Monday, February 21, 2011

वक़्त.....तुम सुन रहे हो न

वक़्त को रुका हुआ कभी नहीं देखा मैंने....क्या तुमने देखा है...? ओरों के लिए वक़्त की क्या परिभाषा है...मैं नहीं जानता...और नहीं मुझे कोई रूचि है......लेकिन मेरे लिए वक़्त रुका हुआ है.....तारीखों पर तारीखें बदलती जा रही हैं.....लेकिन मेरा वक़्त नहीं, इस वक़्त मेरा वक़्त मेरे साथ नहीं है....कुछ रूठा हुआ है.....कुछ नाराज़ है......मेरा वक़्त खराब है.

बोलो न.....अब चुप क्यों हो....? कोयल गाती हुई ही अच्छी लगती है, फूल इठलाते हुए ही अच्छे लगते हैं.....मांग सजी हुई ही अच्छी लगती है.....तुम चहचहाती  हुई ही अच्छी लगती हो.....अब मान भी जाओ....और हँस के दिखा दो....एक बार.....सिर्फ एक बार...... अच्छा बाबा....मेरे सामने न सही...तो अकेले में ही सही....लेकिन हंसो न......तुम्हारी हंसी भी जिन्दगी देती है मुझको को......

वक़्त.....तुम सुन रहे हो न....तुम को तो कोई नहीं रोक पाया..लेकिन तुमने मुझे रोक दिया....कहाँ - कहाँ तुमने मुझे रोका है...तुम से अच्छा कौन जानता है....पानी बहता हुआ और वक़्त चलता हुआ ही अच्छा लगता है.....ये कुदरत का नियम है. ......मैं दरिया हूँ पर तुम वक़्त हो...दरिया का बहाव भी वक़्त के साथ बदल जाता है......वक़्त तुम बहुत बलवान हो......मुझसे नाराज़ हो..?

तुम्हारे  बिना.....मैं...????? तुमने कागज के गुलाब तो देखे होंगे......खूबसूरत होते हैं...लेकिन खुशबू  नहीं होती....देखो मेरे और इम्तिहान न लो......पास नहीं हुआ इम्तिहान में तो फेल हो जाऊँगा.....

तुम समझ रही हो न....वक़्त.....चलो.....मेरे वक़्त मेरे साथ चलो, मुझे ले कर चलो. मैं जब -जब वक़्त के साथ नहीं चला....गिर पड़ा.....

वक़्त टिक - टिक करो.....करो न...........देखो अब मान भी जाओ.   

Sunday, February 20, 2011

हालात .......

हेल्लो......क्या मैं अंदर आ सकता हूँ......

कौन....ओह....आनंद.....आइये......कैसे आना हुआ....?

कुछ काम नहीं था....इधर से गुजर रहा था, सोचा सलाम करता चलूँ....हांलांकि  मौसम अब बदल रहा है....

बैठिये...चाय लेंगे...? 

नहीं......तक्कल्लुफ़ न करिए. 

और बताइए.....आराम से हैं...आप..? 

हाँ...सब ठीक है......सब कुशल है.....आप बताइए....

सब ठीक है.......

दोनों चुप......दोनों के पास बाते बहुत हैं...लेकिन  दोनों चुप.... 

ये किताब नयी ली है ...आप ने.....

हाँ......अच्छी है.

कभी केशव प्रसाद मिश्र की कोहबर की शर्त पढियेगा..... माफ़ करियेगा बिना पूंछे सलाह दे रहा हूँ. आप को पढने का शौक है इसलिए बोल बैठा.

नहीं नहीं कोई बात नहीं.....अरे लाइट चली गयी.....मैं जरा लालटेन जला दूँ.....

जी.....

फिर चुप्पी......शाम हलके हलके रात के दामन में समाती जा रही थी....लेकिन यहाँ पर दो लोग चुप्पी  के सहारे बात कर रहे थे.....आज पहली बार उसने मुझसे पूंछा की चाय पियोगे....जो ये जानती है की चाय तो मेरी संजीवनी बूटी है......लेकिन आज ओपचारिकता निभाने का वक़्त है....जो दिल कभी एक साथ धड़के हों...उनको अलग होने में थोडा वक़्त तो लगता है, थोड़ी तकलीफ भी होती है..थोडा खून भी बहता है...वो खून लाल रंग का नही होता, वो अरमानों का खून होता है, वो सपनों का खून  होता है,  वो उम्मीदों का खून होता है.....और इन सब का रंग लाल नहीं होता......

आप की तबियत कैसी है.....५ मिनट के अंतराल पर एक सवाल .

ठीक है......२ सेकंड में जवाब. 

आप आज कल स्कूल नहीं आ रहे हैं.....? दूसरा ओपचारिक सवाल. 

मैंने इस्तीफ़ा दे दिया है......तुरंत  जवाब.  

उसकी आँखों ने पूंछा क्यों?

लेकिन मैं होंठो के हिलने का इंतज़ार करता रहा.....की सवाल आये.

लेकिन कोई सवाल नहीं.......

अच्छा अब चलता हूँ......तुम्हारा  का काफी समय ले लिया मैंने....

नहीं ....ऐसा कुछ नहीं है.

 थोड़ी ठंड है...कुछ गर्म पहन लीजियेगा...तुमको को ठंड जल्दी असर करती है.  अच्छा नमस्कार........ कहा सुना माफ़ करियेगा.


ये आनंद और ज्योति के बीच का संवाद है....

Saturday, February 19, 2011

खाली फ्रेम.....

ये खाली फ्रेम देख रही हो ...... ज्योति...... इसमें  कई सालों से एक तस्वीर हुआ करती थी...मैं नाम उजागर नहीं कर रहा हूँ.....क्योंकि किसी अपने के चेहरे पर रुसवाई के बादल मुझे नामंजूर है....जिस चेहरे पर रुसवाई के बादल होंगे...वो चेहरा भी किसी मेरे अपने का ही होगा.....

कुछ तो मजबूरियां रहीं होंगी.....
यूँ ही कोई बेवफा नहीं होता.....

अच्छा ...ज्योति एक बात बताओ क्या फ्रेम में से तस्वीर निकाल लेने से....इंसान भुला दिया  जा सकता है.....? मुझे तो यूँ लगता है की...खाली फ्रेम उस  इंसान की याद और दिलाता है.....जिस की तस्वीर उस फ्रेम में थी......अगर शिव के मंदिर से शिव की मूरत हटा दी जाए...तो क्या शिव मंदिर नहीं रहेगा....? खैर....हर इंसान की अपनी-अपनी सोच होती है.....मैंने कभी भी किसी पर अपनी सोच मनवाने का जोर नहीं डाला....तो आज भी नहीं डालूँगा.....इसीलिए...अपने दिल में कुछ तस्वीरें बसा ली हैं.....ताकि वो ख़ास तस्वीर किसी फ्रेम की  गुलाम न बने. .....बस ये खाली फ्रेम एक टीस जरुर पैदा करता है.......अगर इजाज़त दो....तो मिर्ज़ा ग़ालिब का एक कीमती शेर अर्ज़ करूँ.....

कोई मेरे दिल से पूंछे, तेरे तीर-ए-नीमकश  को.......आधा धंसा हुआ तीर 
ये खलिश कहाँ से होती, जो जिगर के पार होता. 

तो ये जो खाली फ्रेम है...ये तीर-ऐ-नीमकश है.....जो टीस पैदा करता है....और अगर ये टीस किसी अपने खासमखास से मिली हो...तो इसकी ख़लिश दुगनी हो जाती है......और वो बिरले ही होते हैं....अजूबे ही होते हैं....जिनको ये दर्द नसीब होता है..... तुमसे इसका बयाँ क्या करना.... तुम तो खुद इस दर्द से गुजरी हो.....इस दिल में अभी और भी जख्मों  की जगह है....अबरू की कटारी को दो आब और ज्यादा.....

शम्मे महफ़िल जल उठी, और जल गया परवाना भी,
देखना ये है, उजाला किसके मुस्तकबिल में है....

देखो.....ये खाली फ्रेम....तुम्हारे और करीब ले आया है.....लेकिन....जोर न डालो, परेशाँ न हो....नाम नहीं लिखूंगा......ये जुबाँ किसी ने खरीद ली, ये कलम किसी का गुलाम है. ....मैने हमेशा से..ओरौं के दर्द को मरहम समझ कर अपने दिल मे समेटा है.....और मरहम समझ कर लगाया भी...उससे मैं अपने दर्द भूल गया....लेकिन

अब उसके दिल पे मेरी हुकुमत नहीं रही,
अब दस्तरस से ये भी इलाका निकल  गया.

वक़्त की बड़ी यारी रही है मेरे साथ.....एक दर्द से तबियत ठीक से रंगेज़ नहीं हो पाती...दूसरा दरवाजे पर खड़ा होता है....अब बताओ दरवाजे पर अगर कोई खड़ा हो....तो उसको स्वीकार तो करना ही पड़ता है.....ये संस्क्रति की सीख है.....सभ्यता की सीखा है.....मैं जानता हूँ...मेरे जैसे असभ्य के मुंह से , सभ्यता की बाते.....अरे तौबा.

कल वक़्त मिला.....और बोला...और मियाँ.....अभी भी और अभी तक ज़िंदा हो.......मैने कहा.....मियाँ....जायेंगे भी तो जब अब वक़्त मुकरर करेगे, जब आप इज्ज़ाज्त देंगे....वक़्त से पहले तो मैं खुदा के सामने भी नहीं हाज़िर होउंगा....

तो तब तक......वक़्त का सवाल....?

क्या तब तक.......ये खाली फ्रेम....मुझे एहसास दिलाता रहेगा......की यहाँ पर कौन था....

वो मेरी पीठ में खंजर जरुर उतारेगा,

मगर निगाह मिलेगी तो कैसे मारेगा.

बताइए.....अगर एक खाली फ्रेम का ये तासुब (impact) है. मेरे दिल पर  तो इसमे लगी हुई तस्वीर , अगर कुफ्र न समझें तो अर्ज़ करूँ.....तुझमे खुदा देखता था मैं.   

तुम्हारे रहमो-करम पर जरूर हैं लेकिन,
हम अपने शहर में जीने का हक तो रखते हैं....

तुम से मना किया था न....

तुम से मना किया था न....

तुमको समझाया था , न.....की उससे दूर रहना....उसको छूत की बीमारी है.....गाँव वाले यूँ ही तो उसको उलटा सीधा नहीं कहते.....उसको यूँ ही तो गाँव से नहीं निकाल दिया......लेकिन चलो ...अच्छा हुआ...की तुम ने खुद अनुभव कर लिया और राहें जुदा कर लीं......वो है ही नहीं....सभ्य और अभिजात्य   समाज मे रहने लायक......अब तुमको भी इस बात का एहसास हो जायेगा...की उसके यहाँ से चले जाने में.....कितना सुख और शान्ति है.

जी..... मैं सतीश के बारे में ही बोल रही  हूँ.....अब आप ने देखा....उसका क्या चरित्र है.....? अरे ऐसे आदमी को सूली पर लटका देना चाहिए....और वो भी चौराहे पर....ताकि भविष्य में कोई भी इस छूत की बीमारी से ग्रसित न हो...... आप ने अपना status  देखा है...न Mrs. Sharma. ....ठीक है मन से वो आप से कुछ attach  हो गया था....लेकिन....पैरों की धूल क्या माथे  पर लगाई जा सकती है......जो जो कदम आप ने उठाये हैं...इस छूत की बीमारी से बचने के लिए......मैं आप के साथ हूँ.....जब आँख खुले, तभी सवेरा...........रही बात उसकी.......तो क्या आप ने उसकी ज़िन्दगी का ठेका ले रखा है...? अरे ....जाने दीजिये न.....कितने ही इस तरह लोग रोज़ पैदा होते हैं...रोज़ मरते हैं..... ख़ाक डालिए.

अब आप ही देखिये....कितनी खुश और स्वस्थ्य दिख रहीं हैं आप...और हैं आप.....अरे, जिसका ख्याल भी मन मे....बीमारी पैदा कर दे....उस से तो मीलों की दूरी अच्छी.....वो कुछ दिन तड़पेगा, परेशान होगा.....फिर एक दिन शांत हो कर.....इस जमीन की खुराक हो जायेगा......कम से कम एक चरित्रहीन तो इस दुनिया से कम होगा.....मुहब्बत करता है..............दूर रहिये उससे.....         

और सुनिए .....अभी न छेडिये जिक्रे मुहब्बत, जलाल्लोदीन अकबर सुन रहे हैं...... 

Friday, February 18, 2011

.दिल ने ये कहा है दिल से........

कोई अनुशासन ही  नहीं है, अजीब आप-धापी मची रहती है...जब देखो. इतना भी ख्याल नहीं रहता है की इन्हीं के बीच से होकर साँसों को भी आना-जाना होता है.....बेचैनियों जरा रास्ता तो दो की सांस आ जाये. रोज़ सांस कम से कमतर होती जा रही है.....जरा सा तो लिहाज करो.....

उसकी याद आई है साँसों ज़रा धीरे चलो,
धड़कनो से भी इबादत में खलल पड़ता है!


एक बाज़ार सा लगा  रहता है....मेरे सीने में....हसरतों का.......कई बार तो मैंने साँसों को भी समझाया है की.....साँसों जरा धीरे चलो.....तुम्हारे बेतरतीब आने से भी इबादत में खलल पड़ता है....लेकिन कोई मानने को तैयार ही नहीं है.....एक विद्रोह मेरे अंदर खुद से.....एक क्रान्ति......एक तरफ दिमाग अपनी सारी फौज ले के खडा है...और दूसरी तरफ दिल अकेला. कई बार दिल तो सम्हल जाता  है लेकिन दिमाग अपना संतुलन खो बैठता है......और ये लीजिये......फिर दिल ही दिमाग को समझाता भी है.....ये कैसी दुश्मनी है......चल हट पगले .....दिल और दिमाग में दुश्मनी.............कभी हो ही नहीं सकती....

एक बाजू काटने पे तुले थे तमाम लोग, 
सोचो, कैसे दूसरा बाजू......... न बोलता. 

लेकिन....सीने में होती हुई इस घुटन से मैं परेशान हूँ.....क़िबला.....इसीलिए  जब मौका मिलता है...एक दो गहरी सांस ले लेता हूँ.....क्या करूँ...जीना भी तो है.....हज़रात...मैं जिदगी को मजबूरी समझ कर नहीं जीना चाहता....ये तो अल्लाह-ताला की सबसे बड़ी नेमत है.....कम से कम इतना जरूर चाहता हूँ..की ये चादर , जैसी उसने दी है....अगर इसमे मखमल के पैबंद न लगा सकूँ तो कम से कम टाट के पैबंद तो न लगाऊं....बाहर के तूफानों  को मैं झेल जाता हूँ.....अपने आप को किसी महफूज़ जगह बंद कर के....लेकिन इन अंदर के तूफानों का क्या करूँ........क्या अपने आप से भाग जाऊं.....लेकिन भाग के जाऊं कहाँ.....

इनको  समझाओ..... की देखो, मेरी मानो......एक बात समझ लो....मुझको  और तुमको रहना तो साथ साथ ही है...ता-उम्र. .....इसलिए कभी  तुम मेरी मानो...कभी मैं तुम्हारी....इस तरह बगावत करने से...तो हासिल कुछ भी नहीं होगा....हाँ एक घुटन जरूर होगी.....देखो साँसों की डोरी को चलने  दो....अगर वो सलामत ...तो सब सलामत. 

कल दिल ने मुझसे  से कहा...की तू तो पागल है....तू एहबाब के साथ रहना चाहता है, दोस्तों के बीच रहना चाहता है.... इसलिए नहीं की तू दोस्त-पसंद इंसान है...बल्कि इसलिए की तू डरपोक इंसान है...दोस्तों के बीच रहकर तेरा अपने आप से सामना ही नहीं होता....अरे उठ सामना कर अपने आप का, क्यों किसी के उपर निर्भर करता है......

कौन देता है यहाँ साथ उम्र भर के लिए, 
लोग तो जनाजे में भी कंधा बदलते रहते है. 

जब तू अकेला होता है...तो विचार, दिल के भाव, हसरतें, घाव....सब तुझ पर टूट पड़ते हैं..और तू डर कर....अपने आप से भागता है....मत कर ऐसा.... विचार, दिल के भाव, हसरतें, घाव....ये सब तेरे खुद के ईजाद किये हुए हैं....तेरी खुद की तामीर हैं....तोड़ दे इनको और निकल चल इन सब से बाहर....फिर देख.....क्या शानदार मुस्तकबिल तेरा इंतज़ार कर रहा है.....तू कदम तो बढ़ा....वो तुझको गोद में बिठाने को तैयार है, मुन्तजिर है .....लेकिन तू अपने बनाये इस जंजाल से निकल ही नहीं पा रहा है.....

तेरी तामीर के किस्से कहीं लिखे न जायेंगे,
तू जंगल से गुजरने के लिए रस्ता बनता है..........

ये जो  हसरतों का जंगल तूने खुद अपने सीने में तामीर किया है....इसको तोड़....इसमे से रस्ता बना....और वो देख..................मुस्तकबिल....शानदार......हाँ...एक बात और...शुक्रिया अदा कर उन लोगों का..जिन्होने तुझको आज इस हाल में ला के छोड़ दिया.....

बुलंदी देर तक किस शख्स की हिस्से में रहती है,

बहुत उंची इमारत हर घड़ी खतरे में रहती है.


दिल ने ये कहा है दिल से.   

एक प्रयोग....या सच्चाई...

मेरे बारे में तुमसे कोई पूंछे,  तो कह देना,

वो इंसान तो अच्छा था, पर बदनाम बहुत था.

बोलियाँ तो लगी थीं बाज़ार में मगर,

वो इंसान बाज़ारू या बिकाऊ नहीं था.

कहने को तो हम भी उसके करीबी थे मगर,

उसको आदमी पहचानने का शऊर नहीं था.

इसलिए बना लीं दूरियाँ हमने......

सब उसके अपने थे कोई गैर नहीं था.

कोई गैर नहीं था..............कोई गैर नहीं था.





Monday, February 14, 2011

१४ फ़रवरी की शाम...

१४ फ़रवरी....बहुत शोर सुनते थे पहलू में दिल के, जो चीरा, तो कतरा-ए- खूँ ना निकला.....
Valientine's day यानी प्रेम का दिन...या प्रेमियों का दिन.....लीजिये हुज़ूर.....अल्लाह ने ३६५ दिन बनाये....इंसान ने उसमे भी अपनी अक्ल लगा दी...आज ये दिन , आज वो दिन.....Valentine day, friendship day, Promise Day, Mother's day, पता नहीं father's day होता है या नहीं....खैर मेरे लिए हर दिन Valentine day होता है....अगर ना हो..तो मर जाऊं.....

मैं किसी की critical analysis नहीं कर रहा हूँ....हर आदमी स्वतंत्र है यहाँ....मैं तो इक अजीब सा हादसा बयाँ कर रहा हूँ जो कल रात मेरे साथ गुजर गया....ऑफिस से लौटते-लौटते १० बज गए थे...मेरे कमरे से कुछ दूर वाले मकाँ से रोने की आवाज़ सुनाई पड़ी....तो फिर इक अंदरूनी से जंग दो-चार हो गया......क्या हुआ है...इतनी रात को..कौन रो रहा है....मैं जहाँ रहता हूँ....वहाँ के लोगों की बोली मेरी समझ में नहीं आती है....क्या पूंछु..कैसे पूंछु.....१० बज रहे हैं...घर चलो.....आराम करो.....लेकिन इक छोटे बच्चे के रोने की आवाज़ ने पैरों में बेड़ियाँ पहना दीं..... दिमाग कह रहा था...की अपने घर जा रे.लेकिन पाँव साथ देने को तैयार  ना थे....क्योंकि उस बच्चे की रोने की आवाज़ तो इंसानों जैसी थी.....वो ना तमिल में रो रहा था, ना तेलगु में, ना कन्नड़ा में, ना हिंदी में, ना अंग्रेजी में....नहीं रहा गया में उस झोपडी में पहुँच ही गया....

झोपडी के अंदर रहने वाली माँ की तबियत काफी खराब थी....लोग काफी जमा थे....अस्पताल ले जाने की तैयारी कर रहे थे.....दो बच्चे....उम्र यही कोई ३-४ साल की होगी.....पता नहीं माँ की हालत देख कर या वहाँ पर जमा हुई भीड़ को देख कर रोते ही चले जा रहे थे.......मैं उन दोनों बच्चों को लेकर और उनके साथ कुछ और बच्चे मेरे कमरे पर आ गए....उन बच्चों के पिता ने मुझसे कन्नड़ा में कुछ कहा...जो मेरी समझ में नहीं आया ...लेकिन उसके चेहरे की परेशानी और आँखों में भरे हुए चिंताओं के रंग ने मुझे बताया की वो कह रहा की आप जरा बच्चों को देख लो......मैंने  उससे कहा की आप अस्पताल जाओ...बच्चों की चिंता मत करो........में हिंदी...वो कन्नड़ा...लेकिन प्रेम की भाषा वो भी समझ गया..और मैं भी.....

तुम तो जानती हो ज्योति......मेरे पास बच्चों के लायक खिलोने नहीं होते....उनको देने की लिए टॉफियाँ नहीं होती....फिर मैंने पागल या जोकर होने का रूप रचा ...... और खूब नाचा उन बच्चों के बीच, मेरा गान उनकी समझ में नहीं आ रहा था, लेकिन उनकी तालियों की आवाज़ और पहले तो शर्माती हुई हंसी, और बाद में खुल के हंसती हुई आवाज़ ने मुझ में जोश भर दिया..............और ईनाम में जानते  हो मुझे क्या मिला...............................वो दोनों बच्चे ............. हंसने लगे...........

और उनको हंसता हुआ देख कर, बाकी बच्चे भी खुश हो गए.....और फिर तो मेरे कमरे पर खूब धमा-चौकड़ी  हुई......मैंने महसूस  किया....की जब वो दो बच्चे रो रहे थे.....तो बाकी सारे बचे भी चुप थे.....शायद वो उन बच्चो की चिंता या डर समझ रहे थे...लेकिन जब वो दोनों हँसे....तो सब हँस  पड़े...ख़ुशी  और आंसू ...इनकी कोई भाषा नहीं होती........फिर रात में १२:१५ बजे सब बच्चों के साथ मिलकर मैंने bread  और jam  खाया......

अब तुम  बोलो...इससे अच्छा Valentine day क्या हो सकता है....मैने ख़ुदा से फिर इक इल्तिजा की....

कम से कम बच्चों की  हंसी की ख़ातिर,
ऐसी मिट्टी में मिलाना की खिलौना हो जाऊं.