Monday, October 17, 2011

नीड़ का निर्माण फिर...३

देखा ज्योति तुमने ..जिन्दगी कितनी रोचक होती है.....हम किसी बड़ी ख़ुशी की तलाश में अपने नजदीक बिखरी हुई अनगिनत छोटी छोटी खुशियों को नज़रअंदाज करते जातें हैं....और अपने अंदर कुंठा और तनाव को जन्म देते जाते है....

आनंद......ऐसा भी तो होता है की हमारे पास सुब कुछ होता है....लेकिन फिर भी एक खालीपन अंदर रहता है.....

हाँ बिलकुल होता है.....अगर ये खालीपन न हो तो महबूब को कौन याद करे...भक्त में याचना न होती तो , भक्त भगवान् बन गया होता....

तुमको किसी बात का अपराध बोध नहीं होता.....आनंद?

होता है....बिलकुल होता है...जब मैं किसी को जानबूझ कर, सोच समझ कर कोई नुक्सान करता हूँ....तब मै सो नहीं पाता हूँ......

ज़मीर काँप तो जाता है, आप कुछ भी कहें.
वो हो गुनाह से पहेली, या गुनाह के बाद.    

आनंद...... तुम्हारे अंदर जो दर्द या गुस्सा भरा है अगर वो न निकला तो.....वो तुम्हारी अपनी सेहत पर भी तो असर डालता है.....?

कोई नीलकंठ यूँ ही नहीं कहलाता...ज्योति...

आनंद ....मैं क्या करूँ आप का...

एक कप बढ़िया सी चाय पिला दो......और अगर इज़ाज़त दो तो मै एक चुरुट पी लूँ...अब पी ही लेता हूँ....जानता हूँ तुम मना तो नहीं करोगी तो हाँ भी नहीं कहोगी .....मैं जिन्दगी का साथ निभाता चला गया....हर फ़िक्र को धुएं  में उड़ाता चला गया..... 

आज कई दिनों बाद आनन्द को इतना गंभीर देखा... पता नहीं किस मिटटी से भगवान् ने बनाया इनको... अपमान, गुस्सा सब को पी कर भी कितना  शांत, सयंमित....किसी चीज़ की तलाश है..इनको..लेकिन मुंह से कभी निकलेगा नहीं.... आंखे बोलती हैं..लेकिन...आज के ज़माने में आंखे पढता कौन है, ये कला अब कहाँ रही....लोगों को शरीर पढने से फुर्सत नहीं है....

लो आनंद चाय......

हाँ...दो.......बैठो. ...... ज्योति..और बताओ स्कूल कैसा चल रहा है...?

ठीक है......तुम वापस आओगे?

हाँ....ज्योति......आउंगा.....लेकिन थोडा वक़्त और लूंगा....

क्यों.....

अभी समेटने की प्रक्रिया से गुजर रहाहूँ...

इतने हिस्सों में बँट गया हूँ मैं, 
मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं... ............यही तो जिन्दगी है.....कल तक मैं दूसरों को जिन्दगी जीने की हिम्मत देता था....आज जब वक़्त ने करवट ली...तब ये महसूस करने का, नाप-तौल करने का...की जो उपदेश दूसरों को देते थे...अब उनको जीने का वक़्त है...अपने आप को नापने का वक़्त है...इंशा जी उठो अब कूच करो.... 

आनन्द...

1 comment:

वन्दना said...

ज़िन्दगी को दोबारा समेटना और उसमे खुद को ढूँढना इतना आसान नही होता…………हाँ यदि कोई साथ हो तो सब संभव है और आनन्द को अब ज्योति का साथ लेना चाहिये एक बार फिर से जीने के लिये नीड के निर्माण के लिये।