Thursday, January 23, 2020


सेवक काका , हँसी मजाक अपनी जगह लेकिन मुझको ऐसा कुछ भी महसूस नहीं हुआ इसके उल्टे मुझे तो बहुत शांत जगह लगी वो। 

ठीक है आनंद बाबू , आप लोग शहर के पढ़े लिखे लोग हैं , आप ज्यादा उचित समझते हैं।  अच्छा मुझे आज्ञा दीजिये।  राम - राम गंगा बिटिया। 

और सेवक काका सीधे जा कर दाएं मुड़ गए।

अच्छा गंगा , अब मैं भी चलूँगा। 

अरे घर जाने का तय हुआ था और खाना वही खा कर आप जाएंगे। ये गंगा का आग्रह था या आदेश , आनंद यही नहीं समझ पा रहा था।  यदि ये आग्रह था तो इतना वास्तविक था कि उसको मना करने का साहस नहीं था और यदि ये आदेश था तो एक अधिकारपूर्ण आदेश था।

आनंद गंगा की तरफ देखता रहा फिर कहा - इस सादगी पे कौन न मर जाए ए ख़ुदा , लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं।

अच्छा तो जनाब शायरी में भी दखल रखते हैं। 

नहीं दखल - वखल कुछ नहीं , बस ऐसे ही कुछ याद रह जातीं हैं.

पढ़ना -पढ़ाना आपकी हॉबी है क्या ?  आनंद का सवाल

हाँ , मुझे अच्छा लगता है।  क्योंकि आजकल के समय में यह एक आदत है जो हमको टाइम पास के साथ - साथ मेंटली enrich कर देती है , ऐसा मेरा सोचना है।  क्या ऐसा नहीं है?

नहीं - नहीं मैं इत्तेफाक रखता हूँ आपसे और यह बहुत सही एप्रोच है।  लेकिन एक बात है गंगा।

क्या?

आजकल हम सब में - बच्चे , बूढ़े और जवान सब किताबों से पढ़ने की आदत से दूर होते जा रहे हैं और ये मेरे लिए एक चिंता का विषय है।

सो तो है।

क्या हम इस आदत को वापस लाने का प्रयत्न कर रहे हैं ? या कर सकते हैं?

आनंद , बहुत माक़ूल बात है और बहुत माक़ूल सवाल।  लेकिन इस इंटरनेट ने किसी को अछूता नहीं छोड़ा है।  ये तो मानते हैं न आप।

न मानने का तो प्रश्न ही नहीं है, गंगा।  लेकिन एक बात कहूं - इंटरनेट पे लोग भगवान् के दर्शन भी कर सकते हैं, on line दान दक्षिणा भी दे सकते हैं, भजन कीर्तन भी सिन सकते हैं और यदि समय हो तो यू tube पर उसको चल कर उसमें शिरकत भी फरमा सकते हैं।  है न?

हाँ वो तो है।

लेकिन फिर भी भगवान् दर्शन के लिए मंदिर ही जाते हैं चाहे कितनी दूर हो या कितना पास। ऐसा क्यों?  


Wednesday, January 22, 2020

बात करते करते दूरी काफी तय हो गयी थी। 

अरे गंगा बिटिया

सेवक काका। नमस्ते , कैसे हैं आप ?

काका इनसे मिलिए ये हैं आनंद।

अरे अरे आनंद बाबू।  नमस्ते

बिटिया ये  वही हैं न जो पुराने वाले शिव मंदिर ें रहते हैं। 

हाँ काका। 

अरे आनंद बाबू , बड़े हिम्मत वाले हैं आप हो उस खंडहर मंदिर में रहते हैं।

क्यों ऐसा क्यों ? काका

अरे आनंद बाबू उस मंदिर को छोड़ो , सूरज ढलने के बाद तो उस तरफ भी कोई नहीं जाता। 

लेकिन क्यों काका ??

अरे भाई सुना है वहां भूतों का निवास हो जाता है।

अच्छा !!!

लेकिन काका २ महीने से मैं रह रहा हूँ , कोई मुझसे मिलने नहीं आया।  आनंद का जवाब सेवक काका को।

क्या करते मिलने आकर जब उन्होंने देखा होगा कि उनसे बड़ा वहाँ रह रहा है।  गंगा का जवाब आनंद को। 






Tuesday, January 21, 2020

 तो आप भी यहीं रह जाइये , गंगा का एक मासूमियत सा जवाब।

जी रह तो जाता लेकिन वहशीं को सुकूँ से क्या मतलब, जोगी का नगर में ठिकाना क्या। 

ओह तो आप जोगी हैं !!

अरे जोगी जी धीरे - धीरे , सामने पड़े बड़े से पत्थर से बचने की सलाह देते हुए गंगा ने आनंद से इक ठिठोली की। 
आनंद  गंगा की तरफ देखा कर मुस्करा पड़ा। 

O , hello श्रीमान जोगी जी ऐसा क्या कह दिया मैंने जो श्रीमान को हंसी आ गयी।  भलाई का तो ज़माना ही नहीं रहा , बाई गॉड। 

अरे नहीं गंगा जी !!!

क्या नहीं गंगा जी ! हमारी समझ में नहीं आता है क्या? ये शहर वाले पता नहीं अपने आप को क्या समझते हैं ! अपने आप को क्या समझते हैं, मेरी बला से लेकिन हम लोगो को बेवकूफ जरूर समझते हैं।

तुम रायते की तरह फ़ैल क्यों रही हो।  गंगा की भाषा में आनंद ने गंगा से पूछा। 

तो आप हँसे क्यों ?

अरे तो हँसना अपराध हो गया , उईईई मेरी अम्माँ। 

आनंद के इस जवाब पर गंगा हंस पड़ी। 

गंगा आप कब से इस स्कूल में पढ़ा रहीं हैं ?

२ साल हो गए। 

सरकारी स्कूल है ?

जी।  कौन अम्बानी या अडानी यहाँ  स्कूल खोलेगा ?

हम्म्म्म ये तो है।

लेकिन पढ़ना पढ़ाना मुझे अच्छा लगता है , एक सुख की अनुभूति देता है ये पेशा मुझको।  मैं जब किसी बच्चे को देखती हूँ तो ये विचार कौंधता है मेरे ज़हन में कि मैं इसकी भविष्य की निर्माता हूँ।  वो ठीक है हर बच्चा अपनी किस्मत लेकर आता है , वो स्वयं ही भविष्य का  है लेकिन जिस उम्र उसके मां -बाप स्कूल में हमारे पास छोड़ के जाते हैं तो उनकी भी कुछ तो उम्मीदें होती होंगी।  कुछ तो सपने होते होंगे उनके भी।  और उस उम्र का बच्चा कच्ची मिटटी की तरह होता है , जिस रूप और आकार में गढ़ दो , वो वैसा ही बन जायगा। 

Friday, January 17, 2020

कारण ! कारण ! कारण !

जिंदगी cause and effect ही है या इन्हीं पे चलती है। 

क्योंकि बादल आये इसलिए बारिश हुई।

क्योंकि उसने बुरा किया इसलिए उसका बुरा हुआ।

दुनिया में आये हैं तो जीना ही पड़ेगा।

नहीं गंगा मैं २ महीने से मंदिर में रह रहा हूँ तो इसलिए नहीं मैं किसी चीज़ से भाग रहा हूँ  या भाग कर यहाँ हूँ। ऐसा नहीं है।  शहर की भाग दौड़ , जिम्मेदारियों का बोझ , कुछ इधर की कुछ उधर की इन सब के बीच हम खुद को खो देते हैं हाँ सच में हम खुद को खो देते हैं. हम ये भूल जाते हैं की हम भी कुछ हैं , हम को अपने लिए भी जीना चाहिए।  खुद को भी वक़्त देना चाहिए।  स्वयं सेवा बहुत जरुरी है अगर किसी और की या औरों की सेवा करनी है।  वो क्या है न-

अक्ल कहती है दुनिया मिलती है बाज़ार में ,
दिल मगर ये कहता है कुछ और बेहतर देखिये। 

तो बस यूँ समझ लो की दिल की सुन लेता हूँ और स्वयं से सम्पर्क स्थापित करने , उसको सुचारु रूप से चलने देने के लिए , खुद से मुलाक़ात करने के लिए यहां आता हूँ।  प्रकृति के साथ भी अपना सामंजस्य खूब बैठता है। 

बात करते करते दोनों कितनी दूर निकल आये ये पता ही नहीं चला।  जब तक कानों में मंदिर से आ रही आरती की आवाज़ नहीं पड़ी।

लेकिन गंगा आप से ईर्ष्या होती है। 

मुझसे !!! वो  भला क्यों ?

ये जगह जहां आप रहती हैं , ये हरे भरे पहाड़, ये चीड़ के पेड़ों के जंगल, ये बुरांस के फूलों के जंगल , वो देख रही हो झरना , और ये गदेरा !!!! कुदरत ने दामन भर दिया है।  

Thursday, January 16, 2020

क्या लेकिन आनंद ? गंगा का सवाल

आनंद २ मिनट खामोश रहा। 

मैंने कुछ पूछा आनंद। 

हाँ सोच रहा हूँ किन किन लेकिन को गिनाऊँ , किन किन लेकिन का जवाब दूँ।  अच्छा चलो यूँ कर लेते हैं।

क्या कर लेते हैं ? By the way

फ़िक्रे दुनिया में सर खपाता हूँ
मैं कहाँ और ये बवाल कहाँ। 

मुझे लग रहा था की आप सीधे सीधे जवाब नहीं देंगे। 

वैसे मैं आपको एक बात बताता चलूँ की गंगा से ये मेरी ग़ालिबन पहली मुलाक़ात है लेकिन बात ऐसे कर रहें हैं की पुरानी आशनाई है लेकिन ये भी नहीं लगता की पहली बार मिले।  गोया ये ज़रूर है की नाम से एक दूसरे से आशनाई ज़रूर थी।  मंदिर में बच्चों को पढ़ाते पढ़ाते गंगा का नाम सुना था और ग़ालिबन इसी तरह उन्होंने ने मेरा।  बकौल बशीर बद्र साहब "गुफ़्तगू उनसे रोज़ होती है , मुद्दतों सामना नहीं होता"।

क्या सीधा जवाब दूँ ? और सीधा जवाब कोई हो भी तो। 

आप मंदिर में कब से रह रहे हैं ?

२ महीने हुए।

यहाँ भी उसी कारण आये हैं ?

कौन सा कारण ? ओह वो।  मैं अगर न कहूं तो गलत होगा। 



Tuesday, January 14, 2020

क्या है यार !

क्या है ये जिंदगी।  नहीं नहीं कितने बंधनों में बंधी है ये जिंदगी। 

नहीं नहीं बंधी नहीं , मैंने खुद बाँध राखी है। 

मन करता खुल कर जीने को , खुल कर उड़ने को , जो करना चाहता हूँ , वो करने को , पढ़ने को, लिखने को दौड़ने को भागने , पहाड़ में जाने को

लेकिन

क्या लेकिन आनंद ?


Monday, September 16, 2019