Sunday, December 5, 2010

मेरा क्या ....अंतिम किस्त

मुझे घर छोड़ कर आनंद आगे चल दिए. मै कुछ पल वहीं इंतज़ार करती रही की शायद एक बार मुड़ कर देखे. लेकिन..... वो तो आगे ... फिर आगे.... और आगे चले गए. मै सोचती रही कि इस इंसान को , जो इतना संवेदनशील हो, उसको जब अपने बारे मे दुनिया कि राय सुनाई पड़ती होगी.....तो तकलीफ तो इसको होती होगी.... दिल तो इसका भी टूटता होगा......लेकिन ..... चेहरे पर एक भी शिकन नहीं आने देता.....

ज्योति...... माँ की आवाज़ आई.

आई माँ....

अकले आई इतने अंधरे में....

नहीं माँ.... आनंद जी छोड़ गए.

तो वो अंदर क्यों नहीं आया.... तबीयत कैसी है उसकी?

अंदर क्यों नहीं आये..... इसका जवाब तो वही दे सकते हैं....तबीयत पहले से ठीक है. तीरथ राम के घर गए हैं... कह रहे थे दवा लेनी है.

अरे..... मैं तो राम सिंह के हाँथो कहना भिजवा रही थी...

तो भिजवा दो.... वो एक घंटे में वापस लौटेंगे.

ठीक है..... माँ वापस रसोई मे चली गयी.

मै आनंद .. की नदी और दो किनारों वाली बात पर सोचने लगी. ...... कितना गहरा और पवित्र रिश्ता है... हमारा. कितनी स्पष्ट और सरल सोच....... वो समझते हैं की मेरे दिल मे क्या है.....लेकिन आज तक... कभी भी उन्होंने.... इस का ज़िक्र तक नहीं किया. एक सम्मान का भाव महसूस किया है मैने, जब मे उनके साथ रहती हूँ .....क्या ये जरुरी की ऐसे रिश्ते को किसी नाम की जंजीर से बाँधा ही जाए......अपने दिल की बातों को अकसर वो बड़े ही आसानी से कह देते हैं..... एक दिन हंसते हंसते बोले..... ज्योति , मै इज्ज़त ना कमा पाया, आजतक. ..... बात आई-गयी  हो गयी....... लेकिन ये तो मैने भी देखा है..... की कोई भी जो मुँह मे आये....आनंद की लिए बोल देता है.... और आनंद मुस्करा के जहर को पी लेते हैं....... लेकिन..... अरे हाँ..... उनका गुस्सा..... अरे तौबा.....एक बार मेरे उपर एक ने कटाक्ष कर दिया था... और बात उन तक पहुँच गयी........बाप रे  बाप....क्या हाल किया था उसका......लेकिन क्रोध  भी संतुलित होता है......बिलकुल  जितना होना चाहिए..उतना ही.

दीदी...... अब राम सिंह की गुहार..

बोलो... काका...मैं यहाँ हूँ...अपने कमरे में.....

दीदी.....आनंद बाबू ने ये किताब भिजवाई है आप के लिए..... और कहा है की इसको पढ़ लें.

ठीक है......लाओ. (इसको पढ़ लें) मेरी खिंचाई करने मे उनको विशेष  रस मिलता है, मगर मुझे भी  अच्छा लगता है. कितना अधिकार झलकता है.

"आवारा मसीह" ....... क्या शीर्षक है.

एक छोटी सी स्लिप किताब के अंदर...."नाम पे ना जाओ....किताब को पढो" ..... हे भगवान्... क्या उनको पता था की किताब का शीर्षक देखकर में प्रथम प्रतिक्रिया क्या होगी....... आनंद.... आनंद....तुम भी.......नहीं- नहीं  ....आप भी....ना.
..........................................................................................................................................................
आज चौथाई किताब खत्म हुई.... और उसके बराबर मैने आनंद को फिर खड़ा पाया. आवारा..... दुनियाबी भाव मे आनंद आवारा नहीं है.... लेकिन ना घर का होश, ना खाने-पीने की फ़िक्र, वो आदमी अपने लिए नहीं जीता ... इसी बात पर तो मेरा  और उनका झगडा  हो जाता है........चाय और चुरुट पर जो आदमी ज़िन्दगी गुजार देने का हौसलारखता हो.......उसको क्या कहे.

आवारा मसीहा का शरत चंद.... और मेरा आनंद.... (मेरा कहने का साहस पहली बार किया है.. वो भी खुद से) .... पुर्षोतम के १२ साल के बेटे की मृतु पर आनंद ने मुझसे कहा...की देखो पैसे वालों और गरीब ....दोनों के आंसूओं का कोई रंग नहीं होता.....किसी अपने के जाने पर दिल मे उठी टीस....कोई फर्क नहीं करती.....रिश्तों मे दरार आने पर.........आँख  मे अगर नमी ना हो..... तो क्या उसको इंसान कहना चाहिए...... अरे हाँ...... ये पुर्षोतम वहीँ हैं......जिन्होने.....आनंद को....मेरे साथ देख लेने पर चरित्र , निर्माण की शिक्षा दे डाली थी......लेकिन आनंद ...... अपने कर्तव्य से कभी पीछे नहीं दिखे... चाहे वो किसी के लिए भी हो.......आम भाषा मे....दुश्मनों के लिए भी........

हाँ..... आनंद .... हम दोनों एक नदी दो किनारे हैं.......ये मेरा वादा हैं तुमसे की अगर ज़िन्दगी की इस नदी मे कभी  भावनाओं की बाढ़ आ भी आगई.....तो किनारे कभी नहीं टूटेंगे.....

शाख से टूट जाएँ , वो पत्ते नहीं हैं हम,
आँधियों से कोई कह दे , की औकात  मे रहें.

रिश्तों की ख़ूबसूरती.....उसकी गहराई मे है.....वो किस तरह से बना , इसमे नहीं....

कितनी आसानी से मेरे और आनंद की रिश्ते की बात, आनंद ने......चतुर्वेदी जी को समझाई थी... चतुर्वेदी साहब....क्या आप पुनर्जन्म मे , वापस इस पृथ्वी पर आना चाहेंगे?

न रे  ना.... बस ये ही पूरा  हो जाए.....

तो फिर आप.... मेरे और ज्योति की रिश्तों को समझने के चेष्टा  ना करें.....क्योंकि उसके लिए पुनर्जन्म लेना पड़ेगा आप  को.......जब तक रिश्तों के बारे में , आप लोगों की सोच का दायरा  शरीर तक ही सीमित है.... तो ये मेरी प्रार्थना है...की किसी पर कटाक्ष ना करें.....नेतिकता...आप लोगों के लिए.. सिर्फ शरीर और बिस्तर तक ही सीमित है.......

चतुर्वेदी जी चुप......

माफ़ करियेगा.....अगर मैने आप को तकलीफ दी हो.... आनंद की क्षमायाचना...... मैं आनंद  को देखती रही... उन के एक - एक स्वर मे जो दृढ़ता थी... वो महसूस करती रही......

आज किताब खत्म हुई.......किताब का आखरी पन्ना... और आनंद की एक शेर......

किसी चिराग का अपना मकाँ नहीं होता,
जहाँ रहेगा, वहीं रौशनी लुटायेगा.....

इति.........

Saturday, December 4, 2010

मेरा क्या २....

कैसी तबीयत है, अब.. ज्योति का अपेक्षित सवाल ......ठीक है...... बोलो.....उसी का जवाब.

सवाल भी तुम्हारा .... जवाब भी तुम्हारा......मैने सर उठा कर हलकी सी आवाज़ मे कहा....

क्या हुआ..... आवाज़ इतनी धीमी  क्यों है.....दूसरा सवाल.....

इसका जवाब भी तुम दोगी , या मैं दूँ....?  मेरा मजाकिया लहजा..

वो भी हँस पड़ी......चलो आप ही बता दो.....

सर मे दर्द है.....कल रात से.

रात से............ ? ज्यादा है.......? ज्यादा ही होगा तभी तो सर पर पट्टी बंद कर बैठे हो......

एक कप चाय बना दोगी......

हाँ..... मैने भी नहीं पी है. सोचा कि यहीं पी लूँ.

तुम सोचने भी लगी हो........चलो अच्छा है.....

तुम ना..........

ठीक है..... आज कल अच्छी चाय बनाने लगी हो.... कहीं से सीखी है...क्या.....

क्या मतलब.....?

नहीं ..... नहीं ...... तलवार ना निकालो..... थोड़ा सा मजाक करने का मन था सो कर लिया. पिछले जन्म के कुछ अच्छे कर्म होंगे मेरे.......तभी तो इस जन्म मे इतने अच्छे लोग मिले हैं......

अरे.... वाह.....क्या काम है ... जो इतनी मक्खनबाजी हो रही है.....

कुछ नहीं .... काम कुछ नहीं......अकेले अकेले रहते सोचता और आत्ममंथन करता रहता हूँ.....

तो अकेले क्यों रहते हो......कुछ करो ..... कि ये अकेलापन दूर हो .... आप का भी और ........

और..... मतलब......

लो चाय पियो......

ज्योति कि झुकी हुई आंखे और कांपते हुए हाँथ....वो सब कह रही थीं.... जो वो नहीं कह पा रही है....मै देख रहा था और समझ रहा था.....लेकिन.....कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं.....जो दूर रह के ज्यादा करीब होते हैं.....वहाँ फासले जिस्मो के हो सकते हैं.....दिलों के नहीं. शायद ऐसा ही कुछ रिश्ता है.... ज्योति के साथ... खैर...

क्या सोच रहे हो.....चाय की पहली चुस्की के साथ, ज्योति का पहला सवाल.

जी..... ये काम मेरे बस का नहीं है....

आनंद...... आप कब तक ज़िन्दगी की हकीकतों को मजाक मे लेते रहोगे...

आज पहली बार ज्योति के मुँह  से अपना नाम सुना.....अच्छा लगा.मन तो किया की उस से बोलूं.... की जरा एक बार मेरा नाम लो.....काफी दिनों बाद अपना नाम सुना... नहीं तो बाबूजी, भैया, सर.... इन्ही उदबोधो से उद्बोधित होता रहता हूँ... दिन भर, हफ्ते भर.....मेरा भी एक नाम.... माता-पिता जी के बाद ... कोई नाम से पुकारने वाला बचा ही नहीं.....

नहीं ज्योति... मै मजाक मे नहीं लेता. लोग ऐसा समझते हैं....तुमको याद होगा , तुम तो इतहास की छात्रा रही हो....किसी ने कहा है ना...."Laugh, world will laugh with you, cry and you cry alone" , मै क्यों अपनी करुण कथा, या अपना दर्द दूसरों को बोलूं.....

रहिमन निज मन की व्यथा, मनही रहूँ गोय.
सुन लेहे इठ्लीयेंह सब, बाँट ना लेहे कोई.

वो तो बात है......

और फिर.... अगर हम किसी को अपने करीब पाते हों..... और उसके बाद भी सारी बाते कह के समझानी पडें... तो ये नहीं कहना चाहिए की कोई करीब है.... क्या मैं गलत हूँ?

नहीं.... सही कह रहे हैं आप .....आप इतना सोचते हैं.....?

क्यों ...क्या मैं इंसान नहीं हूँ....या मेरे ह्रदय नहीं है.....?

नहीं.... नहीं मेरा वो मतलब नहीं था.....

मै समझता हूँ... ज्योति. .....मै ज़िन्दगी से संतुष्ट हूँ....जो मिल गया उसी को मुक़द्दर समझ लिया, जो रह गया मै उसको भुलाता चला गया.....चाहने की कोई इन्तेहा नहीं है.....हो सकता है... की मैं तुमको भी चाहता हूँ..... लेकिन...

उम्र जलवों मे बसर हो , ये जरुरी तो नहीं.....

जो कुछ मेरे नसीब मैं लिखना था लिख दिया,
परवरदिगार, अब तेरी जरुरत नहीं रही....

उसने तो जो लिखना था, लिख कर भिज दिया इस दुनिया मे हमको ..... अब ये हमारे उपर हैं...कि हम उसको कैसे वापस करते  हैं.....

मै अभी आता हूँ....जरा एक चुरुट पी कर...

आनंद बाहर चले गए..... और मैं आनंद के इस रूप पर सोचती रह गयी..... ये इंसान इतना गहरा है.....लोग क्या क्या इसके बारे में कहते हैं....कितनी सरल है , इसकी सोच. कितनी स्पष्ट.....क्या मैं इनसे आज बोल दूँ कि मैं..... ना रे ना.... जो इंसान इतना समझता है.... क्या वो मेरे दिल कि बात नहीं समझता होगा.....

हाँ जी.... आज कुछ उपदेश ज्यादा हो गए ना.....एक कप चाय कि तो बनती है.... पियोगी.....?

आप बनाओगे....?

मोहतरिमा.....आप मुझे क्या समझती हैं..... जो आदमी सिर्फ चाय पर ज़िन्दगी गुजार देता हो.... वो चाय नहीं बना सकता?

अच्छा ...... आनंद... आप बैठो....मै बनाती हूँ....?

ज्योति रसोई मै चली गयी.... मैं बैठा बैठा सोचता रहा....ज्योति....अगर ह्रदय बोल पाता तो आज तुम बोल पड़तीं...लेकिन मै समझ रहा हूँ....जो तुम्हारे ह्रदय में है....लेकिन पगली.....मै तुम्हारी बहुत इज्ज़त करता हूँ, और सामान करता हूँ...जो तुम्हारे ह्रदय में..है.

लो चाय ......

वाह..... अच्छा .... जाड़े की शाम... गोरा सा चाय का कप, साँवली से चाय, उडती हुई भाप.....किसी रहस्यवाद  मे ले जाता है.

बाप रे....किसी की तारीफ़ करनी हो तो आप को बुला ले.....शब्दों के जादूगर हो तुम .. आनंद. 

शुक्रिया.....आज कल चाय अच्छी बना रही...तबीयत तो ठीक हैं ना... तुम्हारी. मेरा हल्का सा मजाक.

ज्योति मेरी तरफ देखती रही.....

ऐसे क्या देख रही हो.....

में देख रही हूँ और सोच रही हूँ.... की भगवान् ने क्या स्वभाव आप को दिया.....क्या आप पिछले जन्म मे विश्वास  करते  हो?

क्यों.....

नहीं पहले बताओ.....

हाँ...

तो पिछले जन्म मे कुछ रिश्ता रहा होगा... मेरा आप से...

सुनो एक बात कहनी है......

बोलो....

माता पिता...मेरे लिए.....

ये अच्छी बात है.....उसकी बात काटते हुए मैने कहा.... मै समझ रहा था की वो क्या कहना चाहती है..

ये आप कह रहे हो....?

ज्योति.....तुम जानती हो, समझती हो... की अगर मै किसी को अपना मानता हूँ.. तो तुम हो, किसी को अपना कहता हूँ तो तुम हो... इस रिश्ते की ख़ूबसूरती को महसूस भी करती हो तुम....जानती भी हो तुम. क्या ये जरुरी की हर रिश्ता आग के चारों तरफ घूम कर ही मजबूत होता हो? मेरे लिए रिश्ता महत्वपूर्ण है....वो किस तरह बना है ये नहीं. कितनी बार, आग के चारों तरफ लिए हुए रिश्ते जल जाते हैं......और दिलों के रिश्ते , जहाँ पर जिस्म साथ नहीं होते..... अमर हो जाते हैं.....

मै समझ रहीं हूँ....लेकिन आपका ख्याल कौन रखेगा?

जिसने इस दुनिया मे भेजा है... वही ख्याल भी रखेगा. मै मजाक नहीं कर रहा हूँ... ये सत्य है....कम से कम मेरे लिए तो  है ही....

नजदीकी....दिलों की चाहिए....जिस्मों की नजदीकी.....मेरे लिए ज्यादा महत्व नहीं रखती.

शाम हो गयी है..... तुम घर चलो. माता - पिता जी को मेरा नमस्कार कहना. जरा खूँटी से मफलर उतार दो... मै भी जरा नदी के किनारे घूम आऊं.... कमरे मे बैठे  बैठे थक गया हूँ....चलो तुमको भी घर छोड़ दूंगा.

सर दर्द  कैसा है....मफलर देते हुए ज्योति का सवाल.

अब कुछ कम है..... इतना बोल लिया ना.....सर हल्का हो गया....

तीरथ राम से दवा भी लेनी है......ये दखो..नदी के दो किनारे देख रही हो.....ये दोनों  कभी नहीं मिलते... लेकिन रहते साथ साथ हैं....तुमने  कभी एक किनारे की नदी सुनी है......नदी...हमारी ज़िन्दगी है.........इधर मैं,  उधर तुम..... अलग - अलग मगर साथ - साथ.

ये जीवन  है.

Friday, December 3, 2010

मेरा क्या....1

तबीयत कैसी है.....? एक कोमल सा स्पर्श मैने माथे पर महसूस किया. और एक मधुर सी आवाज़ उसके कानो मे पड़ी.


कौन है....? आँख खोलते हुए मैने पूंछा.


अरे .....  आप?


कितने  दिनों से बुखार है........? उनका सवाल.


अरे कुछ नहीं...... यही कुछ सर्दी जुकाम हो गया है. लेकिन आप को किसने बताया...... मेरा सवाल.


किसी ने नहीं.......२-३ दिनों से देखा नहीं...... इसलिए चिंता हुई. .. कुछ दवा वगैरह ली?


मै  मुस्करा दिया......


मुस्कराओ  नहीं......जवाब दो . दवा ली?


नहीं......


बिना दवा के ठीक हो जाओगे....? या आत्महत्या का इरादा है......


मै चुप....


तुम इतने लापरवाह क्यों हो.... खासकर अपने लिए..... बोलो तो. उसने कमरे मे बिखरे हुए कपड़ों और किताबों को को सम्हालते हुए सवाल पूंछा. क्या करूँ.... आप का.


मै फिर चुप......


चुप क्यों हो...... बोलो.


क्या जवाब दूँ....? कल शरीर इतना तप रहा था कि कहीं जाने कि हिम्मत नहीं हुई. .. किस से कहता..?


रामसिंह से ही कहलवा देते. वो तो यहाँ दिन भर था...... बता रहा था...... कि २ दिनों से कुछ खाया भी नहीं है... आप ने.


ये रामसिंह भी ना........


क्या राम सिंह भी ना........


उससे बोला था कि कुछ ना कहे , ज्वर है कुछ दिन मे ठीक हो जाएगा.


उठो...... ये रोटी और सब्जी खा लो.


मै ज्योति की आवाज़ मे अपनापन और आँखों मे नमी और माथे की सिलवटों को पढने की कोशिश कर रहा था.


जल्दी खाओ..... दवा भी लेनी है.....


हे भगवान्...... आप तो पूरी तैयारी से आईं हैं.


क्या करूँ...... कोई और हो जो आप को देख ले तो मै चिंता ना करूँ.


मैने  चुपचाप २ रोटी खा लीं , और वो वहीं बैठ कर पंखा झलती रहीं....

२ रोटी और ले लो...

अब ना खा पाउँगा...

अच्छा ..... ये दवा लेलो...

आजकल  मालिन माँ नहीं आ रही हैं क्या..... रसोई कितनी गन्दी पड़ी है....

मै साफ़ कर लूंगा..... आप तकलीफ मत करिए.....

क्या..... !   क्या मत करिए.... फिर से बोलो तो.....

कुछ नहीं.....में  वहीं चारपाई पर लेट गया.

मै उनकी तरफ देख कर....मन मै उनके  सरल स्वभाव कि बारे में सोचती रही.... कितना सरल इंसान है ये, कितनी सरलता से बात मान जाते हैं.... और लोग  कितना फायदा उठाते हैं इनका... और ये बात ये  भी जानते हैं.....ना खाने पीने का ध्यान, ना कपड़ों  कि चिंता.... बस किताबे और चुरुट....कोई परेशान है... इनके कान मै बात पड़ जाए तो रात ना दिन, ना सुबह ना शाम.....बस सेवा... और इनका ध्यान कौन रखे....

सुनो..... सो गए क्या...?

नहीं... बोलो...?

कुछ पैसे हैं.....?

वहाँ कील पर कुर्ता टंगा है... उसमे होंगे...

अरे...... इतना सारा पैसा.....कहाँ से आया....?

परसों बैंक से निकला था..... रामदीन को  बिटिया कि स्कूल कि फीस देनी है.... उसने मांगे  थे.....अब इस बात पर मत गुस्सा करना.

आप ना...... क्या करूँ आप का.

अब मै क्या करता....उसने माँगा...

तो मना करना तो आप को आता नहीं है......ना.

वो जो बसेसर को आप ने पैसे दिए थे.... वो लौटा दिए उसने....

तुमको किसने बताया...........

आप नहीं बताओगे तो क्या मुझे पता नहीं चलेगा.....?

तुम तो सर्वज्ञ हो......

मैं  मजाक नहीं कर रही हूँ......क्यों इतने लापरवाह हो अपने लिए.....कौन आया तुमको देखने.....

कमला बता रही थी कि कल तुम वहाँ गए थे....

हाँ... उसके बेटे कि तबियत ठीक नहीं थी...

तो आप उसको अस्पताल ले गए थे.....

अरे बाप रे.... तुम तो पल पल कि खबर रखती हो....

रखनी पड़ती है..... जानती हूँ तुमको ... और तुम्हारे स्वभाव को ... इसलिए.

उसको छूत कि बीमारी है.....जानते हैं ना आप.

हाँ...... तो क्या उसको ऐसे हे छोड़ देता?

मालूम है... कल पंचायत मे बात हो रही थी.... कि

कि.... जो छूत के बीमारों के पास जाएगा.... उसको गाँव मे अलग कर दिया जाएगा...जब तक बीमारी गाँव मे है.....

अरे... वाह.....कितना सुकून होगा.

आप का मै क्या करूँ......आप को कुछ हो गया तो......

कितना अपनापन है...इसके गुस्से में. मैं ज्योति का चेहरा देख रहा था. कितने सालों से ये मेरा ध्यान रखती है....मै जानबूझ कर ऐसा नहीं हूँ..... नहीं देखा जाता मुझसे दूसरों का दर्द.

ये लो..... चाय

चाय...!

इतना  चौंको मत.... जानती हूँ...कि तुम बिना खाने के रह सकते हो ..... बिना चाय के नहीं.....मीनमेख मत निकालना चाय में.

जी......

मैं एक बार फिर.... उनका चेहरा निहारती रही.... कि कैसे इंसान है ये.... दूसरों के लिए रोता है..... प्रार्थना करता है.....अपने लिए....ये बात इनकी समझ मे नहीं आती...... ये कौन सी मिट्टी के हैं.....

अच्छा .... मै अभी जा रही हूँ..... रात के लिए खाना मोहन के हाँथो भिजवा दूंगी...खा लेना....और हाँ... ये १०० रुपए लिए हैं...

जी...... वो चली गयी. कब आँख लग गयी पता नहीं.

बाबूजी........

कौन है....

मै हूँ....... राम सिंह

आओ राम सिंह... ये क्या है झोले मे....

ज्योति दीदी ने कुछ फल भिजवाये हैं.....

अच्छा तो १०० रुपए इसलिए मांगे थे..... भगवन ...मैने जरुर पिछले जन्म मे कुछ अच्छे कर्म किये होंगे.....

राम सिंह...इनको रसोई मे रख दे....

नहीं बाबूजी ... दीदी ने कहा है.... कि खिला कर आना...नहीं तो घर मत आना.

हे राम ... ये तेरी दीदी भी ना....

नहीं बाबूजी ... दीदी के लिए कुछ ना कहिये... वो घर पर बहुत रो रहीं थीं......

क्यों.......?

बता रहीं...थीं कि आप कि तबीयत ठीक नहीं रह रही है......और आप कुछ, किसी से बताते नहीं हैं.....बाबूजी दीदी .... आप कि चिंता करती हैं....

अच्छा.... राम सिंह... अब तू चल.....और जा कर दीदी से कह देना...कि मै फल खा लूँगा...... उनकी डांट खाने से तो अच्छा है कि, फल खा लूँ....है कि नहीं....

आप भी ना बाबूजी.......अच्छा चलता हूँ.... राम राम ... जल्दी ठीक हो जाओ आप.

राम सिंह चला गया.. अपने पीछे कई अनुतरित सवाल छोड़ कर....

दीदी रो क्यों रही थीं...क्या मै जानता नहीं... लेकिन आदमी कितने ही पैर क्यों ना उचका ले...चाँद को नहीं छु सकता.

Thursday, December 2, 2010

...... अंत निकट है.

एक निराशा छाती जा  रही है मन में.....ज्यों ज्यों तुम्हारी डायरी के पन्ने ख़त्म होने को आ रहे हैं....
कुछ ही पन्ने तो शेष बचे हैं.... फिर उसके बाद..... चिट्ठी ना कोई ना सन्देश, है ऐसा कौन सा देश जहाँ तुम चले गए...... मेरा मन नहीं और पन्ने  पढने का..... खत्म हो जायेगी डायरी....फिर मै क्या पढूंगी.....
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पेज नम्बर ८७.....

ज़िन्दगी तूने लहू ले के दिया कुछ भी नहीं.... तेरी झोली मे मेरे वास्ते क्या कुछ भी नहीं......

तुम जानती हो मैने अपने लिए  कभी किसी से कुछ नहीं माँगा......उससे भी नहीं...... दर्द को चुपचाप , हंसी के पर्दे पीछे छुपाने का हुनर मैने कहाँ से सीखा पता नहीं......अगर कभी पलकों की कतारों मे कुछ नमी महसूस हुई.... तो नींद के बहने कुछ देर आंख्ने बंद कर लेना ...... कोई ना समझ  पाया...... मेरी पलकों पर ये आंसू प्यार की तौहीन  हैं, उसकी आँखों से गिरे, मोती के दाने हो गए....

मेरे पिता जी ने मुझे समझाया बेटा " Some cause happiness wherever they go and some cause happiness whenever they go" .....मै अपने को wherever वाली श्रेणी मै लाते लाते खो गया... लेकिन हारा नहीं.... प्यार बाँटूगा.... बाबा.... आप को निराश नहीं करूंगा.....आप जहाँ भी हो ... अपना आशीर्वाद बरसाते रहना.... माँ से भी कहना मै बहुत खुश हूँ.

तुम तो जानती हो ..... तपस्वनी.....की मेरी हमेशा से यही कोशिश रही की कोई मेरे दिल की  तह तक ना पहुँच  पाए..इसलिए सब को हंसी-मजाक मे लगाये रखने का हुनर .... मैने बदस्तूर ज़िंदा रखा. तुम ने कितनी बार मेरी इस आदत को समझते हुए मुझपर गुस्सा भी किया......अब तो दिन, हफ्ते और महीने गुजर जाते हैं.... मे बोलता नहीं हूँ..... चुप.....शांत.....काफी समय से मे हंसा नहीं हूँ..... हंसने को दिल बहुत करता है.... लेकिन जब अकेले हंसता हूँ..... तो लोग  देखते हैं.....एक - दो गाली दे लेते हैं, माँ बच्चों से " बेटा पागल है.... " ये कह कर दूर कर लेती हैं.....कुछ बच्चे एक दो पत्थर मार कर भाग जाते हैं......अच्छा लगता है... उनका मनोरंज हो जाता है.... दूसरों को खुश  करना भी तो एक कला है....है ना.....बोलो तो. घर से बहुत दूर है मंदिर चलो यूँ कर लें, किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए. ... कभी कभी गाँव के छोटे छोटे बच्चों के बीच,  मै जोकर बन कर नाचता हूँ.... तो वो खिलखिला  कर हंसते हैं...... तब मुझे  अपना जोकर बनना अच्छा लगता है. मेरे दिल के किसी कोने मे एक मासूम सा बच्चा , बड़ो को देखकर दुनिया मे, बड़ा होने से डरता है.

ओफ़..... कितना लिखता हूँ मै.......मेरा बदन जल रहा है....लगता है फिर बुखार है..... पास मे मस्जिद है.. चलो शायद इमाम साहब के पास कुछ दवा मिल जाए.....

कहते हैं की जब तक दिल पर चोट नहीं लगती......वो नहीं मिलता........ ना बुतखाने , ना काबे मे मिला है.. मगर टूटे हुए दिल मे  मिला है...... अब मै उसकी मर्जी पर चलता हूँ. सिर्फ उसकी मर्जी.......

लो मस्जिद भी आगई.... चलो आज रात यही गुजर होगी.

इमाम  साहब से पता  चला की तुम्हारा गाँव यहाँ से कुछ दूर ही है... पैदल चलने पर भी ३ घंटे मे पहुंचा जा सकता है...... ठीक है..... कल जल्दी चल दूंगा....आज फिर दिल ने एक तमन्ना की, आज फिर हमने दिल को समझाया.....

९ फरवरी ---- मै कृष्ण मंदिर पहुँच गया. बाबा से मुलाक़ात हुई.... उन्होंने तो नारायण समझ कर मेरी ख़ातिर करदी.... कहने लगे... ना जाने किस वेश मे नारायण मिल जाए......मुझे उनके भोलेपन ने जीत लिया...... आज २ रोटी की खातिर तुम्हारे दरवाजे पर आया , लेकिन चौकीदार  ने २ गालियाँ देकर भगा दिया..... मै हँस रहा था...भाग्य पर और भाग्य विधाता  पर.....

तबीयत अब ठीक नहीं रहती....... इसलिए अब अपने आप को उसको सौँप देना चाहता हूँ.... बीनी रे झीनी चदरिया. ज़िदगी का जो  प्रीपेड कार्ड उसने दिया है..... वो व्यर्थ के टॉक टाइम मे ना जाय.... किस का टॉक टाइम कितना है..... कौन  जानता है. ......

प्यार बांटो और प्यार करो... लेकिन मेरी तरह चरित्रहीन ना बनना.... बहुत तकलीफ होती है, अंदर तक भेद जाती है ...जब कोई , किसी प्रेमी को चरित्रहीन कहता है.

मुस्करा देताहूँ जब भी ग़म कोई आता है पास,
बद्दुआ की काट मुमकिन है कोई, तो है दुआ......

जो कभी ना कह सका, वो सब लिख दिया..... अब ये इस डायरी की किस्मत है कि किसके हाँथ मे पड़ती है.....चूरन वाला इसमे चूरन बांधता है....या ये किसी कि अमानत बनती है.......देखते है.....जैसे फूल कि किस्मत... कि देवता के सर चढे या अर्थी पर .......

.कलम मे स्याही खत्म हो रही है और डायरी मे पन्ने भी ...... अंत निकट है.

शरीर हटा दो...तो सिर्फ प्रेम शेष रह जाएगा.
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तुम्हारी डायरी खत्म हो गयी.... लेकिन ८८ पन्नो मे... बाकी १२ पन्ने कहाँ गए....किस से उन १२ पन्नो का हिसाब मांगू......बोलो तो? कितना कुछ था तुम्हारे अंदर और तुम लोगों को बहलाते रहे..... क्या कभी कोई ना मिला जो तुम को समझता..... लेकिन तुम भी तो निर्मोही थे..... कभी किसी से मोह हुआ नहीं....और अगर हुआ तो उसको अपने दिल कि गहराइयों मे छुपा ले गए...... क्यों किया तुमने ऐसा......

रंजिश ही सही, दिल को दुखाने  के लिए आ, आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ......

मरने वालों को भी नहीं मिलते हैं मरने वाले,
मौत ले जा के ख़ुदा जाने कहाँ छोडती है.....

तुम मरे  नहीं हो.......तुम मर भी नहीं सकते.......४४ साल कि उम्र कोई उम्र होती है......एक बार आओ.... दो रोटी मांगने के लिए ही सही.....एक बार आओ......

Wednesday, December 1, 2010

यही तो हैं मेरे दिन रात.....

२ दिन बाद मंदिर गयी..... मानो ऐसा लगा कि जैसे मंदिर से भगवान् रूठ गए हों...... इतना सन्नाटा...... ख़ामोशी की भी आवाज़ सुनाई पड़ रही थी...


बाबा......


हाँ बिटिया..... मिट्टी , मिट्टी में मिल गयी. कैसा प्राणी था... वो? ३ महीने ही तो रहा था.... और तीन महीनो में ही जीत कर चला गया.


मैं बाबा से क्या बोलूं.... ३ महीने......अरे उनको तो मै १७ सालों से जानती थी......


बिटिया ...... ये उसका सामान है..... चाहो तो तुम ले लो.


क्या सामान है बाबा......


कुछ किताबे, कुछ डायरियां, कुछ कागज़ के टुकड़े....


लाओ बाबा.... मैं रख लेती हूँ. 


घर चल दी.... क्योंकि मुझे सब कुछ जानना था उनके बारे मैं... 


डायरी खोली..... पहला पन्ना....


हमारे हुस्न की इस बेरुखी से था तुम्हे शिकवा, 
मगर सच ये की ना था कोई मेरा चाहने वाला. 


मै घूमता रहा इधर से उधर, यहाँ से वहाँ.... की कोई मिले जो मुझे प्यार करता हो......किसी को शरीर की जरुरत थी, तो किसी की नज़र पैसे पर थी. कुछ दिन नौकरी भी करी..... लेकिन सब को कुछ ना कुछ चाहिए था मुझसे. लेकिन मुझे कोई ना चाहता था. 


बहुत देखभाल की, एक माली की तरह रिश्तों को संभाला, निभाया लेकिन..... सब बिखर गए.....हैं....... 

अब एक फिर तलाश मै निकला हूँ.... ली कोई मुझे...... यानी मुझे.... चाहने वाला मिल जाए..... लेकिन लगता नहीं है..... शरीर भी अब साथ नहीं दे रहा है. तुमको याद होगा... जब एक बार रिश्तों की आंधी, और मोलवियों के थपेड़ों ने मुझे तोड़ा था... तब तुम्ही थीं जिसने आगे बढ़कर.... मुझे संभाल लिया...वो ऋण मै कैसे  अदा कर पाउँगा. जब जमाने की जुबां आग और गालियाँ उगल रही थीं तब तुम्हारे प्यार और हमदर्दी ने मरहम लगाया की मै जिन्दा हो गया.....

मै सब कुछ छोड़ चुका हूँ....जिम्मेदारियां निभाते निभाते इंसान से मशीन बन गया.... अब तो फक्कड़ बन गया हूँ...जो  मिलता है चार गालियाँ दे ले या हमदर्दी..सब दिखावा है....

कल नीमसार गया था.... वहाँ तुम्हारे पड़ोस मे रहने वाली कुसुम मिली.... उसने बताया की तुम दक्षिण भारत मे कहीं बस गयी हो.... मै तो आस ही छोड़ चला था..... मालिक का नाम लेकर पड़ यात्रा पर निकल तो पड़ा हूँ...... देखते हैं किस के दरवाजे पर ये प्राण - पखेरू  उडते हैं.... सिर्फ इतना पता है की उपराड़ी गाँव के किसी कृष्ण मंदिर के पास तुम्हारा बंगला है.....

पैदल चलते चलते कई महीने गुजर गए..... कई मौसम बीत गए..... जमीन से बढ़कर माँ नहीं मिली और आसमान से बड़ा पिता नहीं मिला... कभी भी अपनी गोद मे सो ने से उसने मना नहीं किया......आज ३ महीने बाद तुम्हारे गाँव पहुंचा हूँ.... कितने अच्छे है तुम्हारे गाँव के लोग....मुझ जैसे अनजान आदमी को भी बाहें खोल कर सीने से लगाने को तैयार हैं...... कितना हंसते है तुम्हारे गाँव वाले..... अंजलि कितनी प्यारी बिटिया है... चिड़िया जैसी फुदकती रहती है.... लेकिन स्कूल नहीं जाती है.... तुम इसकी पढ़ाई का इंतजाम देखलो.....बाबा.....का ध्यान रखना... वो मुझे अपना समझने की गलती कर रहे हैं..... और तुम तो जानती हो...मै जिसका था... अब वहीं जाना चाहता हूँ......

बहुत नींद आ रही है, एक लम्बी नींद नहीं आ रही है...... तेरे आगोश मे सर हो , ये जरुरी तो नहीं......मेरे अंदर एक बेचेनी है.... एक गुमनाम मौत की  बेचेनी... मै ऐसे नहीं मरना चाहता... मुझे बचा लो......मै शांत हो चला हूँ....... और शांत......धीरे धीरे  एक खामोशी मेरी तरफ बढ़ रही है...... मै रोज़ अपने को थोड़ा कम होता हुआ देखा रहा हूँ......

मै कैसे कहूँ जानेमन....मेरा  दिल कहे मेरी बात,
तेरी आँखों की स्याही, तेरे होंठो का उजाला ,
यही तो हैं मेरे दिन रात......

मै कभी भी अपने दिल की बात ना कह पाया.....  

Sunday, November 28, 2010

इस बार ये जिद तुम्हारे कृष्ण से.....

मै पत्र को हाँथ मे पकडे वहीं सोफे पर बैठ गयी.........क्या मेरी दुनिया खत्म...?

मंदिर जाऊं.....ना जाऊं..... जाईं... ना जाऊं......

जाऊं तो क्यों जाऊं....... ना जाऊं तो क्या ना जाऊं........ ये किस तरह के जाल मे फंसा कर चले गए........

तुम ऐसे जा नहीं सकते.......मेरा विश्वास इतना कमजोर नहीं है.

कब मै उठी... और कब मंदिर   कि तरफ चल दी.... पता नहीं......

हवा को क्या हो गया है...... इतनी तेज.....आंधी तो नहीं..... अब और आंधी क्या आएगी......

मंदिर आ गया.......पंडित जी खामोश बैठे  हैं, अंजलि कि आंखे सूख चुकी हैं..... अब इनसे क्या पूंछू..... या कैसे पूंछू कि फ़कीर कहाँ है......

पंडित जी ने मुझे देखा..... हाँथ से बरगद के पेड़ कि तरफ इशारा कर दिया और खामोश. मै पेड़ कि तरफ बढ़ी और रुकी..... क्या कर रहे हो...... कैसे देखोगी उसको........ अंजलि मेरे पास आई.... और मेरा हाँथ पकड़ कर पेड़ के तरफ ले चली......दीदी.... ये प्यार बाँटते थे.....
शांत, ध्यान मे मग्न...... मन मानने  को तैयार नहीं कि ये नहीं हैं...... वापस पंडित जी के पास ..... सब कुछ जाने के लिए.

कैसे हुआ ..... बाबा?

बेटी..... दीवाली से ३ रोज़ पहले आया था..... बिलकुल खामोश. प्रणाम करके मंदिर के अंदर चला गया और अपनी कृष्ण से बाते करता रहा....... बाहर आया..... एक कप चाय मांगी...... और तब से पेड़ के नीचे इसी मुद्रा में हैं..... ना खाना, ना पानी...... मेरी भी इतनी भी हिम्मत नहीं कि हाँथ पकड़ कर देखूं कि नब्ज चल रही है कि नहीं.......

ऐसा मत बोलो बाबा.....

अंजलि.... मेरे कमरे में खूटी पर उसको झोला  टंगा है...ला दे बिटिया.

अभी लाई बाबा..

ये लो......

लो बेटी... ये उसका झोला है...... जो उसने खुद मुझे दिया कि बाबा इसको अपने पास रख लो.....

मैने झोला में से सामान निकला..... एक डायरी, कलम, घडी, १२ रुपए और एक चिलम. 

उत्सुकता .... डायरी खोल कर पढने कि...... पहला पन्ना....२४/०५/२००४.

माँ...... " इस जमाने के लायक कैसे बनूँ.....इतना नीचपन मेरे बस का नहीं..."  तुम तो चली गयी...... दुनिया बिखर  के रह गयी.

१२/०७/२००४- भाई साहब के घर गया , एक कप चाय हाँथ मे देती हुए भाभी ने पूंछा.... भैया कितने दिन कि छुट्टी ली है...? माँ.....मे एक दिन रुक कर चला गया.

डायरी का पाचवां पन्ना...... पैदल चलते आज ढाई महीन हो गया.... अब तो भिक्षा मांगने कि आदत पड़ गयी..... २ रोटी मे काम चल जाता है. कुछ गाँव वाले तो मुझे २ रोटी वाला फ़कीर कहने लगे हैं.

डायरी के अंतिम कुछ पृष्ठ....आज भारत के द्कस्हीं हिस्से मे पहुँच  गया......देखो तपस्वनी के दर्शन होते हैं कि नहीं....... सुना था कि इसी गाँव मे रहती है.....

प्रेम......अगर व्यक्त करके समझाना पड़ा... तो प्रेम मे कमी है..... दिया कभी जल कर नहीं कहता कि मै जल गया, उसकी रौशनी बताती है. कभी ना कभी तो उस तपस्वनी को पता चलेगा.... कि यू ही कोई फ़कीर नहीं बन जाता. मै इस गाँव के कृष्ण मंदिर में रहूंगा.... कुछ दिन.....

अपने उद्गम को लौट रही, अब बहना छोड़ नदी मेरी.
छोटे से अणु  मे सिमट रही, ये जीवन की पृथ्वी  मेरी.  

बाबा....अब आप क्या करोगे.....

ये कहाँ का था....... बिटिया...वहाँ   भिजवा दे........

ये कहीं का नहीं था..... और ये सब का था..... इसलिए आज इसका कोई नहीं है.

लेकिन... फ़कीर...... तुम जानते  हो ना....मै कितनी जिद्दी हूँ.....

इस बार ये जिद तुम्हारे कृष्ण से.....

सुनते हैं कि मिल जाती है हर चीज़ दुआ से,
एक रोज़ तुम्हें मांग के  देखेंगे ख़ुदा से.

Wednesday, November 24, 2010

इसलिए ये पत्र लिखा.....

दीदी......... अंजलि की हांफती हुई आवाज़.

क्या है..... क्यों हांफ रही है....... अरे तू तो रो रही है...... क्या हुआ....? बाबा तो ठीक हैं ना.....

दीदी..............

ले पानी पी...... अब बता क्या हुआ.......?

दीदी........ फ़कीर.............

अरे क्या हुआ फ़कीर को....... वो तो धनुषकोटि में हैं ना......

नहीं दीदी.........

वहाँ गए थे......... लेकिन दिवाली से कुछ दिन पहले ही मंदिर मे आये और वहीं रह  रहे थे......

थे...... मतलब ?

अब वो नहीं हैं........

चले गए......कहीं..... बिना बताये गायब हो जाने की आदत से मे वाकिफ थी.

हाँ.... दीदी.... फ़कीर ... चले गए...... लेकिन शरीर यहीं छोड़ कर गए.....

क्या...............?

हाँ दीदी....... फ़कीर नहीं रहे.

............................................... कैसे अंजलि.... वो कब आये ............

में सोचती ही रह गयी..... की अभी कुछ दिन पहले ही तो मैने तय किया था..... की कोई रिश्ता नहीं रखूंगी उनसे. क्या बुरा मान गए......

दीदी.... आप मंदिर आ रहे हो ना..... अंजलि का भीगा हुआ स्वर.

नहीं..... मै ना आ पाउंगी. कैसे कहूँ..... कि मैं क्यों  नहीं आ सकती

अच्छा दीदी....... मैं जाती हूँ.... अंजलि धीरे धीरे चली गयी.

दीदी....... ये पर्चा फ़कीर कि जेब से मिला .... किसी तपस्वनी को लिखा  है......

दिखा तो.....

"मै कभी अपने दिल कि बात तुमको बता ना सका..... मैने तो तुमको तपस्वनी समझ लिया, लेकिन तुम कैसे चुक गयी...... कि मै फ़कीर बन गया. तुम मेरे साथ या मेरे पास नहीं थीं... लेकिन मै तुमको अपनी शक्ति समझता था, समझता हूँ.... लेकिन पिछले कुछ दिनों से .... ना जाने क्यों....... एक अजीब सा अकलेपन समाता जा रहा था मुझमे. लग रहा था कि किसी अपने ने दामन समेटने कि प्रक्रिया शुरू कि है और मेरा तुम्हारे सिवा कोई नहीं था. मैं बोल नहीं पाया...... कभी भी.... मुझे  लगता था... कि तुम समझती हो...... और तुम समझती भी हो..... लेकिन......

तुमको याद होगा ....... एक दिन मैने तुमसे कहा था...... कि ऐसा लगता है कि मेरे अंदर वो शक्ति है कि मैं जब चाहूँ.... शरीर छोड़ सकता हूँ......... आज मै ध्यान मै बैठ रहा हूँ...... इस विचार के साथ..... कि बस और नहीं....अगर हो सके तो मुझे समझने कि कोशिश , एक बार और करना......मै उतना बुरा नहीं था..... जितना मुझे समझा गया........ अपना बहुत ध्यान रखना. कई बार तुमसे मुलाक़ात कि चेष्टा भी करी... लेकिन... पंडित और मोलविओं के डर से कदम ना उठ सके.

तुमने ... हमेशा संबंधो को बनाये रखने कि कोशिश कि.... और ये बात मुझसे अच्छा और कौन जानता है. अगर इस पत्र को पढ़कर तुम्हारी पलकों पर एक भी आंसू आया....... तो मैं समझूंगा कि ज़िन्दगी काम आ गयी.

मेरे मौला, इस तपस्वनी कि ज़िन्दगी मे इतनी ख़ुशी भर दे...... कि इसको कभी भी मेरी याद ना आये......

मै जानता हूँ कि तुम मेरे आखरी वक़्त मे मेरे पास नहीं आओगी........ इसलिए ये पत्र लिखा.....