Saturday, February 12, 2011

पुरानी दिल्ली...2

ओह...इस कमबख्त आँख को इतना भी सलीका नहीं की किस राह से बचना है...किस छत को भिगोना है...

इक बार रो लो.....आनंद. ...क्या पुरुष हो इसलिए रोने में संकोच है.....

नहीं...ज्योति....ऐसा कुछ नहीं हूँ....लड़ कर उपर उठना ही मेरी फितरत है....पर इक दिल है....जो महसूस करता है...इसलिए कभी कभी..........

गम मुझे, हसरत मुझे , वहशत मुझे, सौदा मुझे,
इक दिल दे कर खुदा ने दे दिया क्या क्या मुझे.....

जानती हूँ....आनंद....और समझती भी हूँ....जानते हो हम मजबूर या लाचार कब होते हैं......जब सब कुछ जानकर , सब कुछ समझते हुए भी...और चाहकर भी................हम कुछ कर ना सकें......उससे बड़ी लाचारी क्या होगी....?

सही कह रही हो....ज्योति...शायद इसीलिए..अब मैं दूसरों के दर्द में, जिसमे कुछ कर ना सकूँ..... दूरी रखता हूँ....जितना करीब जाता हूँ...उतना ही दर्द और महसूस होता है.....और कुछ ना कर सकने के कारण....जो गुस्सा अंदर ही अंदर उठता है...वो अपनी लाचारी और मजबूरी का एहसास करा देता है.....हम से मजबूर का गुस्सा भी अजब बादल है, जो अपने ही दिल से उठे, और अपने ही दिल पर बरसे......पता नहीं ....क्या चाहता है वो ...मेरा मन तो कभी कभी तो उससे भी शिकायत करने का करता है....

जो कुछ मेरे नसीब में लिखना था, लिख दिया.
परवरदिगार, अब तेरी जरूरत नहीं रही......

और क्या बोलूं..बोलो तो. ...जो कुछ उसने लिख दिया है...उसको पूरा करना ही तो अब मेरा काम है....कभी आग से गुजर के...कभी बादलों पर चलते हुए....कभी आँधियों का सामना करते हुए, कभी आँधियों का रुख मोड़ते हुए.....

आनंद...अपने इस गुस्से को ठंडा मत होने देना......क्योंकि यही गुस्सा तुम को तुम्हारी मंजिल तक ले कर जाएगा....जानती हूँ....किस किस आग में झुलसे हो तुम.....

दुनिया ना जीत पाओ तो, हारो ना खुद को तुम.
थोड़ी बहुत तो जहन में नाराजगी  रहे.......

तुम ठीक कह रही हो ज्योति......अगर बुरा ना मानो तो .............तो दवा दे दो......और मालिन माँ से कह दो की दो प्रेमी जनों के  लिए चाय बना दें.....

अच्छा जी ......

हाँ.................अच्छा स्वामी जी.......मैं कह देती हूँ.....धन्यवाद ...कन्या.

वो उठ के चली गयी...मैं सोचता रहा...कितना अपनत्व है इसके शब्दों में, कितनी चिंता है....सब कुछ जानती है मेरे बारे में...लेकिन कितनी शांत और संयमित रहती है....सब कुछ है इसके पास...लेकिन दिल का इक कोना, जो सालों साल से खाली है....जिसमे ये अपने प्रियतम को रखती है....कोई भी उस कोने तक पहुँच ना पाया...इसलिए...ज्योति को ज्योति  की तरह  कोई समझ नहीं पाया....ये भी इक पुरानी दिल्ली है....इसीलिए....मेरे दर्द को वो..और उसकी घुटन को मैं....समझ लेता हूँ. कितनी बार इस दिल्ली ने भी आँधियों की मार झेली है....

कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है
मगर धरती की मजबूरी सिर्फ बादल समझता है.
मैं तुझसे दूर कैसा हूँ, तू मुझसे दूर कैसी है.....
ये मेरा दिल समझता है, या तेरा दिल समझता है.....
मुहब्बत इक एहसासों की पावन सी कहानी है...
कभी कबीरा दीवाना था, कभी मीरा दीवानी है.....

जिस दिल...में ये एहसास बसते  हों.....वो तो पुरानी दिल्ली ही हुए......लुटने की लिए तैयार.

हकीकत जिद लिए बैठी है चकनाचूर करने को,
मगर हर आँख फिर सपना सुहाना ढूंढ लेती है....................ये मेरी कमजोरी है.

सुनो आनंद......

जी .......ये तो मेरा अब job profile बन गया है.......

क्या......job profile बन गया है

सुनना ......

ओहो....आनंद ......कुछ खाओगे....नाश्ता किया है....?

दे दो.....दवाई भी लेनी है.....

मालिन माँ ............... दो पराठे भी बना दो......आनंद के  लिए.

आनंद...इक बात बताओ.....

पूंछो....

मै रोती  हूँ तो लोग आ कर कंधा थपथपाते हैं,
मैं हंसती  हूँ तो लोग अकसर रूठ जाते हैं.........ऐसा क्यों ?

ज्योति......हम लोग अकसर अपने दुखों से उतना दुखी नहीं होते हैं...जितना हम दूसरों को सुखी देख कर दुखी होते हैं......इसलिए जब आंसू बहते हैं......तो वो लोग हमदर्दी इसलिए नहीं दिखाते की वो दुखी हैं.....वो इसलिए की वो हमारी good books में आ जाए......और जो सचा हमदर्द होता है..ना..ज्योति....वो हमदर्दी दिखाता नहीं है....अपितु..जिस वजह से हम दुखी हैं...उस कारण को हटाने का प्रयत्न करता है...वो stage पर सामने नहीं आता....लेकिन अपना काम कर जाता है......और रहू दूसरी पंक्ति......तो किसी मेरे खुश रहने पर कई लोगों के सीने पे सांप लोट जाते हैं..... और फिर वहाँ से शुरू होता है अफवाहों का सिलसिला.....और उस ख़ुशी का कारण जाने का सिलसिला...और कारण को हटाने का सिलसिला....

और हम जैसे लोग.....जो हैं...ज्योति.....इनको भगवान् ने लुटने के लिए ही भेजा है....जा...प्यार बाँट...प्यार बांटना बच्चों का खेल नहीं है...ज्योति...ये तुमसे अच्छा कौन जानता है.....क्योंकि गुलाब बांटने में कई बार हाँथो  को कांटो से भी गुजरना पड़ता है.....लेकिन जिसको गुलाब की चाह होती...उनको कांटो का डर भी नहीं होता.

क्या इसीलिए .....दिल्ली बार बार लुटती है....?

हाँ...और इसीलिए बार बार बसती भी है.

जानती हो ना ज्योति.....मुझे कई लोगों ने कहा...की मुझको दुनिया में जीने का हुनर नहीं आता....मुझको दुनियादारी नहीं आती.....हाँ नहीं आती.....

उसी को जीने का हक है इस जमाने  में,
जो इधर का लगता रहे , और उधर का हो जाए...........ये नई दिल्ली है..... 

Friday, February 11, 2011

पुरानी दिल्ली-1

ज्योति.... तुम तो जानती ही हो...इतिहास की छात्रा रही हो....की पुरानी दिल्ली की किस्मत मे कितनी बार लुटना लिखा था.

अब क्या इतिहास पढ़ोगे ?.....आनंद.

क्या इतिहास पढूं....ज्योति.

तो फिर ये इतिहास का ज़िक्र क्यों आया.....?.......कुछ तो है की जिसकी परदादारी है.....

खाली दिमाग शैतान का घर......इसलिए.

आनंद.....अगर तुमको बताना होता है....तो तुम बिलकुल सीधे तरीके से समझा देते हो.....लेकिन अगर तुमको कोई बात नहीं बतानी है तो तुम आदमी को "China to Peru" घूमा देते हो.

हूँ......... तुम समझने लगी हो मुझे. अब खतरनाक हो गयी हो.....

अच्छा जी......तो अब क्या करेंगे...आप ? साथ में police protection रखेंगे .........

अजी सरकार......police  की गिरफ्त से भली तो आप की गिरफ्त है.

बाते करवा लो....आप से....बस. ..... बातों के धनी हो तुम .....आनंद.

ज्योति.....जानती हो कुछ दिल ऐसे होते हैं.....जैसे पुरानी  दिल्ली....

क्या मतलब.....

पुरानी दिल्ली कितनी बार बसी...कितनी बार उजड़ी.....कितनी बार इसको लूटा गया....कमबख्त .....मेरा दिल ना हुआ...पुरानी दिल्ली हो गया..... कितने ही तैमूर आये, कितने ही बाबर आये...कितने फिरंगी आये....लेकिन ये कमबख्त...फिर भी धडकता रहता है.... और धडक रहा है... 

ले बेटा....... ये रही दवाई. मालिन माँ की गलत समय पर दखलंदाजी......कैसी है ज्योति बिटिया ...?

मैं ठीक हूँ ......आप कैसी हैं. ....ये दवा किसकी है.

इतनी देर से बतिया रही है......ये नहीं पता की दवा किस की है......बिटिया जिसकी तबियत खराब होती है...वही दवा लेता है....

ज्योति ने मेरी तरफ ऐसे देखा देखा..जैसे मैने कोई गुनाह किया  हो.

अच्छा माँ....मैं चलती हूँ.....

कहाँ जा रही हो...बैठो.....ज्योति.

क्यों क्या करूँ बैठ कर.....हम आपके हैं कौन...?

मेरी मुस्कराहट ने बता दिया...की मैं चाहता हूँ की वो कुछ देर और बैठे. .....

अब आप मुँह से कुछ फूटेंगे...या मुँह मे दही जम गया है....?

तुमको देख कर तो खून जम जाता है...दही जमना तो बच्चों का खेल है.

बस फिर वही बातें......मैं क्या करूँ आप का....?

सही बात है....ना होता मैं तो क्या होता....

आनंद......क्या बात है...मैं देख रही पिछले दो महीनो से की तुम हर दूसरे या तीसरे दिन.....बीमार पड़ रहे हो.....आखिर क्या बात है...वो कौन सा राज दफन है तुम्हारे सीने मैं...जो अंदर  ही अंदर तुमको घुन की तरह चाटता जा रहा है....और तुम चुपचाप दर्द को पीते जा रहे हो.....क्या महादेव बनने का इरादा है...?

मैं ज्योति की तरफ देखता रहा.....

ऐसे मत देखो....आनंद. तुम जानते हो....की मुझे आपकी चिंता होती है....

मैं जानता हूँ....रि सखी.....

क्या .......कौन सा इतिहास आज खुल गया......जिसके राज तुम्हारे सीने में दफन हैं.....  आनंद?

इसको सीना नहीं कहते हैं....सखी.....इसको ताजमहल कहते हैं.....ये इक मकबरा ही तो है....जहाँ मेरे अरमानों की कब्रें बनी हैं......चलता फिरता कब्रिस्तान हूँ मैं..........और इस कब्रिस्तान में किसी और की कब्र नहीं...सारी कब्रें , मेरी खुद की हैं....

आनंद..............जरा गौर से दखो....इन्हीं कब्रों के उपर हरी घास भी जम रही है....आशा की हरी घास......चलती रहती है....जरा गौर से "निराशा" को देखो तो उसी में तो आशा है........

वाह.....तुम तो मुर्दों में भी जान डाल देती हो..... सही कह रही हो......निराशा में भी आशा है....वाह.

बस करिए.....कुछ भी बोल देते हैं.

कैसी विडम्बना है....ना सखी.....जब तुम कमजोर पड़ीं तो मैं ने इक कोशिश करी तुम्हारे साथ खडे होने की.........और आज तुम...............

अरे.............आनंद...तुम्हारी आँखों में पानी.......
                                                                                                                                                  क्रमश:

Saturday, February 5, 2011

तपस्वनी और फ़कीर....समापन


तो ये है...मुझ से तुम तक का सफ़र.....कितने मोड़ों से मुड़ता हुआ, कितनी बार टूटता हुआ, कितनी बार जुड़ता हुआ, कितनी बार बिखरता हुआ, कितनी बार संवरता हुआ....मैं तुम्हारे शहर पहुँच ही गया...यहाँ से अनंत कि यात्रा शुरू होगी....क्योंकि ...तपस्वनी...अब पाने को कुछ रहा ही नहीं.....तुमको देखना था, देख लिया.... अब उसकी याद आने लगी है.....या वो मुझे याद कर रहा है...पता नहीं.....अब वो ही वो बसता है.....तुम्हारा नाम लेता हूँ तो उसका ही अक्स उभरता है.......मेरा कृष्ण है वो...पार्थ का सारथि है वो....मेरा है वो...बस वो अपना बना ले मुझको.....तपस्वनी.

दरिया में यूँ तो होते हैं कतरे ही कतरे  सब,
कतरा वही है, जिसमे कि दरिया दिखाई दे.

तुम वो कतरा हो...जिसमे मुझे वो दिखाई देता है...और उसमे तुम दिखाई देती हो...खुद को ढूंढता हूँ तो तुमको पा जाता हूँ..पता नहीं..तुम इक गोरख धंधा हो. अब मन स्थिर और शांत है..ये जो एकांतवास जानकी नंदन ने मुझे दिया है ना....अब इसकी अहमियत समझ में आ रही है..शायद वो मुझको अपने और करीब ला रहा है ...इसिलए तो दूर किया है..ताकि विरह की ये आग और भड़के...और इतनी भड़के कि जिस में मेरा "स्व"....ही जल कर खाक हो जाए...तभी तो वो मिलेगा....यही तो उसके मिलने कि शर्त है.....अजीब है..लेकिन है....

कैसी अजीब शर्त है दीदार के लिए,
आंखें जो बंद हो तो वो जलवा दिखाई दे.

तुम तो राधा हो ही.....तुम तो उसकी हो ही....मुझे  अपने आप को पार्थ बनाना पड़ेगा..तभी तो वो मेरा सारथि बनेगा....बोलो..ये सच है ना...आज यहाँ मुझे २ महीने हो चलें हैं....जब से निकला हूँ पहली  बार किसी जगह इतना लंबा विश्राम लिया है....लेकिन अब और जाऊं कहाँ....कृष्ण भी यहाँ..राधा भी यहाँ...मैं तो फ़कीर  हूँ...

मैं तो कुत्तवा राम का, मोतिया मेरा नाम,
गले राम कि जेवड़ी, जित खींचे तित जाऊं.

तुम समझ जाओगी....मैं जो भी कुछ लिखता चला जा रहा हूँ.....प्रेम का जो उदाहरण तुमने स्थापित किया है, ना तपस्वनी..वो भी इस जमाने में जहाँ प्रेम को बाजरू बना दिया गया है........उसने तुमको उस ऊँचाई पर बैठा दिया है....जहाँ पर तुमको देखने के लिए, जब मैं सर उपर उठाता हूँ....पंजो के बल पर खडे होके तब भी मैं तुमको नहीं देख पाता हूँ.....सच है ना....आदमी कितने भी पाँव क्यों ना उचका ले....चाँद को तो नहीं छू सकता....लेकिन मेरी तपस्वनी...मै इस सत्य से भाग नहीं सकता कि...

चाँद के साथ कई दर्द पुराने निकले,
कितने गम थे जो तेरे गम के बहाने निकले.

इस फ़कीर कि इक इल्तजा है.....मानोगी.....खुश रहना. .........................इति. 

तपस्वनी और फ़कीर 3

आज कितनी तेज धूप है.....और शफाक नीला आसमाँ....कभी कोई भक्त आकर  मंदिर के घंटो को छेड़ जाता है....कभी तुमने महसूस किया है....राधा....कि जब आसमाँ साफ़ हो तो असीम का अंदाज होता है.....जहाँ तक नज़र जाती है...नीला रंग......और ऐसे में  विचारों का आवागमन भी बिना किसी रुकावट के होता है.....और जब बादल छाए होते हैं.....अंदर भी कुछ बादल छा जाते हैं.....वो वीरवार था......जब तुमने अपने अंदर को मेरे सामने पहली बार खोला  था....सूरज पूरब से होता हुआ पश्चिम तक पहुँच गया था......मैं तुमको सुनता रहा... और अपनी असंवेदनशीलता को महसूस  करता रहा..... और जब तुम गयीं.....तो उसके बाद काफी देर तक मैं अपने आप को टटोलता रहा....कि मेरे अंदर वो दिल कहाँ है...जो दूसरों को समझता था...जो दूसरों कि आँखे पढता था....क्यों नहीं समझ पाया मैं.....तुमको.

अब सब कुछ अंत कि ओर है....ओर मैं जब अपने आप को तुम्हारे सामने रखता हूँ....तो छोटा ही पाता हूँ....बहुत छोटा. ......तुमने जीता है मुझे....असली सिकन्दर तो तुम हो......अब जब वक़्त ने इक बार फिर मुझे एकांतवास पे भेज दिया है....तो फिर मैं अपने आप को समेट कर अपने को बनाने कि कवायत में लगा हूँ.....लेकिन कुछ टुकड़े  नहीं मिल रहे हैं.....कैसे मिलेंगे ...वो तो तुम्हारे पास ही रह गए हैं.......लेकिन अब अधूरापन भी अच्छा लगता है.....क्योंकि ये उसकी याद दिलाता रहता है...जिसकी वजह से मैं अधूरा हूँ.....

माँ के स्वर्गवास के बाद.......मैं पूरा ही फ़कीर हो गया.....तुमको मेरी माँ कि याद तो होगी.....बचपन से लेकर उनके स्वर्गवास  होने तक....जब भी कोई तकलीफ हुई...मैं उनके पास जाता था...ओर बिना मेरे कुछ कहे वो  कह देतीं थीं...सब ठीक हओ जायेगा..तू वो करते रह...जो तू समझता है....कि ठीक है. ....जब मौलविओं ने मुझे खत्म करने का मंसूबा बना लिया था.....तो अपने कृष्ण के साथ वो राधा ही थी...जो मेरे सामने खड़ी हो गयी थी....याद तो होगा तुम्हे. ......मैने इक बार कोशिश करी कि किसी कि नज़रों मे घर बना लूँ ... लेकिन उन्होंने आंसू समझ कर मुझे नज़रों से बहा दिया.....ओर मैं वहाँ भी घर ना बना सका. ....

तेरे क़दमों पे सर होगा, कज़ा* सर पे खड़ी होगी,                            *मौत
फिर उस सजदे का क्या कहना, अनोखी बन्दगी होगी.
मजा आजायेगा महशर  में फिर सुनने-सुनाने का,
जुबां होगी वहाँ मेरी, कहानी आप की होगी.

बोलो....अगर मैं तुमको तपस्वनी कहता हूँ.....तो गलत है..... अरे हाँ...याद आया...तुमको ग़ज़ल का शौक था....ओर मैने तुमसे कहा था.....ग़ज़ल लिखना ओर पढ़ना बहुत आसान है अगर तुम साथ हो तो.....

तुमने कहा था.....वो कैसे...बोलो तो.

मैने कहा था....सारे अल्फाजों को तुम पे सजा दिया जाए...ओर फिर तुमको पढ़ा जाए.....इक से इक कीमती शेर बनेगें....

ओर तुम.....आप भी ना.......इतना कह कर चुप हो गयी थीं.

लो उसी सिलसिले का इक शेर ......तुम्हारी खिदमत में पेश है.....

सर से पा तक, वो गुलाबों का शजर लगता है,
बावजू* हो के भी उसे छुते हुए डर लगता है.          *नमाज से पहले मुँह-हाथ धोना
मैं तेरे साथ सितारों से गुजर सकता हूँ,
कितना  आसान मुहब्बत का सफ़र लगता है.

आदाब.......

Friday, February 4, 2011

तपस्वनी और फ़कीर....

ज़िन्दगी चलती रही......तुम मिली और फिर जुदा हुईं.....लेकिन ज़िन्दगी फिर भी चलती रही. लेकिन इस बार तुम्हारे  बिछड़ने का बाद...ज़िन्दगी तो चलती रही...लेकिन ज़िन्दगी का मजा जाता रहा.....तुम अपनी सारी जिम्मेदारियों को निभाते हुए....दिल में एक अलख जला....उसी में जलती रहीं.....और मैं तुमको देखता रहा...समझता रहा. फिर तूफ़ान का आना भी लाजमी था.....जब मौलवी साहब और उनके कुनबे ने मुझे दफन करने में  कोई कसर ना छोड़ी थी...दफन कर भी दिया था......और याद है तुमको तपस्वनी...यही मौलवी साहब इश्क के उपर घंटो तहरीर देते रहते हैं....खैर.....मैं अकले कैसे लड़ा उन मौलविओं कि जमात से...और लड़ने के बाद अकेला ही रह गया......या अकेला कर दिया गया....

जब इन मौलवी साहब ने मुझे इतना लहुलुहान कर दिया...कि मैं किसी काबिल ना बचा.....तो मेरी हालत उस आदमी कैसी हो गयी...जो डूब रहा है...और बचने के लिए हाथ पैर मार रहा हो.....उस वक़्त तिनके का सहारा भी काफी होता है....और उस वक़्त तुम खड़ी हुईं....और तुम ने ना सिर्फ मुझको बचाया बल्कि अपनी ज़िन्दगी दे कर मुझे अपना कर्जदार बना लिया.....लेकिन इन मौलविओं कि जमात का दिल अभी भरा नहीं था....वो तो मुझ पर निशाना  साधे ही बैठे थे.... मेरा वो खुतूत जो हवाओं के साथ उड़ता हुआ...मौलवी साहब के सहन में गिरा और एक जोरदार धमाका हुआ.....लेकिन इस बार के धमाके में तुम भी नहीं बच पाइं, खून के कुछ छीटे तुम्हारे दामन पर भी गिरे....और तुम्हारा दामन भी मैला  हुआ....और मैं अपने आप को इस गुनाह के लिए कभी माफ़ नहीं कर पाया....मेरी वजह से तुम्हारे दामन पर दाग.....या अल्लाह....इस से तो मौत ही बेहतर है.

फिर मैं सब कुछ छोड़ चला....और फ़कीर बन गया.....लेकिन इस बार गाँव-गाँव, गली-गली तुमको अपने साथ लिए घूमता रहा.....कई मदिरों में गया.....तो तुम साथ थीं.....कई मस्जिदों में भी गया....वहाँ भी तुम साथ थीं....एक दिन ख़ुदा से मिला...वहाँ भी तुम साथ थीं.....

ना गरज किसी से वास्ता, मुझे काम अपने ही काम से,
तेरे ज़िक्र से, तेरी फ़िक्र, तेरे नाम से तेरे काम से.

मैने अल्लाहताला से दरख्वास्त करी कि " या ख़ुदा.....अगर इश्क का ये अंजाम है....और ये तेरी मर्जी है....तो मेरे सर आँखों पर" ...मैं अपनी धुन में जीने लगा....गाँव-गाँव, गली गली....मुहब्बत बांटने लगा...और मेरी इस मुहब्बत का स्रोत तो तुम ही थीं तपस्वनी.....कितनी बार लोगों ने मुझे पागल करार दिया, कितने ही लोग मुझ पर हँसते थे...कितने लोगों के जहर बुझे हुए...अलफ़ाज़ इस दिल को चीर कर गए.....कितनी बार कई माएँ अपने बच्चों को मुझसे ....पागल है..... ये कह कर दूर खींच लेतीं थी......लेकिन मेरी नज़र कभी भी इन पर नहीं गयी...और सब कुछ मुझसे अलग होता गया...छूटता गया.....और मैं फ़कीर बन गया......मैने दो चार किताबे तो पढ़ी हैं लेकिन, शहर के तौर तरीके मुझे कम ही आते हैं.....इस लिए जिसने जब चाहा मुझे इस्तेमाल किया.....और वो भी मुझे लोगों ने बताया कि ...बेवक़ूफ़ ..तुझे इस्तेमाल कर रहे हैं....जा भाग जा.....

लेकिन तपस्वनी....भाग कर जाता तो कहाँ जाता.......मेरे जहन में हमेशा ये बात बिजली कि तरह कौंधती थी....कि जब वो.....दिल के अंदर एक आग को सालहों-साल जला कर रख सकती है....और खुद ही उसमे जलती है तो क्या तू....लोगों कि चंद बाते बर्दाश्त नहीं कर सकता......ज़िन्दगी कि कई तकलीफों में तुमको सामने रखकर....या तुमको पुल बनाकर मैने उन तकलीफों को पार किया....

पंडित जी बुला रहे हैं.....अभी आता हूँ....देखो इंतज़ार करना........तपस्वनी .

शिद्दत कि धूप , तेज हवाओं के बावजूद,
मैं शाख से गिरा हूँ, नज़र से गिरा नहीं.

लेकिन अब हालात बहुत बदल गए हैं.......

हम दुश्मन को भी पाकीज़ा सजा देते हैं... 
हाथ उठाते नहीं......नज़रों से गिरा देते हैं




तपस्वनी.....और.....फ़कीर......

ये तीसरी डायरी है पिछले डेढ़ महीने में........ आज दिल का वो कमरा खोला जहाँ पर कई सालों से मैं खुद नहीं गया.... नहीं..... नहीं ऐसा नहीं कि मैं डरता हूँ.... बल्कि वो एक मंदिर है जहाँ पर गिने-चुने लोग ही जा पाते हैं....

बुत भी रखे हैं, नमाजें भी अदा होती हैं.
दिल मेरा दिल नहीं, अल्लाह का घर लगता है.

कोई इस डोरी का का सिरा या अंत नहीं जानता है. इस डोर कि शुरुआत तपस्वनी से होती है...और अंत इस फ़कीर पे......  पता नहीं कि इन डायरियों का अंजाम क्या होगा.....लेकिन सब कुछ लिख कर ही जाना चाहता हूँ.....बात....लगभग २२ साल पहले कि है.......जब मैने पहली बार राधा का दीदार किया....वो गुलाबी सूट और उसमे गुलाबी वो......गुस्सा आया था.....अरे गुलाबी गुलदस्ते में, गुलाब....जरा contrast रंग पहन लिया होता....लेकिन...बिजली गिरनी थी...सो गिर गयी.....वो खिड़की के पास तुम खड़ी थीं....पता नहीं तुमको याद हो या ना याद हो...शायद तुम्हारे घर में कोई जलसा था...बहुत लोग थे....लेकिन कोई भी नहीं था.....वक़्त कि पतंग लगातार उडती रही.....कभी हवा के साथ....कभी हवा के खिलाफ.....कभी आसमाँ छू ले ने को बेकरार...

सच है...तपस्वनी...वक़्त किसी ना किसी मोड़ पर लाकर  हमको फिर आमने-सामने खड़ा कर देगा...नहीं सोचा था....उस दिन तुमको रूचि के घर पर देखा.....तो रोक नहीं पाया.....पूंछ ही बैठा.....पहचाना नहीं लगता है......और तुम्हारा ठंडा सा जवाब......एक ठेक सी लगी दिल को...लेकिन इतना महसूस नहीं हुआ....वक़्त काफी मरहम लगा चुका था....लेकिन जब उस दिन तुमसे सारी दास्ताँ सुनी...तो तुमको तपस्वनी नहीं कहता तो और क्या कहता....तुमको देखता हूँ....तो समुद्र कि याद आती है....उपर से कितना शोर सुनाई पड़ता है..लेकिन अंदर....खामोशी...गहराई..और गहराई...और गहराई.....अल्लाह....और उस गहराई में जलती हुई प्यार कि शमां....शमां भी तुम और उसपर कुर्बान हो जाने वाले परवाने भी तुम.....जब तुमने हकीकत बयान करी.....तो मैं तुमको तपस्वनी ना कहता तो और क्या कहता.....अब तुम खुद बोलो......बोलो तो. 

मैं ग़ज़ल कहूँ, या ग़ज़ल पढूं, मुझे दे तो हुस्ने ख़्याल दे
तेरा गम ही है मेरी तर्बियत*, मुझे दे तो रंजो मलाल दे........... * शिक्षण
 सभी चार दिन कि हैं चांदनी, ये रियासतें, ये वजारतें,
मुझे उस फ़कीर कि शान दे, कि जमाना जिसकी मिसाल दे.
मेरी सुबह तेरे सलाम से, मेरी शाम तेरे ही नाम से,
तेरे दर को छोड़ के जाऊँगा, ये ख़्याल दिल से निकाल दे.
क्रमश:

Tuesday, February 1, 2011

हर शख्स दौड़ता हैं यहाँ भीड़ कि तरफ,

हमने जाकर देख लिया है, राहगुज़र के आगे भी,
राहगुज़र ही राहगुज़र है, राहगुज़र के आगे भी.

मानती हो ना तपस्वनी...इंसान खत्म हो जाते हैं...लेकिन रास्ते नहीं.... कितने रास्तों से होता हुआ यहाँ तक पहुंचा हूँ.....मैं ही जानता हूँ...और हर रास्ता ..एक किताब साबित हुआ.....जिसने कुछ ना कुछ मुझे सिखाया ही है. जो चलने वाले होते हैं, वो मंजिल कि फ़िक्र नहीं करते...बस दिल में मंजिल कि याद बनी रहे तो दुनिया अपने आप रास्ता दे देती है और मंजिल अपने आप सामने आ जाती है...अगर चलने का हौसला हो तो.......इस चलने के सिलसिले में कई बार बदन टूटता है, कई बार मन. कई बार पैरों में छाले पड़ जाते हैं...लेकिन मंजिल कि धुन....सब कुछ बर्दाशत करने कि ताकत दे देती है.....तुम जानती ही होगी जब कृष्ण जेल में पैदा हुए और वासुदेव उन्हें सूप में रख कर गोकुल छोड़ने चले तो यमुना उफान पर थी.....और उसी यमुना ने उनको गोकुल जाने का रास्ता दिया था...ये एक एतिहासिक दृष्टांत हो सकता है...लेकिन अगर इसके दूसरे रुख को देखो....

कोई चले, चले ना चले, हम तो चल पड़े.
मंजिल कि जिस को धुन हो, उसे कारवाँ से क्या....

यही सब कुछ बाते हैं...जो मुझे ज़िंदा रखतीं हैं. जानती हो.....राधा.....मुझे इतने जख्म कैसे मिले.....क्योंकि मैने दुनिया के बनाये आम रास्तों पर चलने से इनकार कर दिया. और अपना रास्ता खुद बनाने कि सोची....रास्ते बने ना बने, मंजिल मिली ना मिली...पर जख्मों का वो गुलदस्ता दिया लोगों ने जिसके फूलों में ये ख़ासियत है कि वो मुरझाते नहीं हैं.....

गम को यारों कभी सीने से जुदा मत करना,
गम बहुत साथ निभाते हैं, जवाँ रहते हैं.

तपस्वनी....मैं जानता हूँ..मेरी हर बात तुम बिलकुल उसी तरह समझोगी जैसे मैं लिख रहा हूँ. क्योंकि तुमने भी तो अपना रास्ता खुद ही बनाया है....यही तो समानता है मुझमें और तुम

हर शख्स  दौड़ता हैं यहाँ भीड़ कि तरफ,
और ये भी चाहता है, उसे रास्ता मिले....

मेरी डायरी कि पन्ने पढकर ...तुम को इस बात का अंदाजा  लग जाएगा  कि ज़िन्दगी कि कितने रंगों ने अब तक मुझको रंगा है....