Wednesday, February 8, 2012

.जारी है....कहाँ गए वो दिन....

सब्जी मंडी तो अब लगती ही नहीं.....नहीं तो वो भी दोस्तों से मुलाकात का एक अड्डा हुआ करता था...वो दिन नहीं रहे जब हम जो थे वही हुआ करते थे....अब तो हमको भी रूप भी अवसर के हिसाब से धरने पड़ते हैं....और उस पर नपी तुली मुस्कराहट...नपी तुली.....किसी को देखकर अगर ज्यादा मुस्करा दिए ...तो सफाई दीजिये....

ज्योति...तुम को नहीं लगता की Just be who you are बहुत कठिन चीज़ है...बहुत ही कठिन....और उनके लिए तो और भी मुश्किल जो अपने अंदर बड़े-बुजुर्गों से संस्कार ले कर आये है....लो ये शेर सुनो.....

दुश्मन को भी सीने से लगाना नहीं भूले, 
हम अपने बुजुर्गों का जमाना नहीं भूले. 

या....

जो भी दौलत थी वो बच्चों के हवाले कर दी, Publish Post
जब तलक मैं न बैठूं, वो खड़े रहते हैं. 

अभी इस को चलने देना.......रुकने को मत कहना...................जारी है....कहाँ गए वो दिन....

1 comment:

वन्दना said...

वो दिन लौट कर कब आते हैं
बस यादो मे सिमट जाते हैं