Tuesday, June 5, 2012

पन्ने दर पन्ने जिन्दगी।.....

दिन के बारह बजे दरवाजे पे सांकल की दस्तक....गर्मी के दिनों में ..........कौन हो सकता है .......काका जरा दरवाजा तो खोलो।...चारपाई पर  लेटे  लेट ज्योति ने रामदीन से कहा।

अच्छा बिटिया .......

रामदीन ने दरवाजा खोला तो एक अजनबी चेहरे को सामने देखा।

जी आप कौन।........

मैं सुंदर लाल .....ज्योति जी यहीं रहती है।......

जी......

जरा कह दीजिये की सुंदर लाल आयें हैं।..मैं आनंद बाबू  का दोस्त हूँ।.....

अच्छा अच्छा।..........मैं अभी आया। रामदीन ज्योति को बताने अंदर चला गया।

बिटिया ...कोई सुंदर लाल आयें हैं।..कह रहे हैं की मैं आनंद बाबू  का दोस्त हूँ।......

सुंदर लाल।.....ज्योति अचानक उठ कर बैठ गयी।...वो जानती है सुंदर लाल को आनंद बाबू  के दोस्त को।...उनको अंदर बुला लो।..काका और जरा गुड़ का शरबत बना दो।...

अरे सुंदर लाला जी आप।.......? यहाँ अचानक।.....

हाँ ज्योति।.....पिछले हफ्ते आनंद के न रहने की खबर सुनी।... घर गया तो ताला  बंद था ...इसलिए यहाँ चला आया..भरी दोपहर में  आप को तकलीफ दी।...माफ़ी चाहता हूँ।...

अरे  नहीं माफ़ी की क्या बात है।.....ज्योति महसूस कर रही थी सुंदर लाल की बातों में  एक उदासी, एक बनावटीपन .............नहीं तो सुंदर लाल तो बोल बोल के नाक में  दम  करने वाला इंसान था।...आनंद का परम मित्र और मुंह बोला भाई।.....

ये कैसे हुआ ...ज्योति।.....तबियत तो ठीक थी न आनंद की।.......

सुंदर।...मैं कई दिनों से आनंद से मिली नहीं थी।....मेरे पास भी ये खबर एक पोस्टकार्ड से आई।.....

तुम्हारे पास भी।...............???? वो भी पोस्टकार्ड से।.........क्या तुमने भी।...............उसको छोड़ दिया था ज्योति।...

सुंदर लाल के इस सीधे सवाल से ज्योति थोड़ी असहज हुई ......

हाँ सुंदर लाल........एक निश्चित दूरी बना ली थी मैंने।........

मतलब....वो अकेला रह गया था।....तुमको पता है ज्योति।....आनंद का ये आखिरी ख़त जो उसने मुझे लिखा था।....शायद अंतिम दिनों में .............पढो।...सुंदर लाल ने एक लिफाफा ज्योति के आगे रख दिया।...ज्योति पशोपेश में .....लिफाफा उठाये की न उठाये।......

अच्छा चलता हूँ।..ज्योति।.....सुंदर लाल उठ के चलने को हुआ।.....

सुंदर लाल।.....

बस  ज्योति ..अब कुछ कहने और सुनने को बचा नहीं।......तुम को उसकी एक एक हालत पता थी।....तुम पर वो  कितना निर्भर करता था।..तुमको शायद अंदाज नहीं है इस बात का।..............

चरित्रहीन था वो। आवारा था वो।.....

अच्छा तुमको इतना तो पता होगा की उसको चार कंधे मिले की नहीं।......

पन्ने दर पन्ने जिन्दगी।.....

वैसे उसकी खता  क्या थी....????

बोलो ...बोलो तो।




1 comment:

वन्दना said...

ना जाने कितने भेद छुपे हैं उसके गुलिस्ताँ मे
जब भी कोई फ़ूल तोडा लहू मेरे हाथों से निकला