Sunday, March 18, 2012

बहारें फिर भी आएँगी ............

पहाड़ों पर से बर्फ पिघलने लगी....और हवा के रुख भी बदलने लगे है.....कुछ गर्मी से महसूस होती है.....दोपहर को एक सन्नाटा सा सुनाई देता है.....आम के पेड़ों पर बौर भी आने लगे हैं...मेरे कमरे के पीछे जो आम का बगीचा है उस से होती हुई हवा जब आती है तो एहसास दिला दे जाती है......की फागुन गया...गर्मी का मौसम पैर पसार रहा है......दिन में जब सुनसान सा होता है.....खिड़की के पास कुर्सी डाल कर आम के पेड़ों को देखना, चिड़ियों की  चहचहाहट......एक अजीब सी ख़ुशी भर देते हैं मुझमें....और खिड़की पास थोडा सा दाना डाल देने की आदत...और मिटटी के श्कोरे में पानी...........जैसे पक्षियों का दावतनामा.....अच्छा लगता है.....लेकिन गौरेया नहीं आती......


रात को इसी आम के बगीचे  में दीवाली जैसी रौशनी होती है.....पता नहीं कहाँ से ढेर सारे जुगनू आ जाते हैं.....और मैं फिर खो जाता हूँ.....कभी कभी एक-दो जुगनू मेरे कमरे में भी आ जाते हैं.......और मैं फिर से बच्चा बन जाता हूँ. ......ये समां मुझे फिर से खींच कर गाँव ले जाता है.....जहाँ मैं अपने आप को  गौरेया के पीछे भागता हुआ देखता हूँ, जुगनुओं के पीछे भागता हुआ देखता हूँ....गर्मी की दोपहर में आम के पेड़ के नीचे खटिया डाल कर सोता हुआ देखता हूँ....  गौरेया...तुम कहाँ हो......

मैं अपने गाँव के खेतों  में हरी मटर खता हूँ, हरा चना खता हूँ.....वो खेत के कुँए के चारों तरफ  चर्र - चर्र कर के चलता हुआ रहट.....लो तिवारी जी ताजे गन्ने का रस और गरम गरम गुड (खांड) ले कर आ रहे हैं......जरा गमछा दे दो...... वो देखो पछिम में......वो गुडहल का बाग़ है....कैसा लाल लाल फूलों से भरा है......लगता है आग लगी हो......जवानी छाई है....मरे पर..फागुन की हवा की खुशबू अभी भी हवा में है..........वो गाँव का तालाब है....गाँव की भाषा मैं इसको पोखरा कहते है..........सुशीला......का घर वो है......जिसमें आम का पेड़ दिख रहा है.....और वो देख रही हो......बड़ा सा बरगद का पेड़....हाँ...वही.....वहां चोपाल लगती है............वो देखो गाँव के बच्चे कैसे छपाक छपाक से पानी में कूद रहे हैं...........

गाँव सुनसान है.......नहीं...नहीं....सुनसान नहीं....गाँव की दोपहर है......स्कूल में देखो कैसा शोर मचा रहे बच्चे......सुशीला यहीं पढ़ाती है........

ये हकीकत है...या कल्पना ..........कहाँ है ये जिन्दगी.......अब बैलगाडी में कमर नहीं लचकती..........अब गाँव की गोरियाँ............खुल के किसी से नहीं मिलती...

कभी रेट के ऊँचे टीलों पे जाना,
घरोंदे बनाना, बना के मिटाना,
वो गुडिया की शाद्दी पे लड़ना झगड़ना,
वो झूले से गिरना, वो गिर के मचलना,
न दुनिया का दर था, न रिश्तों के बंधन,
बड़ी खूबसूरत थी वो जिंदगानी............

लेकिन  बहारें  फिर  भी  आएँगी ............



5 comments:

वन्दना said...

यही है जीवन चक्र्।

dipti said...

really,after reading this i also reached village , bhut sunder

dipti said...

really,after reading this i also reached village , bhut sunder

dipti said...

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dipti said...

very nice atee sunder