर-ब-दर घूमता रहूँ.... बोलो तो...... लेकिन , वो क्या है ना, की इस शहर में सब मेरे  अपने हैं....  इसीलिए  डरता हूँ. Please  अब ये मत कहिएगा की या सोचियेगा की कितना अजीब आदमी है..... अपनों के बीच मे रहता है... फिर भी डरता है..... जी नहीं मे खाली डरता ही नहीं हूँ..... तनाव ग्रसित भी रहता हूँ.... जब अपनाओ के बीच मे होता हूँ.....

लो कल लो बात...... अरे पागल है क्या..... अपनों के साथ रहता है फिर भी डरता है, तनाव मे रहता है....

जी हाँ.......... मै अपनों के बीच रहता हूँ.... इसीलिए तो डरता हूँ या तनाव मे रहता हूँ.   अरे... दुश्मनों के बीच तो मै काफी आराम से रह लेता हूँ , निडर होकर.... क्योंकि मै जानता हूँ की वो पराये हैं..... और कुछ भी कर सकते हैं.... इसलिए...... तैयार रहता हूँ और आराम से रहता हूँ.लेकिन अपनों के बीच........ आराम से रहने  का ख़तरा मै नहीं उठा सकता. ना जाने कौन सी आस्तीन से सांप निकल आये.  Ceaser को भी उसके प्रिय मित्र Brutus ने ही मारा था.

हाँ तो मुद्दा ये था...... की इस गठरी को जो मै, जिसको सीने पर उठाये फिर रहा हूँ, किसके सामने खोलूं....... मेरा तो दम घुटता है...... आप का...... पता नहीं. आजकल लोगों को इस्तेमाल करने का भी.... सखी.... एक फैशन सा चल पड़ा है. इस वजह से और भी मै अपने आप को समेट  कर कछुवा बन गया हूँ......... ना जाने कौन...... क्या पता...... सावधानी हटी, दुर्घटना घटी........

गहरी सांस लेकर सब कुछ अपने आप मै जब्त करके, फिर ज़िन्दगी  को जीने  की कवायत मे लग जाता हूँ...... और रात को जब घर पहुंचता हूँ..... तब कैलंडर पर आज की तारीख को काट देता हूँ... की चलो एक  दिन और समाप्त हुआ...... फिर ईश्वर से पूंछता हूँ....... प्रभु...... अभी और कितना चलना है...?

कब तक मे तेरे नाम पे खाता रहा फरेब,
मेरे खुदा कहाँ है तू, अपना पता तो दे.

क्या तूने मेरे जैसा , दूसरा नहीं बनाया.........अच्छा किया.

2 comments:

वन्दना said...

बहुत ही गहरी बात कह दी………………॥सारा दर्द उमड आया है।
यहाँ भी देखें तो पता चलेगा कि ये दुनिया तो सिर्फ़ दर्द ही देना चाहति है फिर इंसान हो या भगवान्।

http://vandana-zindagi.blogspot.com

दुनिया की अदालत में खड़े भगवान ?

avanti singh said...

bahut hi umda post hai pahli baar yhan aana hua,khushi huee yhan aakar:)