आज तीसरा दिन है......कोई खबर नहीं है तुम्हारी.....तुम जानते हो मुझे चिंता होती है.....लेकिन....कुछ तो बात होगी इसलिए तुमने कोई सन्देश भी नहीं भेजा.....तुम पढ़ रहे हो ना......जब कोई तूफ़ान आता है....अपनों को अपनों की चिंता नहीं होगी तो किसे होगी.......बोलो तो.
मैं आप का क्या करूँ......आप को तो इतना भी समझ मे नहीं आता की की चिड़िया के हाँथो ही सन्देश भिजवा दो..गुस्सा तो आ रहा है..लेकिन क्या करूँ.....तबियत कैसी है तुम्हारी......आशा करतीं हूँ...की तुम अब पहले से कुछ ठीक होगे.....लेकिन तुम्हारी तबियत सी-सा की तरह उपर नीचे क्यों होती है......बताओ तो......
क्यों इतने बिखरे हुए रहते हो तुम.......मैं तुम्हारी पीड़ा समझती हूँ....
Friday, January 7, 2011
Wednesday, January 5, 2011
सितारों से आगे जहाँ और भी हैं....
ज्योति.........ज़िन्दगी से बड़ी किताब और ज़िन्दगी से बड़ा शिक्षक नहीं मिलेगा....ज़िन्दगी हर मोड़ पर हम से ये कहती है....कि मुझे मोड़ने कि कोशिश मत करो....मै जैसी हूँ, मुझे वैसे ही स्वीकार करो. मुझे अपने रंग में ढालने के चक्कर में, कई लोग जाँ से चले गए....लोगों कि समझ मे सच्चाई तो आ गयी कि ज़िन्दगी कोई मंजिल नहीं , बल्कि रास्ता है.....जो अनवरत है....रास्ते नहीं बदलते...रास्ते पर चलने वाले बदलते रहते हैं....हाँ ऐसे लोग जरुर हुए हैं...जिन्होने अपने रास्ते खुद बनाये हों.....तुम उनमे से एक हो.....
आनंद...तुम मेरी बेवजह तारीफ़ मत किया करो.
बेवजह.....बेवजह तो मै कोई काम नहीं करता. क्या ये जरुरी है...कि हर चीज़ कि वजह का हम को ज्ञान हो...? नहीं ना....
तो मैं क्या करूँ.....जो मेरे साथ हुआ..क्या उसके पीछे भी कोई वजह होगी.....?
बिलकुल.....भगवान ने तुमको ये सिखाने के लिए.....कि किसी पर भी आँख बंद कर विश्वास मत करो.....तुम को ये पाठ पढ़ाया है....अब ज्यादा कुछ कहूंगा तो तुम बुरा मान जाओगी...
आप कि कौन सी बात का बुरा माना है मैंने .....बोलो...बोलो तो.
हमेशा थोड़ी सी दूरी बनाये रखो..रिश्तों मे भी..ताकि हवा का संचार हो सके...जहाँ हवा का संचार नहीं होता...वहाँ दम घुटने लगता है...वो चाहे कमरा हो या रिश्ते...तुम तो जानती ही जहाँ गुड़ होगा ...चींटे भी वहीं आते हैं.....समझीं.....
शायद ठीक कह रहे हो......आनंद..तुम.
रिश्तों में दूरी का मतलब मनमुटाव नहीं....एक स्वस्थ दूरी. और जहाँ तक मैं तुमको जानता हूँ, समझता हूँ.... सच कहूँ...तो उतना तुम अपने आप को नहीं जानती हो. मुझे बड़ी ख़ुशी और अभिमान भी है अपने उपर.....कि तुमने इतनी बड़ी बात मुझे बताने के काबिल समझा....इतना विश्वास है तुमको मेरे उपर. मैं वाकई शुक्रगुजार हूँ...अल्लाह-ताला का.
तो अब मैं क्या करूँ ...आनंद? वो शख्स मुझे अकसर दिखाई पड़ता है....और जख्म फिर से हरे होने लगते हैं.....जख्मों मे टीस फिर से उठने लगती है.....बोलो मैं क्या करूँ...?
जो मैं कहूंगा..मानोगी..?
ऐसा क्यों कह रहे हो...?
क्योंकि मैं तुमको जानता हूँ..इसलिए ऐसा पूंछ रहा हूँ...
बोलो....
शरीर के जिस हिस्से में कैंसर हो जाता है...डॉक्टर उस हिस्से को काट कर अलग कर देता है....तुमको जो चोट लगी है...वो दिल पर लगी है....और दिल निकाल कर तुम अलग नहीं कर सकती हो....अपने मन के उस कोने में जहाँ वो इंसान घर कर के बैठा है.....उस को वहाँ से निकाल फेंको.....इस प्रक्रिया में दर्द भी होगा, क्योंकि वो इंसान कभी तुम्हारे घर का हिस्सा भी रहा है...लेकिन...वो भी हमारा ही अंग होता है...जिसको डॉक्टर काट कर निकाल देते हैं....जब धीरे - धीरे तुम बीमार अंग को काट फ़ेंक दोगी...तो वो तुम्हारे , खुद के लिए अजनबी हो जाएगा.....फिर वो चाहे सामने आ जाए.....तुम्हारे अंदर कोई प्रतिक्रिया ही नहीं होगी...और जब प्रतिक्रिया ही नहीं....तो तुम शांत....और हाँ स्वस्थ भी....अच्छा कुछ दिन इस को कर के देखो....अगर बेहतर लगे तो जारी रखना....नहीं तो सितारों से आगे जहाँ और भी हैं....
हूँ........
क्या हूँ.....लंबा इलाज है..लेकिन अचूक इलाज है.....
तुम इतना सोचते हो ....आनंद?
ना जी ना.....मैं क्यों सोचने लगा......
मजाक मत करो....आनंद.
तो क्या करूँ.....बोलो तो.
तुमको सहानभूति की दो-चार वाक्य बोलूं....हाय राम....ये क्या हुआ, कैसे हुआ, कब हुआ......बल्कि मैं तो ये कहता हूँ......जो हुआ, सो हुआ, जब हुआ, तब हुआ.....छोड़ो ये ना सोचो....बस अपने हाव-भाव, अपनी body language से चोर को ये एहसास दिला दो...की...मुझे पता है की तूने चोरी की है...लेकिन जा....मैं चुप हूँ....क्योंकि तेरी यही सजा है.....ईसा मसीह बनने की कोई जरूरत नहीं है, ना गाँधी....क्योंकि....सूअर के आगे मोतिया बिखेरना .....समझदारी नहीं, बेवकूफी की निशानी है.....ज्यादा हो गया क्या....?
आनंद तुम भी....ना.
चलो...अब ज्यादा ज्ञान देना ठीक नहीं होगा....
चाची.....भूख लगी है......दो रोटी मिलेगीं क्या....
हाय राम....कैसे माँग रहा आनंद बेटा.
अरे चाची माँगू नहीं तो क्या करूँ.....ये रानी लक्ष्मी बाई....तो हिल नहीं रही हैं....
माँ देखो लो......इनको.
माँ क्या देख ले ...वो तो कई सालों से मुझे देख रहीं है.....नूरजहाँ.
आनंद, आनंद....आनंद.
आनंद...तुम मेरी बेवजह तारीफ़ मत किया करो.
बेवजह.....बेवजह तो मै कोई काम नहीं करता. क्या ये जरुरी है...कि हर चीज़ कि वजह का हम को ज्ञान हो...? नहीं ना....
तो मैं क्या करूँ.....जो मेरे साथ हुआ..क्या उसके पीछे भी कोई वजह होगी.....?
बिलकुल.....भगवान ने तुमको ये सिखाने के लिए.....कि किसी पर भी आँख बंद कर विश्वास मत करो.....तुम को ये पाठ पढ़ाया है....अब ज्यादा कुछ कहूंगा तो तुम बुरा मान जाओगी...
आप कि कौन सी बात का बुरा माना है मैंने .....बोलो...बोलो तो.
हमेशा थोड़ी सी दूरी बनाये रखो..रिश्तों मे भी..ताकि हवा का संचार हो सके...जहाँ हवा का संचार नहीं होता...वहाँ दम घुटने लगता है...वो चाहे कमरा हो या रिश्ते...तुम तो जानती ही जहाँ गुड़ होगा ...चींटे भी वहीं आते हैं.....समझीं.....
शायद ठीक कह रहे हो......आनंद..तुम.
रिश्तों में दूरी का मतलब मनमुटाव नहीं....एक स्वस्थ दूरी. और जहाँ तक मैं तुमको जानता हूँ, समझता हूँ.... सच कहूँ...तो उतना तुम अपने आप को नहीं जानती हो. मुझे बड़ी ख़ुशी और अभिमान भी है अपने उपर.....कि तुमने इतनी बड़ी बात मुझे बताने के काबिल समझा....इतना विश्वास है तुमको मेरे उपर. मैं वाकई शुक्रगुजार हूँ...अल्लाह-ताला का.
तो अब मैं क्या करूँ ...आनंद? वो शख्स मुझे अकसर दिखाई पड़ता है....और जख्म फिर से हरे होने लगते हैं.....जख्मों मे टीस फिर से उठने लगती है.....बोलो मैं क्या करूँ...?
जो मैं कहूंगा..मानोगी..?
ऐसा क्यों कह रहे हो...?
क्योंकि मैं तुमको जानता हूँ..इसलिए ऐसा पूंछ रहा हूँ...
बोलो....
शरीर के जिस हिस्से में कैंसर हो जाता है...डॉक्टर उस हिस्से को काट कर अलग कर देता है....तुमको जो चोट लगी है...वो दिल पर लगी है....और दिल निकाल कर तुम अलग नहीं कर सकती हो....अपने मन के उस कोने में जहाँ वो इंसान घर कर के बैठा है.....उस को वहाँ से निकाल फेंको.....इस प्रक्रिया में दर्द भी होगा, क्योंकि वो इंसान कभी तुम्हारे घर का हिस्सा भी रहा है...लेकिन...वो भी हमारा ही अंग होता है...जिसको डॉक्टर काट कर निकाल देते हैं....जब धीरे - धीरे तुम बीमार अंग को काट फ़ेंक दोगी...तो वो तुम्हारे , खुद के लिए अजनबी हो जाएगा.....फिर वो चाहे सामने आ जाए.....तुम्हारे अंदर कोई प्रतिक्रिया ही नहीं होगी...और जब प्रतिक्रिया ही नहीं....तो तुम शांत....और हाँ स्वस्थ भी....अच्छा कुछ दिन इस को कर के देखो....अगर बेहतर लगे तो जारी रखना....नहीं तो सितारों से आगे जहाँ और भी हैं....
हूँ........
क्या हूँ.....लंबा इलाज है..लेकिन अचूक इलाज है.....
तुम इतना सोचते हो ....आनंद?
ना जी ना.....मैं क्यों सोचने लगा......
मजाक मत करो....आनंद.
तो क्या करूँ.....बोलो तो.
तुमको सहानभूति की दो-चार वाक्य बोलूं....हाय राम....ये क्या हुआ, कैसे हुआ, कब हुआ......बल्कि मैं तो ये कहता हूँ......जो हुआ, सो हुआ, जब हुआ, तब हुआ.....छोड़ो ये ना सोचो....बस अपने हाव-भाव, अपनी body language से चोर को ये एहसास दिला दो...की...मुझे पता है की तूने चोरी की है...लेकिन जा....मैं चुप हूँ....क्योंकि तेरी यही सजा है.....ईसा मसीह बनने की कोई जरूरत नहीं है, ना गाँधी....क्योंकि....सूअर के आगे मोतिया बिखेरना .....समझदारी नहीं, बेवकूफी की निशानी है.....ज्यादा हो गया क्या....?
आनंद तुम भी....ना.
चलो...अब ज्यादा ज्ञान देना ठीक नहीं होगा....
चाची.....भूख लगी है......दो रोटी मिलेगीं क्या....
हाय राम....कैसे माँग रहा आनंद बेटा.
अरे चाची माँगू नहीं तो क्या करूँ.....ये रानी लक्ष्मी बाई....तो हिल नहीं रही हैं....
माँ देखो लो......इनको.
माँ क्या देख ले ...वो तो कई सालों से मुझे देख रहीं है.....नूरजहाँ.
आनंद, आनंद....आनंद.
क्रमश: 2
असंभव......आनंद के मुँह से पहला शब्द जो निकला वो यही था. .....
मैं बहुत दिनों से आप से बताना चाह रही थी...लेकिन साहस ना बटोर पाई......की आप क्या सोचेंगे.....
मैं क्या सोचूंगा........अरे पगली......मैं एक बात जानता हूँ......की सूरज की तरफ मुँह कर के थूकने से अपना ही चेहरा गंदा होता है.......चाँद को गाली देने से , चाँद पर कोई असर होता है.....मुझे ये चिंता नहीं है....की उसने क्या किया....जिसको तुमने ऊँगली पकड कर चलना सिखाया.....मुझे चिंता ये है.....की मेरी छुई-मुई , जिसको अंदर से देखने की जहमत किसी ने नहीं उठाई.....उसका क्या हाल है.....कितनी बिखर गयी है....
तेरी मुस्कराहटें छीन कर जो चमन में गुंचे बिखर गए,
तो ये इम्तियाज़ ना हो सका , वो बिखर गए कि संवर गए.
सब तुम्हारी हंसी में खो गए...... लेकिन......कोई तुम तक ना पहुँच पाया.
आनंद.....
हाँ ज्योति.....मैं नहीं बोलता हूँ.....लेकिन तुम्हारी एक-एक चीज़ों का , एक एक एहसासों का मुझे ध्यान है.....और मै ये भी जानता हूँ...की जिस दिन ये ज्योति जलेगी.....कुछ को रौशनी मिलेगी...और कुछ इस रौशनी मे चेहरा छुपाते नज़र आयेंगे. मुझे इंतज़ार है उस दिन का और उस ज्योति का.......शराफत वहीं तक ठीक है, जहाँ तक वो कायरता ना कहलाये.....
मैं बहुत दिनों से आप से बताना चाह रही थी...लेकिन साहस ना बटोर पाई......की आप क्या सोचेंगे.....
मैं क्या सोचूंगा........अरे पगली......मैं एक बात जानता हूँ......की सूरज की तरफ मुँह कर के थूकने से अपना ही चेहरा गंदा होता है.......चाँद को गाली देने से , चाँद पर कोई असर होता है.....मुझे ये चिंता नहीं है....की उसने क्या किया....जिसको तुमने ऊँगली पकड कर चलना सिखाया.....मुझे चिंता ये है.....की मेरी छुई-मुई , जिसको अंदर से देखने की जहमत किसी ने नहीं उठाई.....उसका क्या हाल है.....कितनी बिखर गयी है....
तेरी मुस्कराहटें छीन कर जो चमन में गुंचे बिखर गए,
तो ये इम्तियाज़ ना हो सका , वो बिखर गए कि संवर गए.
सब तुम्हारी हंसी में खो गए...... लेकिन......कोई तुम तक ना पहुँच पाया.
आनंद.....
हाँ ज्योति.....मैं नहीं बोलता हूँ.....लेकिन तुम्हारी एक-एक चीज़ों का , एक एक एहसासों का मुझे ध्यान है.....और मै ये भी जानता हूँ...की जिस दिन ये ज्योति जलेगी.....कुछ को रौशनी मिलेगी...और कुछ इस रौशनी मे चेहरा छुपाते नज़र आयेंगे. मुझे इंतज़ार है उस दिन का और उस ज्योति का.......शराफत वहीं तक ठीक है, जहाँ तक वो कायरता ना कहलाये.....
क्रमश:
Sunday, January 2, 2011
क्रमश:
बिटिया......देख आनंद बाबू आयें हैं.......
मैं दौड़ती हुई दरवाजे पर पहुंची.....आज दस दिन बाद आनंद मिला है....आओ आनंद अंदर आओ. मैं लगभग हाँथ खींचती हुई उनको अंदर ले आई. लेकिन पहली बार आनंद के हाँथो से अपने हाँथ पर एक मजबूत पकड़ महसूस करी.....अच्छा लगा.
चाची, राम- राम
आ आनंद बेटा.......कैसा है.
मैं ठीक हूँ....आप कैसे हो?
सब कृपा है......जानकी नंदन की.
चाची ये आप के लिए......
और मेरे लिए.....ज्योति का अपेक्षित सवाल.
तुम्हारे लिए................कोहिनूर के आगे सब फीका लगता है.....तुमको मैं क्या दे सकता हूँ.....लेकिन ये लो....बनारस गया था..... वहाँ की साड़ी है...
ओ...माँ.....इतनी महंगी साड़ी......क्या जरूरत थी......
ज्योति.....तोहफे की कीमत नहीं, तोहफा देने वाली की नीयत देखी जाती है.
बैठो...आनंद....कैसा रहा बनारस निवास १० दिन का...?
बनारस तो मैं सिर्फ एक दिन के लिए गया.....वहाँ से कुछ दूर एक जगह है..चकिया....और चकिया में एक जगह है चंद्रप्रभा ...मैं वहाँ गया था......
चंद्रप्रभा.....वहाँ क्या है...?
वहाँ गंगा अकेली बहती है.....
अकेली...मतलब....?
मतलब उसके घाटों पर व्यापार नहीं होता. सिर्फ गंगा है...और जंगल..और कुछ गाँव.
तुमको तो अपने मतलब की जगह मिल गयी.....
हाँ ज्योति......सोचा कुछ दिन अपने साथ रहूँ...इस बार. शहरों में तो हिस्सों मे ज़िन्दगी जीनी पड़ती है. इंसान देख कर बात करनी पड़ती है.....सो....सोच की इस बार मैं और बस मैं...
तुम कैसी हो.......जहाँआरा...मेरा सवाल ज्योति से.
जहाँआरा....अब ये नया नाम.....ठीक हूँ....यही कह सकती हूँ......बाकी तो तुम सब जानते हो.
मैं दौड़ती हुई दरवाजे पर पहुंची.....आज दस दिन बाद आनंद मिला है....आओ आनंद अंदर आओ. मैं लगभग हाँथ खींचती हुई उनको अंदर ले आई. लेकिन पहली बार आनंद के हाँथो से अपने हाँथ पर एक मजबूत पकड़ महसूस करी.....अच्छा लगा.
चाची, राम- राम
आ आनंद बेटा.......कैसा है.
मैं ठीक हूँ....आप कैसे हो?
सब कृपा है......जानकी नंदन की.
चाची ये आप के लिए......
और मेरे लिए.....ज्योति का अपेक्षित सवाल.
तुम्हारे लिए................कोहिनूर के आगे सब फीका लगता है.....तुमको मैं क्या दे सकता हूँ.....लेकिन ये लो....बनारस गया था..... वहाँ की साड़ी है...
ओ...माँ.....इतनी महंगी साड़ी......क्या जरूरत थी......
ज्योति.....तोहफे की कीमत नहीं, तोहफा देने वाली की नीयत देखी जाती है.
बैठो...आनंद....कैसा रहा बनारस निवास १० दिन का...?
बनारस तो मैं सिर्फ एक दिन के लिए गया.....वहाँ से कुछ दूर एक जगह है..चकिया....और चकिया में एक जगह है चंद्रप्रभा ...मैं वहाँ गया था......
चंद्रप्रभा.....वहाँ क्या है...?
वहाँ गंगा अकेली बहती है.....
अकेली...मतलब....?
मतलब उसके घाटों पर व्यापार नहीं होता. सिर्फ गंगा है...और जंगल..और कुछ गाँव.
तुमको तो अपने मतलब की जगह मिल गयी.....
हाँ ज्योति......सोचा कुछ दिन अपने साथ रहूँ...इस बार. शहरों में तो हिस्सों मे ज़िन्दगी जीनी पड़ती है. इंसान देख कर बात करनी पड़ती है.....सो....सोच की इस बार मैं और बस मैं...
तुम कैसी हो.......जहाँआरा...मेरा सवाल ज्योति से.
जहाँआरा....अब ये नया नाम.....ठीक हूँ....यही कह सकती हूँ......बाकी तो तुम सब जानते हो.
क्रमश:
कारवां गुजर गया, ग़ुब्बार देखते रहे....
नहीं......तुम्हारी कोई भी दलील मुझ पर असर नहीं करती....हर्ष. मैं ये नहीं कहती कि प्रेम व्यर्थ है.....लेकिन तुम गलत जगह पर इसको ढूंढ रहे हो......इतना कह कर प्रार्थना तो आगे चली गयी .....
हर्ष वहीं खड़ा सोचता रहा....कि क्या प्रेम भी logic या तर्क का विषय बन गया है........उसने तो सिर्फ इतना सुना था कि प्रेम हो जाता है...प्रेम किया नहीं जाता.....इसलिए हर्ष ने प्रार्थना से अपने दिल कि बात कह दी......लेकिन प्रार्थना ने इतने दलील के बाण चलाये कि उस ने प्रार्थना से पूंछ ही लिया कि क्या हमारे रास्ते अलग हुए.........
पता नहीं...प्रार्थना का दो टूक उत्तर.
प्रार्थना के इस तरह दो टूक उत्तर हर्ष पहले भी सुन चुका था......लेकिन उसको अपने प्यार पर भरोसा था.....और वो समझता था कि प्रेम कि शक्ति......सर्वोच्च होती है......लेकिन ....जो उसको मिल रहा था......उस पर उसे यकीं नहीं हो रहा था.....कितनी आसानी से प्रार्थना ने हर्ष का प्रेम आग्रह ठुकरा दिया......एक तरफ तो प्रार्थना ने कहा कि मैं सब कुछ समझतीं हूँ.....जानती हूँ...और दूसरी तरफ.........इनकार.
नहीं सब बेकार है.....करे कोई और भरे कोई...प्रेम के नाम पर इतने छलावे हो चुके हैं..... कि जो वाकई प्रेम करता हो...या करता है...वो भी कोडियों के भाव बिक जाता है.....जो सोच समझ कर किया जाता है...वो तो ऐयाशी होती है.......प्रेम मे कब बुद्धि का इस्तेमाल हुआ है.....
खैर.....कारवाँ गुजर गया , गुब्बार देखते रहे.......हर्ष ये कहता हुआ.....वापस लौट पड़ा.
हर्ष वहीं खड़ा सोचता रहा....कि क्या प्रेम भी logic या तर्क का विषय बन गया है........उसने तो सिर्फ इतना सुना था कि प्रेम हो जाता है...प्रेम किया नहीं जाता.....इसलिए हर्ष ने प्रार्थना से अपने दिल कि बात कह दी......लेकिन प्रार्थना ने इतने दलील के बाण चलाये कि उस ने प्रार्थना से पूंछ ही लिया कि क्या हमारे रास्ते अलग हुए.........
पता नहीं...प्रार्थना का दो टूक उत्तर.
प्रार्थना के इस तरह दो टूक उत्तर हर्ष पहले भी सुन चुका था......लेकिन उसको अपने प्यार पर भरोसा था.....और वो समझता था कि प्रेम कि शक्ति......सर्वोच्च होती है......लेकिन ....जो उसको मिल रहा था......उस पर उसे यकीं नहीं हो रहा था.....कितनी आसानी से प्रार्थना ने हर्ष का प्रेम आग्रह ठुकरा दिया......एक तरफ तो प्रार्थना ने कहा कि मैं सब कुछ समझतीं हूँ.....जानती हूँ...और दूसरी तरफ.........इनकार.
नहीं सब बेकार है.....करे कोई और भरे कोई...प्रेम के नाम पर इतने छलावे हो चुके हैं..... कि जो वाकई प्रेम करता हो...या करता है...वो भी कोडियों के भाव बिक जाता है.....जो सोच समझ कर किया जाता है...वो तो ऐयाशी होती है.......प्रेम मे कब बुद्धि का इस्तेमाल हुआ है.....
खैर.....कारवाँ गुजर गया , गुब्बार देखते रहे.......हर्ष ये कहता हुआ.....वापस लौट पड़ा.
Saturday, January 1, 2011
बोल राधा बोल....
Facebook या face is a book ....खैर मैं नामों के उलट-फेर में नहीं पड़ना चाहता....कहते हैं कि चेहरा दिल कि किताब होता है.....सही है , मानता हूँ.....लेकिन जब चाँद सामने न हो तो किसे पढ़ें और कैसे पढें.......
राधा.....तुम मेरे सामने नहीं हो.......बहुत दूर हो......लेकिन फिर भी मैं तुम्हारे एक-एक विचार, एक-एक शब्दों को जोड़ कर मैं तुम्हारी तस्वीर बना लेता हूँ..... और फिर तुमको पढ़ लेता हूँ....और तुम को पढ़ना अब तो और भी आसान हो गया है......क्योंकि विचारों और शब्दों से बनी तुम्हारी तस्वीर में , मैं , अपने आप को भी पाता हूँ.... काफी हद तक पाता हूँ.....इसीलिए.....प्रेम करने लगा.....तुमको अपना हमख्याल पाता हूँ.....
कभी-कभी तुम बिलकुल करीने से, सजी संवरी नज़र आती हो.....और कभी-कभी एक बेचेनी नज़र आती है तुम मै.....कुछ ढूंढती हुई...कुछ तलाश करती हुई.......जैसे कह रही हो.....मुझे उपर से नहीं अंदर से देखो......मैं तुम्हारी हूँ.....क्या तुम मुझे प्यार नहीं कर सकते......जैसी मैं हूँ......क्यों तुम मुझे अपने पसंद के आकार में ढाल कर प्रेम करना चाहते हो.........राधा को राधा ही रहने दो......और राधा को राधा की तरह ही प्रेम करो......
अच्छा...बोलो....मैने तुम्हारे फाके कि book को read किया ...वो ठीक है की नहीं........कुछ नहीं....काफी हद तक और कई बार ऐसा हुआ है...राधा...की लिखा तुमने....और कहानी मेरी बयाँ हो गयी...... हो सकता है...कि विचार भी आकर्षित करते हों....और फिर वही आकर्षण प्रेम का रूप ले लेता हो......तो क्या गलत है इसमे......बोलो तो....? कम से कम ये जिस्मानी बन्धनों से तो परे होता है.....संभव है......कि जिस्म खूबसूरत न हो.....लेकिन विचारों कि ख़ूबसूरती.....जिस्मानी ख़ूबसूरती पर भारी पड़ती है......और जहाँ...जिस्म और विचार दोनों ही खूबसूरत हों......तो फिर सोने पर सुहागा......
तुम रोकती क्यों हो अपने आप को ............बोल राधा बोल....
एक पगली मेरा नाम तो ले शर्माए भी घबराए भी,
गलियों-गलियों मुझसे मिलने, आये भी घबराए भी.
कौन बिछुड़ कर फिर लौटा है, क्यों आवारा फिरते हो,
रातों को एक चाँद मुझे समझाए भी, घबराए भी....
राधा.....तुम मेरे सामने नहीं हो.......बहुत दूर हो......लेकिन फिर भी मैं तुम्हारे एक-एक विचार, एक-एक शब्दों को जोड़ कर मैं तुम्हारी तस्वीर बना लेता हूँ..... और फिर तुमको पढ़ लेता हूँ....और तुम को पढ़ना अब तो और भी आसान हो गया है......क्योंकि विचारों और शब्दों से बनी तुम्हारी तस्वीर में , मैं , अपने आप को भी पाता हूँ.... काफी हद तक पाता हूँ.....इसीलिए.....प्रेम करने लगा.....तुमको अपना हमख्याल पाता हूँ.....
कभी-कभी तुम बिलकुल करीने से, सजी संवरी नज़र आती हो.....और कभी-कभी एक बेचेनी नज़र आती है तुम मै.....कुछ ढूंढती हुई...कुछ तलाश करती हुई.......जैसे कह रही हो.....मुझे उपर से नहीं अंदर से देखो......मैं तुम्हारी हूँ.....क्या तुम मुझे प्यार नहीं कर सकते......जैसी मैं हूँ......क्यों तुम मुझे अपने पसंद के आकार में ढाल कर प्रेम करना चाहते हो.........राधा को राधा ही रहने दो......और राधा को राधा की तरह ही प्रेम करो......
अच्छा...बोलो....मैने तुम्हारे फाके कि book को read किया ...वो ठीक है की नहीं........कुछ नहीं....काफी हद तक और कई बार ऐसा हुआ है...राधा...की लिखा तुमने....और कहानी मेरी बयाँ हो गयी...... हो सकता है...कि विचार भी आकर्षित करते हों....और फिर वही आकर्षण प्रेम का रूप ले लेता हो......तो क्या गलत है इसमे......बोलो तो....? कम से कम ये जिस्मानी बन्धनों से तो परे होता है.....संभव है......कि जिस्म खूबसूरत न हो.....लेकिन विचारों कि ख़ूबसूरती.....जिस्मानी ख़ूबसूरती पर भारी पड़ती है......और जहाँ...जिस्म और विचार दोनों ही खूबसूरत हों......तो फिर सोने पर सुहागा......
तुम रोकती क्यों हो अपने आप को ............बोल राधा बोल....
एक पगली मेरा नाम तो ले शर्माए भी घबराए भी,
गलियों-गलियों मुझसे मिलने, आये भी घबराए भी.
कौन बिछुड़ कर फिर लौटा है, क्यों आवारा फिरते हो,
रातों को एक चाँद मुझे समझाए भी, घबराए भी....
जादू....
अजीब से कशमकश से दो-चार होता हूँ मैं.....जब विचारों की आंधी दिल-ओ-दिमाग पर काबिज होती है...तब शब्द मुट्ठी से रेत की तरह फिसलते हैं.....समझ में नहीं आता की कैसे भावनओं को कागज पर उकेरू.....तुम गूंगे का गुड हो......समझ रही हो न सखी......नहीं पता था की तुम इतनी अंदर तक समा चुकी हो......जल बिन मछली कैसे तडपती होगी...इसका कुछ तो अंदाज लग गया है मुझे.....हाँ राधा हाँ......
इतनी दिनों आने आप से अलग रहा...तुम ही तुम ख्यालों में छाई रहीं.....सिर्फ तुम.......तुम होती तो ऐसा होता, तुम होती तो वैसा होता....बस इसी सीसे पर कभी उपर, कभी नीचे झूलता रहा....कई बार ऐसा भी धोखा हुआ है, चले आ रहे हैं वो नज़रे झुकाए.....सच प्यार जादू कर देता है.....राधा......
इतनी दिनों आने आप से अलग रहा...तुम ही तुम ख्यालों में छाई रहीं.....सिर्फ तुम.......तुम होती तो ऐसा होता, तुम होती तो वैसा होता....बस इसी सीसे पर कभी उपर, कभी नीचे झूलता रहा....कई बार ऐसा भी धोखा हुआ है, चले आ रहे हैं वो नज़रे झुकाए.....सच प्यार जादू कर देता है.....राधा......
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