३ दिन हो गए.....ज्योति ने स्कूल ज्वाइन कर लिया.....कितनी जल्दी उसने अपनी जिम्मेदारियों.....को पहचान लिया. ........ अच्छा लगा. ....... प्रिंसिपल साहब भी तारीफ़ कर रहे थे.....लेकिन तीन दिनों से उसकी कोई खबर भी नहीं है.....तीन क्यों.....ज्यादा हो गए होंगे....सब ठीक हो...भगवान् करे. स्कूल मे इतना वक़्त नहीं मिलता की बातें कर सकें...... और स्कूल के बाद इतना वक़्त नहीं मिलता....की बातें हो. ......अच्छा.....बस सब शुभ हो.
पिछले कुछ रोज़ से एक अजीब सा ख्याल दिमाग में घूम रहा है.....क्या, मैं बताऊँ.....अच्छा चलो बताता हूँ......एक दिन ख्याल आया की बस इस गाँव से चलो.....यहाँ तेरा काम हो गया.......जिस काम के लिए तुझे यहाँ भेजा गया....वो काम संपन्न हो गया. लेकिन कौन सा काम......जब मेरे दिल ने ये सवाल पूंछा.......तो जवाब.....अजीब सा था......साधु और पानी कहीं भी रुकने नहीं चाहिए......साधु अगर रुका..... तो मोह में पड़ सकता है......और पानी अगर रुका तो दुर्गन्ध देता है......ये क्या जवाब हुआ.....? बोलो तो...
मैं कोई साधू नहीं हूँ. इतना तो में जानता हूँ......लेकिन यहाँ से निकलूं कैसे......प्रिंसिपल साहब को क्या बोलूंगा, चाची को क्या बताऊंगा , ज्योति से क्या बोलूंगा.....पता नहीं......स्कूल स्थापित हो गया है, ज्योति के स्कूल ज्वाइन कर लेने से चाची के माथे की लकीरों मे कुछ कमी दिख रही है........और ज्योति को भी अपने हुनर का एहसास हो गया है........सब कुछ हो गया है..... तो क्या यही मेरा प्रयोजन था यहाँ आने का........रात के करीब १.३० बजे हैं....... लगता है आँखों से नींद की खटपट हो गयी है.......
लोग कहते हैं.....मैं सोचने वाला इंसान नहीं हूँ.....शायद वो ठीक हों......क्या सोचूँ......सोच कर क्या कर लिया और क्या कर लूँगा.....जो होना है, वही होगा....... अब सब अपने - अपने काम से जग गए हैं... अब कहीं और चल...फिर वही ख्याल. ........ अरे........ ये तो सवेरे का उजाला है...क्या भोर हो गयी .....? हाँ , लगता तो है.......तो क्या रात आँखों में कट गयी......आज छुट्टी है......दिन भर क्या काम करना है.......
आनंद बेटा.....मालिन माँ , की मुझको जगाने वाली पुकार.....
मैं जग रहा हूँ....अम्मा....आ जाओ.
ये क्या.......चुरुट, कागज़, कलम और चाय के गिलास...... सोया नहीं है क्या...रात भर.
नहीं...अम्मा..मै तो सोया था..... नीदं नहीं सोई....वो जगती रही .....
मेरा जवाब सुनकर ...मालिन माँ....मेरी तरफ देखतीं रहीं.....और बोलीं....पता नहीं तू क्या बोले है....
आनंद बेटा.....जाकर ज्योति बिटिया को देखा आना....कल रात उसकी तबियत खराब थी....
किसकी ज्योति की......क्या हुआ ........ अम्मा.
पता नहीं......मुझे तो अभी राम सिंह मिला था....वही बता रहा था.
क्या इसीलिए......कल इतनी खामोश थी, ज्योति स्कूल में....?
मैं आता हूँ...अम्मा. ........ अरे कुछ खा तो ले...... लौट कर खा लूँगा. आप काम कर के चली जाना....अगर मुझे देर हो.....
मै ज्योति के घर पहुंचा.......चाची.......
आजा आनंद बेटा...... क्या हुआ......सुना लक्ष्मी बाई की तबियत खराब है....?
हाँ......जा....अपने कमरे में है वो......
सुना...सरकार की तबियत नासाज़ है.....मेरा हल्का-फुल्का सवाल.
उनके देखे से जो आ जाती है, मुँह पर रोनक,
लोग समझते हैं बीमार का हाल अच्छा है.........ज्योति का शायराना जवाब.
आज तो सवेरे-सवेरे.........मैं यहाँ पर इतना साफ़ कर दूँ....... गमगीन माहौल को हल्का करने में थोड़ा बहुत मजाक मैं कर लेता हूँ.......
क्या हुआ....
वक़्त मिल गया तुमको.....मिजाज़पुर्सी का?
क्या बात है...तेवर इतने गर्म क्यों है...?
तीन दिनों से बात नहीं की है......स्कूल में तो आनंद इधर, आनंद उधर, आनंद यहाँ, आनंद वहाँ......बस आनंद को ज्योति से बात करने का वक़्त नहीं है.......
तुम्हारी तबियत खराब है...या गुस्से से तबियत खराब कर ली है.....?
मैं क्या करूँ आप का.....बोलो तो.
मेरा कुछ ना करो.....उठो.....नाश्ता कर लो....मुझे बहुत भूख लगी है........
आनंद.....तुम मुझको ना बहलाओ........तुम को कब से भूख लगने लगी.......माँ ने अभी तक तुमको तुम्हारी संजीवनी बूटी ...नहीं दी....?
वो क्या...भला..?
चाय और क्या......तुम्हारे लिए तो वो संजीवनी बूटी ही है.......बोलो. मैं तीन दिन से तुम्हारे लिए भी खाना ले कर स्कूल आ रही थी.....लेकिन.....वहाँ तो तुम........हवा हो.....जाओ बात मत करो......
मैं बैठ कर ज्योति के चेहरे पर आते-जाते भावों और रंगों को देख रहा था...... उसके गुस्से में..गुस्सा कम...प्यार ज्यादा था....मैं क्या बोलता था.
सोचा था....की चलो वैसे तो तुम्हारे खाने का कोई ठीक नहीं है.......मै ले जाउंगी तो कम से कम एक टाइम तो पूरा खाना खालोगे तुम......मेरे स्कूल ज्वाइन करने के और कारणों में से , ये भी एक कारण था............ज्योति को तो जैसे हर चीज़ पता है स्कूल की.....किसी से कुछ पूंछो तो ....आनंद साहब से पूंछ लीजिये......और आनंद साहब.......बदल गए हो तुम......लेकिन तुम क्या समझोगे.
मैने मन में सोचा...तुम ठीक समझ रही हो ज्योति....मैं क्या समझूंगा.......लेकिन मैं आज कुछ सोचने की मूड में नहीं था ....... आज ज्योति को बहने दो......वो बोलती गयी.......
चाची ने पोहा बनाया है.....नाश्ते में.....मैने फिर उसको छेड़ा.....चलो उठो....नाश्ता कर लो.....तुम कमअक्ल हो...वैसे....
अच्छा....... अरे.... नाश्ता कर लो....ताकत आजायेगी तो फिर लड़ लेना......
रामसिंह.........ये तो मालिन माँ की आवाज़ है.......
आओ.....मालिन....नाश्ता कर लो.......चाची ने कहा.....मालिन तो जैसे इंतज़ार में थी...वहीं बैठ गयीं.....लो बेटा ये चाभी रख लो......चाची ..... आप समझा दो ..... आनंद बाबू को.....
क्या समझा दूँ.......मालिन......
अरे.....रात भर सोया नहीं है.......बैठा रहा....कागज पर कागज लिखता रहा.....पता नहीं क्या लिखता रहता है. सवेरे आकर जैसे ही मैने बताया की बिटिया की तबियत ठीक नहीं है.....जैसे बैठा था...वैसे ही चला आया......कैसा आदमी है.... ये.....चाची जरा.....थोड़ा पोहा डाल दे ...इसमे......मैं तो ना खाऊं... तो मर जाऊं.
ज्योति के चेहरे रंग बदल गए......गुस्सा काफूर .... हो गया .....मालिन माँ की बाते सुनकर..... वो मुझे देखती रही......मुझे माफ़ कर दो.....आनंद.... बहुत कुछ उलटा-सीधा बोल दिया......
अच्छा चाची ...जाती हूँ.....आनंद बेटा...कपड़े धो कर फैला दिए हैं .......दिन मे आकर समेट दूंगी...... जी......वो चल दीं.
ज्योति.....मै जरा तीरथ राम के घर जाकर दवाई ले आती हूँ......११ बजे बुलाया था उसने......अच्छा माँ.
मैं चुप......ज्योति भी चुप......अब कौन तोड़े सन्नाटे को...?
रात भर सोये क्यों नहीं.....
कुछ बैचेनी थी.....
क्यों....? आनंद चुप. ....... अगर उनको किसी बात का जवाब नहीं देना है तो भगवान् नीचे आ जाएँ.....लेकिन मुँह नहीं खुलवा सकते.
क्या लिख रहे थे.....कोई लेख, या कहानी.....
पता नहीं......कहानी ही लग रही है.
कहाँ है...मुझको पढ़ना है......
वो.....प्रिंसिपल साहब कह रहे थे की बच्चों को लेकर किसी प्रतियोगिता मे जाना है....तुम्हारा नाम दे दें.
स्कूल ज्वाइन करने की लिए , मुझसे पूंछा था....तब तो सारा काम कर के शहर चले गए थे....अब इस वक़्त मेरी अनुमति की क्या जरूरत है......आनंद मेरे लिए कुछ गलत नहीं सोच सकते. .............लेकिन....मै स्कूल को स्कूल मैं छोड़ कर आती हूँ.....
मैं समझ गया की आज तो मेरा घिराव होगा......अब यहाँ से बच निकलने का रास्ता देखना पड़ेगा......घबराओ मत......कोई जबरदस्ती नहीं है....अगर तुम जवाब...नहीं देना चाहोगे.....लेकिन.....झूठ मत बोलना.....
तुम जानती हो, ज्योति , मैं झूठ नहीं बोलता....
हाँ...लेकिन सच भी नहीं बताते......
मैं एक बात बोलूं.....हाँ बोलो.....पिछले २-३ दिन से मैं देख रही हूँ......की तुम किसी गहरी सोच में हो......अगर उचित समझो और मुझे भरोसे के लायक....समझते तो बाँट सकते हो....
ऐसा क्यों कह रही हो........तुमसे तो मै हर बात करता हूँ....
तो रात भर सोये क्यों नहीं.......क्या बात थी....जिसने आनंद की नींद उड़ा दी.....? सब ठीक तो है ना.....? सच बताना.....
सब ठीक है....पगली. ...फिर झूठ......सब ठीक नहीं है ...पगली....ये बोलना था......
अरे बाप रे.....आज तो ........
हाँ आज तो कयामत है.......
में कुर्सी से टेक लगा कर ...आँख बंद कर बैठा रहा.....सोचता रहा की क्या बोलूं.......की मै इस गाँव से जाने का सोच रहा हूँ......मै आज सोचने के मूड में नहीं हूँ......लोग कहते हैं.....मैं सोचने वाला इंसान नहीं हूँ.....
मैं क्या करूँ, आपका.......बोलो तो...... कहीं नहीं जाना है........यहीं बैठे रहो..चुपचाप....मेरे सामने....मेरे पास.....कहीं नहीं जाना है......
Friday, December 10, 2010
Thursday, December 9, 2010
वो १२ पन्ने......
रोहित...कुमोनिका के साथ मंदिर पहुंचे, मैं वहीं उनका इंतज़ार कर रही थी. जैसा कल तय हुआ था.
पंडित जी ...नमस्कार ... रोहित और कुमोनिका का शांत अभिवादन. कुमोनिका आज काफी बदली हुई सी लग रही थीं...संभव हो रोहित जी ने कुछ कहा या समझाया हो.
नमस्ते ... साहब....
बाबूजी नमस्ते......अंजलि का अभिवादन... रोहित और कुमोनिका को.
आप फ़कीर बाबा के भाई हैं.....?
हाँ... बेटी. ... रोहित ने अंजलि के सर पर हाँथ फेरते हुए जवाब दिया.
बाबा... ये आप के लिए है.....
ये क्या है... साहब.....
साहब नहीं...बेटा कहिये......अगर आनंद आप का बेटा हुआ..... तो मैं भी तो हुआ.....
पंडित जी निरुत्तर हो कर रोहित....की तरफ देखते रहे.....और हाँथ बढ़ा कर भेंट स्वीकर करी.... एक नया धोती और कुर्ता....और शाल.
ये आप के लिए है बिटिया.....कुमोनिका ने ....अंजलि की तरफ एक तोहफा बढाया.
अंजलि दो कदम पीछे हट गयी.... और पंडित जी की तरफ देखने लगी......
ले ले बिटिया....पंडित जी ने अंजलि से कहा.
इसकी क्या जरूरत थी.....पंडित जी ने रोहित जी से कहा.
हर चीज़ जरूरत से ही होती है क्या ..... बाबा...कुमोनिका का जवाब पंडित जी को .
मैं अवाक.... इस अचानक हुए परिवर्तन से......कल तक तो तीर चल रहे थे और आज...... खैर...जो भी हो रहा है.....अच्छा ही हो रहा है......इसके पीछे का सत्य , वक़्त के साथ ही आगे आयेगा.
बाबा....कुछ और बताइए..... आनंद के बारे मैं......आप के साथ तो ३ महीने रहा.
मेरे पास रहा ....साथ तो किसी के नहीं रहा. साथ तो अपने मालिक के रहा और किसी तपस्वनी के.......पंडित जी ने मेरी और देखा.... तुम तो जानती हो राधा बिटिया....साथ तो वो किसी के नहीं रहा.
हाँ....बाबा....साथ तो वो किसी के नहीं रह पाए.
बेटा.... पंडित जी रोहित से मुखातिब हुए....... जहाँ तक मै समझता हूँ.....फ़कीर वो ऐसे ही नहीं बन गया. टूटने तो वो उसी दिन से लगा था...जिस दिन आप की माँ का देह-अंत हुआ था. ... क्या उसी ने अंतिम संस्कार किया था.
हाँ....मैं पहुँच नहीं पाया था टाइम पर.
सब से छोटा बेटा था क्या.....?
हाँ...क्यों बाबा?
एक कहावत है बेटा....." बड़ेंन का बाप, छोटन का महतारी....बीच वालेन का राम रखवारी".... उसने आप लोगों मे माँ को ढूंढा....लेकिन.....नहीं पाया....फिर ...उसे अपनापन , प्यार, ममता....कोई उसको भी समझे......इन सब चीज़ों ने धीरे धीरे उसको घुन की तरह चाट लिया.....और वो अपने आप को धीरे धीरे सब से अलग करता चला गया. फिर कोई तपस्वनी आई...उसके जीवन मे......और वो भी तमाम तरह की जंजीरों में. फ़कीर की हालत उस पंछी जैसी थी....जो उड़ कर जाना तो चाहता था तपस्वनी के पास...लेकिन पैर तमाम तनाबों से बंधे हुए थे..... जितना मुक्त था वो...उतने ही बन्धनों मे था. इसीलिए सब कुछ छोड़....कर वैरागी हो गया.
मैं...पंडित जी का चेहरा देखती रह गयी.....इतना सूक्ष्म विश्लेषण......
किसी मालिक.....के सहारे जीता रहा वो.
ये लीजिये...चाय.....अंजलि..सब के लिए चाय ले कर आई.....
सब चुप...सब गुमसुम....मैं अवाक.
पंडित....बाबा....कुमोनिका...का संबोधन ...... भैया......कैसे गुजर -बसर करते थे...?
पंडित जी हल्के से हंसे.......गुजर-बसर.....? बेटी.....पहली बार पंडित जी ने कुमोनिका को इस नाम से संबोधित किया.....उसको कुछ चाहिए नहीं था.....रही खाने पीने की बात.....मैने कई बार उससे कहा की यहीं खा लिया करे , क्यों भिक्षा के लिए जाता है....तो कहने लगा....बाबा....मांग ने अहंकार नहीं रहता. जो मिल गया...ठीक नहीं..तो अल्लाह हाफ़िज़. अमीर था वो.....कुछ नहीं चाहिए था उसे. सब था उसके पास.....
बाबा.....वो भिक्षा मांगने जाते थे..............?
हाँ... वो जाता था. एक दिन तो हँस रहा था, क्योंकि किसी ने उसको २ रुपए दे दिए थे. मैं खामोश......क्या बोलती......के मेरे दरवाजे भी आये थे......
उफ..............हम जरा मंदिर के दर्शन कर ले बाबा...रोहित जी ने आज्ञा मांगी.
बिलकुल बेटा......
बाबा...इतना कैसे पढ़ लिया आप ने फ़कीर को....मैं पूंछ बैठी पंडित जी से.
राधा .... बेटी....जो डायरी मैने तुमको दी थी.....उसके कुछ पन्ने मेरे पास रह गए थे.....
क्या......वो १२ पन्ने....जिन्होने फ़कीर की डायरी को ८८ तक सीमित कर दिया था. मैं सोचने लगी.....
मैं तो पढ़ नहीं सकता.... और अंजलि समझ नहीं सकती.... सो मेरा काम आसन हो गया. उसने पढ़ दिए...वो पन्ने....मैने समझ लिया...फ़कीर बेटे को....... बेटी....ना जाने क्यों मुझे लगता है की उसकी वो तपस्वनी...यहीं-कहीं आस-पास ही है...तभी तो यहाँ तक खिंचा चला आया.....और यहाँ से फिर इतना आगे चला गया....
मैं बाबा की आसमाँ मैं खोई हुई आँखों को देखती रही.....कहीं इनको पता तो नहीं चल गया की तपस्वनी कौन है...? लेकिन....कहीं भी फ़कीर ने कोई नाम नहीं लिखा......जाते - जाते भी किसी की तरफ कोई ऊँगली ना उठे .....इसका ध्यान रखा .... मेरे फ़कीर ने.
बाबा.....रोहितजी की आवाज़.....
हाँ बेटा... आ गए आप लोग.
हाँ बाबा.....मन तो नहीं है...लेकिन जाना तो पड़ेगा....क्या मैं अपने भाई को ले जा सकता हूँ.....
बिलकुल..... बाबा ने लाल कपड़े से बंधी हुई मिट्टी की हंडिया रोहित जी के हवाले कर दी....और रो पड़े.
जब छोटा था तब गोद मैं खिलाया था.....आज फिर गोद में है......बदमाश.... रोहित जी रोक ना सके अपने आप को.
अच्छा बाबा, अब आज्ञा दीजिये.... राधा... तुम्हारा एहसान रहा मेरे उपर......अगर संभव हुआ तो चुकाउंगा...
ऐसा ना कहिये .............
वो लोग चले गए...... गाड़ी की धूल दूर तक उडती रही.....
चला गया फ़कीर......बाबा चारपाई पर बैठे हुए बोले.
मेरा मन १२ पन्नों में उलझ गया....जो पंडित जी के पास रह गए..... शायद बाबा मरे मन की बात भाँप गए.....और बोले ..बिटिया जो तेरी चीज़ है.. तुझी को मिलेगी......तू जानती है....बिटिया क्या लिखा था उस फ़कीर ने...अंत में....."आज मैं अपने गंतव्य पर पहुँच गया हूँ, मेरा कृष्ण, तपस्वनी, सब मिल गए.....अब यात्रा पूरी हुई" ......
मैं सन्न रह गयी.....बाबा की तरफ देखा....चिंता ना कर बेटी.... फ़कीर और तपस्वनी.... दोनों मेरी ही तो बच्चे हैं......
मैं फूट पड़ी......फ़कीर मैं पहली बार रोई......बाबा ने गले से लगा लिया......
मैं कितना भाग्यशाली हूँ........कृष्ण भी यहाँ, राधा भी यहाँ.... और फ़कीर भी यहाँ. ये प्रेम.....है. ये ले बेटी वो पन्ने.....मैने पन्ने सर से लगा लिए....
जीती रह बेटी..... तू अमर हो गयी.....
पंडित जी ...नमस्कार ... रोहित और कुमोनिका का शांत अभिवादन. कुमोनिका आज काफी बदली हुई सी लग रही थीं...संभव हो रोहित जी ने कुछ कहा या समझाया हो.
नमस्ते ... साहब....
बाबूजी नमस्ते......अंजलि का अभिवादन... रोहित और कुमोनिका को.
आप फ़कीर बाबा के भाई हैं.....?
हाँ... बेटी. ... रोहित ने अंजलि के सर पर हाँथ फेरते हुए जवाब दिया.
बाबा... ये आप के लिए है.....
ये क्या है... साहब.....
साहब नहीं...बेटा कहिये......अगर आनंद आप का बेटा हुआ..... तो मैं भी तो हुआ.....
पंडित जी निरुत्तर हो कर रोहित....की तरफ देखते रहे.....और हाँथ बढ़ा कर भेंट स्वीकर करी.... एक नया धोती और कुर्ता....और शाल.
ये आप के लिए है बिटिया.....कुमोनिका ने ....अंजलि की तरफ एक तोहफा बढाया.
अंजलि दो कदम पीछे हट गयी.... और पंडित जी की तरफ देखने लगी......
ले ले बिटिया....पंडित जी ने अंजलि से कहा.
इसकी क्या जरूरत थी.....पंडित जी ने रोहित जी से कहा.
हर चीज़ जरूरत से ही होती है क्या ..... बाबा...कुमोनिका का जवाब पंडित जी को .
मैं अवाक.... इस अचानक हुए परिवर्तन से......कल तक तो तीर चल रहे थे और आज...... खैर...जो भी हो रहा है.....अच्छा ही हो रहा है......इसके पीछे का सत्य , वक़्त के साथ ही आगे आयेगा.
बाबा....कुछ और बताइए..... आनंद के बारे मैं......आप के साथ तो ३ महीने रहा.
मेरे पास रहा ....साथ तो किसी के नहीं रहा. साथ तो अपने मालिक के रहा और किसी तपस्वनी के.......पंडित जी ने मेरी और देखा.... तुम तो जानती हो राधा बिटिया....साथ तो वो किसी के नहीं रहा.
हाँ....बाबा....साथ तो वो किसी के नहीं रह पाए.
बेटा.... पंडित जी रोहित से मुखातिब हुए....... जहाँ तक मै समझता हूँ.....फ़कीर वो ऐसे ही नहीं बन गया. टूटने तो वो उसी दिन से लगा था...जिस दिन आप की माँ का देह-अंत हुआ था. ... क्या उसी ने अंतिम संस्कार किया था.
हाँ....मैं पहुँच नहीं पाया था टाइम पर.
सब से छोटा बेटा था क्या.....?
हाँ...क्यों बाबा?
एक कहावत है बेटा....." बड़ेंन का बाप, छोटन का महतारी....बीच वालेन का राम रखवारी".... उसने आप लोगों मे माँ को ढूंढा....लेकिन.....नहीं पाया....फिर ...उसे अपनापन , प्यार, ममता....कोई उसको भी समझे......इन सब चीज़ों ने धीरे धीरे उसको घुन की तरह चाट लिया.....और वो अपने आप को धीरे धीरे सब से अलग करता चला गया. फिर कोई तपस्वनी आई...उसके जीवन मे......और वो भी तमाम तरह की जंजीरों में. फ़कीर की हालत उस पंछी जैसी थी....जो उड़ कर जाना तो चाहता था तपस्वनी के पास...लेकिन पैर तमाम तनाबों से बंधे हुए थे..... जितना मुक्त था वो...उतने ही बन्धनों मे था. इसीलिए सब कुछ छोड़....कर वैरागी हो गया.
मैं...पंडित जी का चेहरा देखती रह गयी.....इतना सूक्ष्म विश्लेषण......
किसी मालिक.....के सहारे जीता रहा वो.
ये लीजिये...चाय.....अंजलि..सब के लिए चाय ले कर आई.....
सब चुप...सब गुमसुम....मैं अवाक.
पंडित....बाबा....कुमोनिका...का संबोधन ...... भैया......कैसे गुजर -बसर करते थे...?
पंडित जी हल्के से हंसे.......गुजर-बसर.....? बेटी.....पहली बार पंडित जी ने कुमोनिका को इस नाम से संबोधित किया.....उसको कुछ चाहिए नहीं था.....रही खाने पीने की बात.....मैने कई बार उससे कहा की यहीं खा लिया करे , क्यों भिक्षा के लिए जाता है....तो कहने लगा....बाबा....मांग ने अहंकार नहीं रहता. जो मिल गया...ठीक नहीं..तो अल्लाह हाफ़िज़. अमीर था वो.....कुछ नहीं चाहिए था उसे. सब था उसके पास.....
बाबा.....वो भिक्षा मांगने जाते थे..............?
हाँ... वो जाता था. एक दिन तो हँस रहा था, क्योंकि किसी ने उसको २ रुपए दे दिए थे. मैं खामोश......क्या बोलती......के मेरे दरवाजे भी आये थे......
उफ..............हम जरा मंदिर के दर्शन कर ले बाबा...रोहित जी ने आज्ञा मांगी.
बिलकुल बेटा......
बाबा...इतना कैसे पढ़ लिया आप ने फ़कीर को....मैं पूंछ बैठी पंडित जी से.
राधा .... बेटी....जो डायरी मैने तुमको दी थी.....उसके कुछ पन्ने मेरे पास रह गए थे.....
क्या......वो १२ पन्ने....जिन्होने फ़कीर की डायरी को ८८ तक सीमित कर दिया था. मैं सोचने लगी.....
मैं तो पढ़ नहीं सकता.... और अंजलि समझ नहीं सकती.... सो मेरा काम आसन हो गया. उसने पढ़ दिए...वो पन्ने....मैने समझ लिया...फ़कीर बेटे को....... बेटी....ना जाने क्यों मुझे लगता है की उसकी वो तपस्वनी...यहीं-कहीं आस-पास ही है...तभी तो यहाँ तक खिंचा चला आया.....और यहाँ से फिर इतना आगे चला गया....
मैं बाबा की आसमाँ मैं खोई हुई आँखों को देखती रही.....कहीं इनको पता तो नहीं चल गया की तपस्वनी कौन है...? लेकिन....कहीं भी फ़कीर ने कोई नाम नहीं लिखा......जाते - जाते भी किसी की तरफ कोई ऊँगली ना उठे .....इसका ध्यान रखा .... मेरे फ़कीर ने.
बाबा.....रोहितजी की आवाज़.....
हाँ बेटा... आ गए आप लोग.
हाँ बाबा.....मन तो नहीं है...लेकिन जाना तो पड़ेगा....क्या मैं अपने भाई को ले जा सकता हूँ.....
बिलकुल..... बाबा ने लाल कपड़े से बंधी हुई मिट्टी की हंडिया रोहित जी के हवाले कर दी....और रो पड़े.
जब छोटा था तब गोद मैं खिलाया था.....आज फिर गोद में है......बदमाश.... रोहित जी रोक ना सके अपने आप को.
अच्छा बाबा, अब आज्ञा दीजिये.... राधा... तुम्हारा एहसान रहा मेरे उपर......अगर संभव हुआ तो चुकाउंगा...
ऐसा ना कहिये .............
वो लोग चले गए...... गाड़ी की धूल दूर तक उडती रही.....
चला गया फ़कीर......बाबा चारपाई पर बैठे हुए बोले.
मेरा मन १२ पन्नों में उलझ गया....जो पंडित जी के पास रह गए..... शायद बाबा मरे मन की बात भाँप गए.....और बोले ..बिटिया जो तेरी चीज़ है.. तुझी को मिलेगी......तू जानती है....बिटिया क्या लिखा था उस फ़कीर ने...अंत में....."आज मैं अपने गंतव्य पर पहुँच गया हूँ, मेरा कृष्ण, तपस्वनी, सब मिल गए.....अब यात्रा पूरी हुई" ......
मैं सन्न रह गयी.....बाबा की तरफ देखा....चिंता ना कर बेटी.... फ़कीर और तपस्वनी.... दोनों मेरी ही तो बच्चे हैं......
मैं फूट पड़ी......फ़कीर मैं पहली बार रोई......बाबा ने गले से लगा लिया......
मैं कितना भाग्यशाली हूँ........कृष्ण भी यहाँ, राधा भी यहाँ.... और फ़कीर भी यहाँ. ये प्रेम.....है. ये ले बेटी वो पन्ने.....मैने पन्ने सर से लगा लिए....
जीती रह बेटी..... तू अमर हो गयी.....
Wednesday, December 8, 2010
मेरा क्या....जारी है...
आज दो दिन हो गए.... लेकिन आनंद का कुछ पता नहीं....कह के गए थे की दूसरे दिन ही आ जायेंगे. आज मन कुछ खराब है....कुछ उदासी... इस वक़्त आनंद की जरुरत है मुझको........
दीदी.... ये तार आया है. .
तार.....किसका तार. तार के नाम से आज भी मेरे गाँव वाले और में भी काँप जाते हैं....पता नहीं क्या खबर आई है.
लाओ काका....यहीं कमरे में दे दो.
लो दीदी..... तबीयत ठीक नहीं है क्या.....?
हाँ काका....कुछ ढीली है.
किसका तार है बिटिया.......माँ कमरे में घुसीं.
आनंद का.....
क्या हुआ...... सब ठीक तो है ना...?
हाँ ठीक हैं.....लिखा है...की कल दोपहर तक आउंगा. काम नहीं हुआ है अभी.
कौन सा काम....बेटी...?
क्या पता माँ...मुझे भी सारी बाते कहाँ बताते हैं........
तू जाने और आनंद जाने.....चाय पियेगी...मैं बना रही हूँ.
दे दो.....माँ....आधा कप.
पूरी बात ना बताने की आनंद की आदत, ना जाने कब जाएगी. झूठ बोलते नहीं हैं....सच बताते नहीं हैं. किस काम से शहर गए हैं... भगवान् जाने. दीनानाथ से पूंछू .... लेकिन क्या ....की आनंद किस काम से शहर गए हैं....? अगर उनको पता चल गया...की मैने पूंछा था..... तो बुरा लगेगा....उनको. खैर....कल तो आ ही रहे हैं. लेकिन मैं आनंद ही आनंद के बारे मैं क्यों सोचती रहती हूँ......ये मुझे क्या हो रहा है...?
ले बेटी....चाय....और जरा तैयार हो जा.
कहाँ जाना है....माँ?
अरे..... दीनानाथ की बिटिया अव्वल आई है ना....उसने बुलाया है....स्कूल वाले भी आ रहे हैं.
ओहो.....तो शायद इस दावत से बचने के लिए....साहब शहर निकल गए......
अच्छा माँ.....मैं अभी आती हूँ.
नमस्कार...प्रिंसिपल साहब.....
अरे...ज्योति बिटिया....कैसी हो? माता जी कहाँ हैं...?
मैं ठीक हूँ.....माँ...भी आईं हैं.
जरा दर्शन तो करवा दो......
हाँ, हाँ ....आइये.
माँ..... प्रिंसिपल साहब.
अरे नमस्कार प्रिंसिपल साहब ..कैसे हैं आप...? मुबारक हो ..... आप के स्कूल की बिटिया अव्वल आई है जिले में.
शुक्रिया.... माता जी. मुबारक तो आनंद को देनी चाहिए.
आनंद को......???
हाँ...सारी मेहनत और दिशा दर्शन तो उसी का था.
माँ..मेरी तरफ देखने लगी.....मैं क्या बोलती.
अरे...माँ जी ...मिथिला के साथ रात रात बैठ कर उसी ने तो उसको को पढाया. आप से एक प्रार्थना करना चाहता हूँ.....आशा करता हूँ आप निराश नहीं करेंगी....
अरे...ऐसे क्यों कह रहे हैं.... निःसंकोच कहिये.
आप अगर ज्योति बिटिया से कह दे तो वो भी स्कूल में आ कर कुछ योगदान कर दें कुछ दिशा दर्शन कर दें.
हाँथ कंगन को आरसी क्या, पढे-लिखे को फ़ारसी क्या..... यहीं बात कर देती हूँ. ....ज्योति.....यहाँ आ तो बेटी.
क्या हुआ माँ....बेटी....प्रिंसिपल साहब कह रहे हैं...की अगर तू भी स्कूल जा कर कुछ पढ़ा दे....?
मैं........ थोड़ा सा टाइम दो ना माँ, सोचने के लिए......ये क्या....अब मैं क्या तय करूँ.....तय तो आनंद ही करेंगे...कल.
किसी तरह से रात कटी....सुबह हुई.... आंखे दरवाजे पर...... कब संदेशा आये...की आनंद आगये.....ओहो....अभी तो ९:३० ही बजे हैं.........दोपहर होने को आई....कोई समाचार नहीं......क्या हुआ....?
बिटिया......बाबूजी...कल रात को आगये थे.....काका ने समाचार दिया.....
कल रात को...............?
हाँ दीदी.......जब आप लोग दीनानाथ के घर गए थे, तब वो यहाँ आये थे...ये पर्चा दे गए आप के लिए.....
दो तो....." स्कूल ज्वाइन कर लो, तुम्हारी जरूरत है" शुभाकांक्षी .......आनंद.
मै सन्न रह गयी...........पढ़ कर. ये क्या.... सारा काम कर के गए...और माध्यम बनाया प्रिंसिपल साहब को.
माँ..मैं आनंद जीके घर जा रहीं हूँ....स्कूल के बारे मैं सलाह लेनी है....
ठीक..है..खाना खाने आजाना और उसको भी ले आना.
ठीक है माँ..... मैं उड़ चली.....
तुम कल रात आ गए....मुझे खबर तक नहीं दी, तार मैं तो लिखा था की कल दोपहर मे आओगे.....तुम्हे पता है मुझे कितनी चिंता थी....१० बार तो काका को यहाँ भेज दिया....कुछ चिंता किसी की हो तो समझो........क्या करूँ मे तुम्हारा.....
बैठ जाओ, सांस ले लो, पानी पी लो ...फिर तीर चलाओ........... आनंद ने शांति से कहा. हाँ अब बोलो.....
क्या काम था शहर में.......जो बिना बताये चले गए......कल दीनानाथ के घर क्यों नहीं आये...?
अरे बाप रे......लड़की हो या टेप रेकॉर्डर..?
जाओ...... बात मत करो.....
अरे बाबा....मेरा कुर्ता बचा कर गुस्सा थूक दो.....स्कूल तो ज्वाइन कर रही हो ना....
ना ज्वाइन करने की .....गुजाइश कहाँ छोड़ी हैं तुमने....मुझे हंसी आगई.
हाँ...अब ठीक है.....देखो....स्कूल को तुम्हारी और तुम को स्कूल की जरूरत है....घर पर खाली बैठ कर कितनी मक्क्खियाँ मार लोगी..? और खाली दिमाग शैतान का घर भी होता है. Post Graduate हो....तो अपना हूनर जाया क्यों कर रही हो....एक बार जब परिवार की जिम्मेदारी कन्धों पर आ जाती है.....तो ज़िन्दगी सिलबट्टे में चली जाती है. जब तक यहाँ हो.....ज्वाइन कर लो.... उपयुक्त करो तन को.....
मैं एक बार फिर लाजवाब......
३ से साढ़े तीन हज़ार तक तनख्वाह होगी... चाचा जी की पेंशन ... माँ के हाँथ में दे दो..अपने खर्चे के लिए इतना तो काफी है.....बोलो हाँ की ना...?
मै निरुत्तर आनंद की तरफ देखती रह गयी.....जो बात मैं ना सोच पाई.....वो इस इंसान के दिमाग में है.....आवारा मसीहा.
कब से ज्वाइन करना है.....
कल से......
अच्छा शहर क्यों गए थे......
दीनानाथ की बिटिया की छात्रवृति की बात करने.....
तो वो खुद नहीं जा सकता था.....
ज्योति...आज मिथिला अव्वल आई....तो स्कूल में बच्चों की संख्या बढ़ी....कल कुछ और बच्चे अगर स्कूल का नाम रोशन करते हैं..... तो चाचा जी का नाम रोशन होगा ....... चाची जी के लिए कितने गर्व की बात होगी....क्यों छोटी छोटी बातों पर मुँह फूला लेती हो.....मैं जानता हूँ दीनानाथ से तुम्हारी क्या नारजगी है.... उसने मेरा अपमान किया था.....अपने घर बुलाकर...यही ना.... तो ईश्वर ने उसका जवाब उसको दे दिया ना.....मिथिला को अव्वल दर्जा दिला कर .....तुम इतनी अच्छी हो...लेकिन कभी-कभी छोटी सी बात पर बिफर जाती हो......
आनंद...........you are too good.
अच्छा..... चलो.....चाय बना दो........मैं समोसे ले कर आया......
आनंद........आनंद .......आवारा मसीहा....आनंद.
दीदी.... ये तार आया है. .
तार.....किसका तार. तार के नाम से आज भी मेरे गाँव वाले और में भी काँप जाते हैं....पता नहीं क्या खबर आई है.
लाओ काका....यहीं कमरे में दे दो.
लो दीदी..... तबीयत ठीक नहीं है क्या.....?
हाँ काका....कुछ ढीली है.
किसका तार है बिटिया.......माँ कमरे में घुसीं.
आनंद का.....
क्या हुआ...... सब ठीक तो है ना...?
हाँ ठीक हैं.....लिखा है...की कल दोपहर तक आउंगा. काम नहीं हुआ है अभी.
कौन सा काम....बेटी...?
क्या पता माँ...मुझे भी सारी बाते कहाँ बताते हैं........
तू जाने और आनंद जाने.....चाय पियेगी...मैं बना रही हूँ.
दे दो.....माँ....आधा कप.
पूरी बात ना बताने की आनंद की आदत, ना जाने कब जाएगी. झूठ बोलते नहीं हैं....सच बताते नहीं हैं. किस काम से शहर गए हैं... भगवान् जाने. दीनानाथ से पूंछू .... लेकिन क्या ....की आनंद किस काम से शहर गए हैं....? अगर उनको पता चल गया...की मैने पूंछा था..... तो बुरा लगेगा....उनको. खैर....कल तो आ ही रहे हैं. लेकिन मैं आनंद ही आनंद के बारे मैं क्यों सोचती रहती हूँ......ये मुझे क्या हो रहा है...?
ले बेटी....चाय....और जरा तैयार हो जा.
कहाँ जाना है....माँ?
अरे..... दीनानाथ की बिटिया अव्वल आई है ना....उसने बुलाया है....स्कूल वाले भी आ रहे हैं.
ओहो.....तो शायद इस दावत से बचने के लिए....साहब शहर निकल गए......
अच्छा माँ.....मैं अभी आती हूँ.
नमस्कार...प्रिंसिपल साहब.....
अरे...ज्योति बिटिया....कैसी हो? माता जी कहाँ हैं...?
मैं ठीक हूँ.....माँ...भी आईं हैं.
जरा दर्शन तो करवा दो......
हाँ, हाँ ....आइये.
माँ..... प्रिंसिपल साहब.
अरे नमस्कार प्रिंसिपल साहब ..कैसे हैं आप...? मुबारक हो ..... आप के स्कूल की बिटिया अव्वल आई है जिले में.
शुक्रिया.... माता जी. मुबारक तो आनंद को देनी चाहिए.
आनंद को......???
हाँ...सारी मेहनत और दिशा दर्शन तो उसी का था.
माँ..मेरी तरफ देखने लगी.....मैं क्या बोलती.
अरे...माँ जी ...मिथिला के साथ रात रात बैठ कर उसी ने तो उसको को पढाया. आप से एक प्रार्थना करना चाहता हूँ.....आशा करता हूँ आप निराश नहीं करेंगी....
अरे...ऐसे क्यों कह रहे हैं.... निःसंकोच कहिये.
आप अगर ज्योति बिटिया से कह दे तो वो भी स्कूल में आ कर कुछ योगदान कर दें कुछ दिशा दर्शन कर दें.
हाँथ कंगन को आरसी क्या, पढे-लिखे को फ़ारसी क्या..... यहीं बात कर देती हूँ. ....ज्योति.....यहाँ आ तो बेटी.
क्या हुआ माँ....बेटी....प्रिंसिपल साहब कह रहे हैं...की अगर तू भी स्कूल जा कर कुछ पढ़ा दे....?
मैं........ थोड़ा सा टाइम दो ना माँ, सोचने के लिए......ये क्या....अब मैं क्या तय करूँ.....तय तो आनंद ही करेंगे...कल.
किसी तरह से रात कटी....सुबह हुई.... आंखे दरवाजे पर...... कब संदेशा आये...की आनंद आगये.....ओहो....अभी तो ९:३० ही बजे हैं.........दोपहर होने को आई....कोई समाचार नहीं......क्या हुआ....?
बिटिया......बाबूजी...कल रात को आगये थे.....काका ने समाचार दिया.....
कल रात को...............?
हाँ दीदी.......जब आप लोग दीनानाथ के घर गए थे, तब वो यहाँ आये थे...ये पर्चा दे गए आप के लिए.....
दो तो....." स्कूल ज्वाइन कर लो, तुम्हारी जरूरत है" शुभाकांक्षी .......आनंद.
मै सन्न रह गयी...........पढ़ कर. ये क्या.... सारा काम कर के गए...और माध्यम बनाया प्रिंसिपल साहब को.
माँ..मैं आनंद जीके घर जा रहीं हूँ....स्कूल के बारे मैं सलाह लेनी है....
ठीक..है..खाना खाने आजाना और उसको भी ले आना.
ठीक है माँ..... मैं उड़ चली.....
तुम कल रात आ गए....मुझे खबर तक नहीं दी, तार मैं तो लिखा था की कल दोपहर मे आओगे.....तुम्हे पता है मुझे कितनी चिंता थी....१० बार तो काका को यहाँ भेज दिया....कुछ चिंता किसी की हो तो समझो........क्या करूँ मे तुम्हारा.....
बैठ जाओ, सांस ले लो, पानी पी लो ...फिर तीर चलाओ........... आनंद ने शांति से कहा. हाँ अब बोलो.....
क्या काम था शहर में.......जो बिना बताये चले गए......कल दीनानाथ के घर क्यों नहीं आये...?
अरे बाप रे......लड़की हो या टेप रेकॉर्डर..?
जाओ...... बात मत करो.....
अरे बाबा....मेरा कुर्ता बचा कर गुस्सा थूक दो.....स्कूल तो ज्वाइन कर रही हो ना....
ना ज्वाइन करने की .....गुजाइश कहाँ छोड़ी हैं तुमने....मुझे हंसी आगई.
हाँ...अब ठीक है.....देखो....स्कूल को तुम्हारी और तुम को स्कूल की जरूरत है....घर पर खाली बैठ कर कितनी मक्क्खियाँ मार लोगी..? और खाली दिमाग शैतान का घर भी होता है. Post Graduate हो....तो अपना हूनर जाया क्यों कर रही हो....एक बार जब परिवार की जिम्मेदारी कन्धों पर आ जाती है.....तो ज़िन्दगी सिलबट्टे में चली जाती है. जब तक यहाँ हो.....ज्वाइन कर लो.... उपयुक्त करो तन को.....
मैं एक बार फिर लाजवाब......
३ से साढ़े तीन हज़ार तक तनख्वाह होगी... चाचा जी की पेंशन ... माँ के हाँथ में दे दो..अपने खर्चे के लिए इतना तो काफी है.....बोलो हाँ की ना...?
मै निरुत्तर आनंद की तरफ देखती रह गयी.....जो बात मैं ना सोच पाई.....वो इस इंसान के दिमाग में है.....आवारा मसीहा.
कब से ज्वाइन करना है.....
कल से......
अच्छा शहर क्यों गए थे......
दीनानाथ की बिटिया की छात्रवृति की बात करने.....
तो वो खुद नहीं जा सकता था.....
ज्योति...आज मिथिला अव्वल आई....तो स्कूल में बच्चों की संख्या बढ़ी....कल कुछ और बच्चे अगर स्कूल का नाम रोशन करते हैं..... तो चाचा जी का नाम रोशन होगा ....... चाची जी के लिए कितने गर्व की बात होगी....क्यों छोटी छोटी बातों पर मुँह फूला लेती हो.....मैं जानता हूँ दीनानाथ से तुम्हारी क्या नारजगी है.... उसने मेरा अपमान किया था.....अपने घर बुलाकर...यही ना.... तो ईश्वर ने उसका जवाब उसको दे दिया ना.....मिथिला को अव्वल दर्जा दिला कर .....तुम इतनी अच्छी हो...लेकिन कभी-कभी छोटी सी बात पर बिफर जाती हो......
आनंद...........you are too good.
अच्छा..... चलो.....चाय बना दो........मैं समोसे ले कर आया......
आनंद........आनंद .......आवारा मसीहा....आनंद.
वाह रे भाग्य.... वाह रे वाह
क्या लेंगे..... आप लोग.
मैं तो चाय लूँगा, सर में दर्द है ........रोहित का सीधा सा जवाब.
आप......
मैं भी चाय ले लूंगी.......कुमोनिका जी का एहसान करने सा स्वर.
राधा....ये ......आनंद और फ़कीर..... ये क्या है? रोहित का सवाल और सवाल मे छोटे भाई के ना रहने का दुःख भी झलका.
भाई साहब.....मैं भी कुछ नहीं जानती हूँ...बस दिवाली से कुछ दिन पहले कोई फ़कीर आया है.... गाँव मे हल्ला हो गया.......मैं भी मंदिर जाती हूँ... तो वहाँ जाकर उनको देखा तो आंखे फटी रह गयी......यहाँ कोई नहीं जानता की मैं फ़कीर... oh ... sorry .... आनंद को जानती हूँ.
आप से कब मुलाक़ात हुई थी आनंद की...... मेरा प्रश्न..रोहित जी से.
ठीक से तो याद नहीं है..... लेकिन माँ की death के बाद एक बार घर आये थे.
जुलाई में आये थे..... कुमोनिका का सीधा सा जवाब. तुम्हारे पास भैया की कुछ चीजें हैं...? कुमोनिका का सीधा सा सवाल.
रोहित, कुमोनिका...की तरफ देखते रहे.....
माता जी का स्वर्गवास तो २००४ में हुआ था..ना...२००९ तक आप लोगों ने कोई खबर नहीं ली की आनंद कहाँ हैं....?
खबर कैसे लेते .... जब उसका कोई अता-पता ही नहीं था. हाँ.....सब कुछ छोड़ने की बात करता था....लेकिन मैने कभी इस बात को इतनी गंभीरता से नहीं लिया.... और उसने सब कुछ छोड़ ही दिया......रोहित की आँखों में कुछ आंसू छलके. अगर तुम बुरा ना मानो ...... तो उसकी चीजे ...मै देख सकता हूँ?
मै क्यों बुरा मानूँ...... भाईसाहब? बस एक गुजारिश है.
बोलो....
उन चीज़ों मे से जो आप के काम की ना हों....वो में रख सकती हूँ.......
तुम रख कर क्या करोगी......कुमोनिका जी का एक और वार.
करुँगी...तो कुछ नहीं....आप के परिवार से २ पुश्तों की जान पहचान है.....बस इसलिए.
राधा....जब आनंद नहीं रहा......तो ये चीजे तुम रखो या मैं रखूं.....क्या फर्क है... रोहित का सुलझा हुआ सा जवाब.
ये लीजिये......२ डायरियां.....एक कलम.....एक घडी...और ये १२ रुपए. ये है उनकी जमापूंजी. और अगर चाहिए तो ये झोला चेक कर लीजिये. .... मै कुमोनिका जी से मुखातिब हुई .
अरे...... ये घड़ी... तो पिता जी की है......और कलम भी.....अभी तक सम्हाल रखा था उसने......
उन्होंने ही तो अभी तक सम्हाल रखा था........
और हाँ..... ये उनका death certificate है.....ये आप के काम का हो सकता है....
सुनो.... शाम हो रही है... चलना भी है? कुमोनिका का रोहित जी को.....
हाँ......जब मौत घर देख लेती है... तो फिर ...... २००१ में पिता जी..२००४ में माँ और २००९ में....ये.
कहाँ रुके हैं आप लोग....? बच्चे कहाँ हैं...?
इनकी कंपनी का गेस्ट हाउस है....वहाँ रुके हैं. बच्चों को नानी के घर छोड़ा है....
ओह....तो खाना खा कर जाइएगा.
नहीं ..... राधा.... आज नहीं. कहाँ किया उसका अंतिम संस्कार और किसने किया..?
यहीं हुआ.... और पंडित जी ने किया... वो उनको अपना बेटा मानते थे.....और गाँव वालों के लिए वो फ़कीर थे....और गाँव के बच्चों के लिए....फ़कीर बाबा.....वो और उनका मालिक.
और तुम्हारे लिए.....कुमोनिका का एक और तीर.
मेरे लिए.....हमारे और आपके परिवार को जोडती हुई कड़ी थे वो.
क्या मैं डायरी देख सकता हूँ....रोहित ... रह रह कर आनंद से जुड़ रहे थे....छोटा भाई था उनका.
...सही लिखा है उसने....किसी से मोह नहीं था....माँ के बाद...तो और भी अलग हो गया......ये तपस्वनी कौन है.....जिसने उसको फ़कीर बना दिया. ........ लेकिन कहीं भी.....डायरी में, उसने किसी से कोई शिकायत नहीं लिखी. सब के लिए दुआ ही मांगता रहा........तुमने तो अंतिम देखा है उसको......कैसा लगता था..... रोहित रो पड़े. उसके खाने - पीने का......?
भाई असहाब जैसा मैं शुरू में जानती थी, जैसा देखा था...उसका बिलकुल उलटा देखा मैने उनको. वो चुलबुला आनंद, वो शायर आनंद....वो रंगीला आनंद.....सब कुछ गायब हो गया था.....बस मालिक, मौला....और तपस्वनी.....पता नहीं किस चीज़ की तलाश थी उनको.....जिसको ढूंढते रहे.....इस दुनिया मे नहीं मिली... तो उस दुनिया मे चले गए ढूँढने.....पलकें तो मेरी भी नम हो रही थी....शांत....और हर बात पर मुस्करा देना.....ये तो उनकी निशानी बन गयी थी.
भाईसाहब......डायरी का पेज नंबर ८७ पढ़िए ---- कई दिनों से हँसा नहीं हूँ, अकेले में जब हंसता तो लोग पागल समझ कर एक-दो गालियाँ दे देते हैं, माँ बच्चों को " पागल है कह कर दूर कर लेती हैं, कुछ बच्चे तो पत्थर मार कर भाग जाते हैं" ..............ऊफ.......किस चीज़ की तलाश थी उसको.....
उसके खाने-पीने का...?
भिक्षा.....
क्या.......
हाँ भाईसाहब...... भिक्षा, वो भी सिर्फ दो रोटी. यहाँ से १० कोस दूर एक गाँव है... वहाँ पर इनको दो रोटी वाला फ़कीर कह कर बुलाते थे.
लेकिन भैया.....को तो खाने-पीने का बड़ा शौक था.....
हाँ.....तभी तो अपने आप को चंद गालियों, कुछ अपमान और दो रोटियों में बाँध लिया था.
लेकिन....बहुत शांत अंत हुआ.....उनका. जो भी उनको चाहिए था....उसी के ध्यान में बैठ गए होंगे .....और कब शरीर छूटा , कोई नहीं जानता.
ये तपस्वनी कौन है....कुमोनिका जी का प्रश्न. तुम तो नहीं........? मैं कुमोनिका जी साहस की दाद दे रही थी की इस मौके पर भी वो अपने तीर छोड़ना ..... ना भूल सकीं.
रोहित.....कुमोनिका, आप जरा खामोश रह सकती हैं.
नहीं भाई साहब...कह लेने दीजिये....ये तपस्वनी कौन है....... किस लिए वो फ़कीर बन गए.... सब जवाब वो अपने साथ लेकर चल गए.
हाँ ...... राधा. मानता हूँ. लेकिन वो किस्मत का बहुत धनी था....की अंत समय में लोगों का प्यार ले कर गया. वही उसने बांटा...वही उसे मिला भी. और कम से कम वहाँ उसके प्राण निकले जहाँ कोई ना कोई तो था जो उसको जानता था, पहचानता था.... लावारिस नहीं गया वो.
अरे.... राधा....आनंद का अस्थिकलश पंडित जी के पास है....उसको भी प्रवाहित करना है.
अभी तक पंडित जी के पास है.....??? इतना मोह.....? एक फ़कीर से..... जिसके अपने, उसके ना हो सके...उसको पंडित जी ने अपनाया.......वैसे भाई साहब....बुरा ना मानियेगा....कुछ चूक आप से भी हुई.
यहाँ पास में कावेरी नदी है...उसी में प्रवाहित कर दीजियेगा.
पिता जी, माता जी को गंगा में और छोटे भाई को कावेरी में................सब मेरे ही हाँथो....
वाह रे भाग्य.... वाह रे वाह
मैं तो चाय लूँगा, सर में दर्द है ........रोहित का सीधा सा जवाब.
आप......
मैं भी चाय ले लूंगी.......कुमोनिका जी का एहसान करने सा स्वर.
राधा....ये ......आनंद और फ़कीर..... ये क्या है? रोहित का सवाल और सवाल मे छोटे भाई के ना रहने का दुःख भी झलका.
भाई साहब.....मैं भी कुछ नहीं जानती हूँ...बस दिवाली से कुछ दिन पहले कोई फ़कीर आया है.... गाँव मे हल्ला हो गया.......मैं भी मंदिर जाती हूँ... तो वहाँ जाकर उनको देखा तो आंखे फटी रह गयी......यहाँ कोई नहीं जानता की मैं फ़कीर... oh ... sorry .... आनंद को जानती हूँ.
आप से कब मुलाक़ात हुई थी आनंद की...... मेरा प्रश्न..रोहित जी से.
ठीक से तो याद नहीं है..... लेकिन माँ की death के बाद एक बार घर आये थे.
जुलाई में आये थे..... कुमोनिका का सीधा सा जवाब. तुम्हारे पास भैया की कुछ चीजें हैं...? कुमोनिका का सीधा सा सवाल.
रोहित, कुमोनिका...की तरफ देखते रहे.....
माता जी का स्वर्गवास तो २००४ में हुआ था..ना...२००९ तक आप लोगों ने कोई खबर नहीं ली की आनंद कहाँ हैं....?
खबर कैसे लेते .... जब उसका कोई अता-पता ही नहीं था. हाँ.....सब कुछ छोड़ने की बात करता था....लेकिन मैने कभी इस बात को इतनी गंभीरता से नहीं लिया.... और उसने सब कुछ छोड़ ही दिया......रोहित की आँखों में कुछ आंसू छलके. अगर तुम बुरा ना मानो ...... तो उसकी चीजे ...मै देख सकता हूँ?
मै क्यों बुरा मानूँ...... भाईसाहब? बस एक गुजारिश है.
बोलो....
उन चीज़ों मे से जो आप के काम की ना हों....वो में रख सकती हूँ.......
तुम रख कर क्या करोगी......कुमोनिका जी का एक और वार.
करुँगी...तो कुछ नहीं....आप के परिवार से २ पुश्तों की जान पहचान है.....बस इसलिए.
राधा....जब आनंद नहीं रहा......तो ये चीजे तुम रखो या मैं रखूं.....क्या फर्क है... रोहित का सुलझा हुआ सा जवाब.
ये लीजिये......२ डायरियां.....एक कलम.....एक घडी...और ये १२ रुपए. ये है उनकी जमापूंजी. और अगर चाहिए तो ये झोला चेक कर लीजिये. .... मै कुमोनिका जी से मुखातिब हुई .
अरे...... ये घड़ी... तो पिता जी की है......और कलम भी.....अभी तक सम्हाल रखा था उसने......
उन्होंने ही तो अभी तक सम्हाल रखा था........
और हाँ..... ये उनका death certificate है.....ये आप के काम का हो सकता है....
सुनो.... शाम हो रही है... चलना भी है? कुमोनिका का रोहित जी को.....
हाँ......जब मौत घर देख लेती है... तो फिर ...... २००१ में पिता जी..२००४ में माँ और २००९ में....ये.
कहाँ रुके हैं आप लोग....? बच्चे कहाँ हैं...?
इनकी कंपनी का गेस्ट हाउस है....वहाँ रुके हैं. बच्चों को नानी के घर छोड़ा है....
ओह....तो खाना खा कर जाइएगा.
नहीं ..... राधा.... आज नहीं. कहाँ किया उसका अंतिम संस्कार और किसने किया..?
यहीं हुआ.... और पंडित जी ने किया... वो उनको अपना बेटा मानते थे.....और गाँव वालों के लिए वो फ़कीर थे....और गाँव के बच्चों के लिए....फ़कीर बाबा.....वो और उनका मालिक.
और तुम्हारे लिए.....कुमोनिका का एक और तीर.
मेरे लिए.....हमारे और आपके परिवार को जोडती हुई कड़ी थे वो.
क्या मैं डायरी देख सकता हूँ....रोहित ... रह रह कर आनंद से जुड़ रहे थे....छोटा भाई था उनका.
...सही लिखा है उसने....किसी से मोह नहीं था....माँ के बाद...तो और भी अलग हो गया......ये तपस्वनी कौन है.....जिसने उसको फ़कीर बना दिया. ........ लेकिन कहीं भी.....डायरी में, उसने किसी से कोई शिकायत नहीं लिखी. सब के लिए दुआ ही मांगता रहा........तुमने तो अंतिम देखा है उसको......कैसा लगता था..... रोहित रो पड़े. उसके खाने - पीने का......?
भाई असहाब जैसा मैं शुरू में जानती थी, जैसा देखा था...उसका बिलकुल उलटा देखा मैने उनको. वो चुलबुला आनंद, वो शायर आनंद....वो रंगीला आनंद.....सब कुछ गायब हो गया था.....बस मालिक, मौला....और तपस्वनी.....पता नहीं किस चीज़ की तलाश थी उनको.....जिसको ढूंढते रहे.....इस दुनिया मे नहीं मिली... तो उस दुनिया मे चले गए ढूँढने.....पलकें तो मेरी भी नम हो रही थी....शांत....और हर बात पर मुस्करा देना.....ये तो उनकी निशानी बन गयी थी.
भाईसाहब......डायरी का पेज नंबर ८७ पढ़िए ---- कई दिनों से हँसा नहीं हूँ, अकेले में जब हंसता तो लोग पागल समझ कर एक-दो गालियाँ दे देते हैं, माँ बच्चों को " पागल है कह कर दूर कर लेती हैं, कुछ बच्चे तो पत्थर मार कर भाग जाते हैं" ..............ऊफ.......किस चीज़ की तलाश थी उसको.....
उसके खाने-पीने का...?
भिक्षा.....
क्या.......
हाँ भाईसाहब...... भिक्षा, वो भी सिर्फ दो रोटी. यहाँ से १० कोस दूर एक गाँव है... वहाँ पर इनको दो रोटी वाला फ़कीर कह कर बुलाते थे.
लेकिन भैया.....को तो खाने-पीने का बड़ा शौक था.....
हाँ.....तभी तो अपने आप को चंद गालियों, कुछ अपमान और दो रोटियों में बाँध लिया था.
लेकिन....बहुत शांत अंत हुआ.....उनका. जो भी उनको चाहिए था....उसी के ध्यान में बैठ गए होंगे .....और कब शरीर छूटा , कोई नहीं जानता.
ये तपस्वनी कौन है....कुमोनिका जी का प्रश्न. तुम तो नहीं........? मैं कुमोनिका जी साहस की दाद दे रही थी की इस मौके पर भी वो अपने तीर छोड़ना ..... ना भूल सकीं.
रोहित.....कुमोनिका, आप जरा खामोश रह सकती हैं.
नहीं भाई साहब...कह लेने दीजिये....ये तपस्वनी कौन है....... किस लिए वो फ़कीर बन गए.... सब जवाब वो अपने साथ लेकर चल गए.
हाँ ...... राधा. मानता हूँ. लेकिन वो किस्मत का बहुत धनी था....की अंत समय में लोगों का प्यार ले कर गया. वही उसने बांटा...वही उसे मिला भी. और कम से कम वहाँ उसके प्राण निकले जहाँ कोई ना कोई तो था जो उसको जानता था, पहचानता था.... लावारिस नहीं गया वो.
अरे.... राधा....आनंद का अस्थिकलश पंडित जी के पास है....उसको भी प्रवाहित करना है.
अभी तक पंडित जी के पास है.....??? इतना मोह.....? एक फ़कीर से..... जिसके अपने, उसके ना हो सके...उसको पंडित जी ने अपनाया.......वैसे भाई साहब....बुरा ना मानियेगा....कुछ चूक आप से भी हुई.
यहाँ पास में कावेरी नदी है...उसी में प्रवाहित कर दीजियेगा.
पिता जी, माता जी को गंगा में और छोटे भाई को कावेरी में................सब मेरे ही हाँथो....
वाह रे भाग्य.... वाह रे वाह
वाह रे...भाग्य
पंडित जी...........
कौन है भाई......
अरे मैं.......हूँ.....हरिओम.
आओ.... हरिओम ....कोई चिट्ठी लाए हो क्या...... हरिओम गाँव के डाकिये का नाम है.
अरे ...नहीं बाबा..... शहर से कोई बड़े साहब और मेम साहब आये हैं..... आप का पता पूंछ रहे थे..... सो मै उनको ले आया.
कौन आया है.....
पंडित जी थोड़ा सिहर गए......क्योंकि किसी से बनावट से मिलना.... उनके चरित्र मे नहीं है....
जी साहब.....? पंडित जी बड़े साहब से मुखातिब हुए.
पंडित जी मेरा नाम रोहित है और ये मेरी पत्नी कुमोनिका.
जी स्वागत है...कहिये मैं आप के लिए क्या कर सकता हूँ......
पंडित जी....आप के मंदिर मे कुछ दिनों पहले कोई आदमी रहता था....
साहब...ये मंदिर है....यहाँ लोग आते जाते रहते हैं.....हम किसी का हिसाब नहीं रखते.
ये देखिये......ये तस्वीर.... क्या ये इंसान यहाँ रहा है..... आप को कुछ याद पड़ता है....?
पंडित जी तस्वीर देख....चोंक गए......लेकिन बहुत ख़ूबसूरती से अपने भावों को छुपा गए. आज ७० साल की दुनियादारी का अनुभव काम दिखा रहा था. वो तस्वीर उसी फ़कीर की थी...
जी..... आप का इनसे क्या सम्बन्ध है......अगर आप बुरा न माने....?
जी.... मैं उनका बड़ा भाई और ये उनकी भाभी हैं.
ओह.......अरे..... अंजलि बिटिया....जरा खटिया तो डाल दे....
हाँ.... बाबा.
आप लोग बैठिये , मैं अभी १० मिनट मे आया. ...... अंजलि ...साहब और मेमसाहब को पानी पिला दे.... अलमारी मे कांच के गिलास हैं...कपड़े से पोंछ लेना.
जी बाबा.....
दिन मे ३ बजे.....दरवाजे की घंटी बजी....कौन है....?
...................अरे बाबा आप......इस वक़्त यहाँ,.................. सब कुशल तो है......?
बिटिया..... फ़कीर की याद तो हैं ना तुझको ..........
हाँ बाबा... याद है...लेकिन आप इतना हांफ क्यों रहे हो....यहाँ बैठो.
मन ही मन सोचने लगी की बाबा बोल दो...की फ़कीर ज़िंदा है.
उसके बड़े भाई और भावज आये हैं.....
कहाँ.....यहाँ
हाँ.... मंदिर मे बैठा कर आया हूँ. साहब लगते है. मोटर गाड़ी से आयें हैं. मेरे पास कुछ मिठाई नहीं थी...तो लेने के लिए रति लाल की दूकान पर जा रहा था...तो याद आया की पैसे तो है ही नहीं... तू बिटिया २० रुपए दे दे.... कल वापस कर दूंगा....
बाबा................क्या बोल रहे हो. बिटिया भी बोल रहे हो.... और.........
ये लो.... और ये एक डिब्बा मिठाई भी ले जाओ. ..... मैं आऊं क्या.... मंदिर..?
आना चाहे तो आ......
अच्छा आप चलो.....मै आती हूँ. पंडित जी चले गए..... और मै भाग्य के इस खेल पर विस्मित...वहीं बैठ गयी.
उनके भैया और भाभी....... मतलब .... रोहित और कुमोनिका....? यहाँ इस गाँव मे....? क्या काम हो सकता है......?
मैने एक बार फिर....फ़कीर की डायरी ...देखी और फिर से सम्हाल दी.
साहब....माफ़ करियेगा....आप को इंतज़ार करना पड़ा. लीजिये....मिठाई खाइए.
पंडित जी बड़ा शांत वातावरण है यहाँ का. बरगद का पेड़....पोखरा.....काफी समय बाद गाँव देखा.
काम की बात करो..... कुमोनिका जी का..... भाई साहब को आदेश.
अच्छा..पंडित जी आप ने इस इंसान को देखा है....?
हाँ साहब देखा है.... यहाँ पर था.
अच्छा....अब कहाँ होंगे...भैया?
कुमोनिका .... जी का वात्सल्य से भरा स्वर.....
क्या काम आन पड़ा...साहब. ...... आप अगर उचित समझें तो बता सकते हैं. पंडित जी के स्वर में दृढ़ता.
अरे...पंडित जी अब क्या बताऊँ......ये २-३ कागज हैं.... इस पर छोटे भाई के दस्तखत चाहिए थे.....
क्या .... जायदाद के कागज हैं.....पंडित जी ने अपने ७० साल का अनुभव सामने रखते हुए पूंछा.
हाँ .....पंडित जी. लेकिन वो साहब हैं कहाँ......?
वो मेरा बेटा था....पंडित जी का दो टूक जवाब. और अब वो इस दुनिया मे नहीं हैं. आज से पहले आप ने कभी उनको ढूँढने की कोशिश नहीं की.... वो कहाँ है...कैसा है....है भी या नहीं है......
नहीं पंडित जी ऐसा नहीं है.....कुमोनिका जी का रक्षात्मक जवाब. इनके पास टाइम नहीं होता.... फिर बच्चे...और घर....आप तो सब कुछ छोड़ कर मंदिर में रहते हैं.....आप क्या समझ.....
जी...आप ठीक कह रहीं हैं....बेटी.....प्लेट में लगा कर मिठाई ला. और चाय भी ला....चाय तो पीते हैं ना आप लोग.....?
अरे नहीं...पंडित जी इसकी क्या जरूरत है......?
साहब......रति राम की दूकान की मिठाई है.....पास के गाँव तक नाम है उसका. और ये लीजिये... ये मिठाई मेरी एक बेटी ने आप लोगों के लिए भेजी है. ... वैसे साहब.....आप के भाई का नाम क्या था......
आनंद....
जैसा नाम....वैसा ही उसका स्वभाव...पंडित जी अपने आप से बोले.
अच्छा...साहब...अगर वो नहीं मिलेगा...तो आप क्या करोगे?
क्या करेंगे......ढूंढेंगे.
नहीं साहब...वो आप को इतना कष्ट नहीं देगा. ये कह कर पंडित जी अपने कमरे में गए.... और हाँथ मे एक मिट्टी की हंडिया , लाल कपड़े से बंधी हुई, ले कर लौटे.....ये है साहब...आनंद.
क्या.........................ये क्या...................
जी.... आज १५ दिन हो गए. अब इसके दस्तखत की जरूरत नहीं पड़ेगी आप को.....वो एक सतफ़ितेक (certificate ) बनता है...ना आदमी के मर जाने पर.... वो लगा दीजियेगा.....आप के सारे काम आसन कर गया ...आनंद. .... शक ना करिए मेरे उपर.....आप ने जब तस्वीर दिखाई..... तो मैं चौंक गया.......क्योंकि..... वो तो मेरा फ़कीर था.....मेरा बेटा था......उसकी कुछ चीजें थी...जो यहाँ एक बिटिया.....है...उसके पास हैं......
पंडित जी.....एहसान होगा....अगर आप उन तक हमे पहुंचा दें.....रोहित का शांत स्वर.
अंजलि....मैं साहब लोगों के साथ.... राधा बिटिया के घर जा रहा हूँ...जरा मंदिर देख लीजियो.....बिटिया.
जी बाबा.....अंजलि का जिम्मेदारी से भरा जवाब.
राधा बिटिया......देख कौन आये हैं.
आओ...बाबा....कौन है....
मुझे अंदेशा था...नमस्ते...आइये.
अरे राधा..... तुम...?
रोहित... जी का अपनत्व से भरा आश्चर्य .....
तुम....कुमोनिका जी..... का आश्चर्य से भरा... सवाल.
बैठिये..... क्रमश:
कौन है भाई......
अरे मैं.......हूँ.....हरिओम.
आओ.... हरिओम ....कोई चिट्ठी लाए हो क्या...... हरिओम गाँव के डाकिये का नाम है.
अरे ...नहीं बाबा..... शहर से कोई बड़े साहब और मेम साहब आये हैं..... आप का पता पूंछ रहे थे..... सो मै उनको ले आया.
कौन आया है.....
पंडित जी थोड़ा सिहर गए......क्योंकि किसी से बनावट से मिलना.... उनके चरित्र मे नहीं है....
जी साहब.....? पंडित जी बड़े साहब से मुखातिब हुए.
पंडित जी मेरा नाम रोहित है और ये मेरी पत्नी कुमोनिका.
जी स्वागत है...कहिये मैं आप के लिए क्या कर सकता हूँ......
पंडित जी....आप के मंदिर मे कुछ दिनों पहले कोई आदमी रहता था....
साहब...ये मंदिर है....यहाँ लोग आते जाते रहते हैं.....हम किसी का हिसाब नहीं रखते.
ये देखिये......ये तस्वीर.... क्या ये इंसान यहाँ रहा है..... आप को कुछ याद पड़ता है....?
पंडित जी तस्वीर देख....चोंक गए......लेकिन बहुत ख़ूबसूरती से अपने भावों को छुपा गए. आज ७० साल की दुनियादारी का अनुभव काम दिखा रहा था. वो तस्वीर उसी फ़कीर की थी...
जी..... आप का इनसे क्या सम्बन्ध है......अगर आप बुरा न माने....?
जी.... मैं उनका बड़ा भाई और ये उनकी भाभी हैं.
ओह.......अरे..... अंजलि बिटिया....जरा खटिया तो डाल दे....
हाँ.... बाबा.
आप लोग बैठिये , मैं अभी १० मिनट मे आया. ...... अंजलि ...साहब और मेमसाहब को पानी पिला दे.... अलमारी मे कांच के गिलास हैं...कपड़े से पोंछ लेना.
जी बाबा.....
दिन मे ३ बजे.....दरवाजे की घंटी बजी....कौन है....?
...................अरे बाबा आप......इस वक़्त यहाँ,.................. सब कुशल तो है......?
बिटिया..... फ़कीर की याद तो हैं ना तुझको ..........
हाँ बाबा... याद है...लेकिन आप इतना हांफ क्यों रहे हो....यहाँ बैठो.
मन ही मन सोचने लगी की बाबा बोल दो...की फ़कीर ज़िंदा है.
उसके बड़े भाई और भावज आये हैं.....
कहाँ.....यहाँ
हाँ.... मंदिर मे बैठा कर आया हूँ. साहब लगते है. मोटर गाड़ी से आयें हैं. मेरे पास कुछ मिठाई नहीं थी...तो लेने के लिए रति लाल की दूकान पर जा रहा था...तो याद आया की पैसे तो है ही नहीं... तू बिटिया २० रुपए दे दे.... कल वापस कर दूंगा....
बाबा................क्या बोल रहे हो. बिटिया भी बोल रहे हो.... और.........
ये लो.... और ये एक डिब्बा मिठाई भी ले जाओ. ..... मैं आऊं क्या.... मंदिर..?
आना चाहे तो आ......
अच्छा आप चलो.....मै आती हूँ. पंडित जी चले गए..... और मै भाग्य के इस खेल पर विस्मित...वहीं बैठ गयी.
उनके भैया और भाभी....... मतलब .... रोहित और कुमोनिका....? यहाँ इस गाँव मे....? क्या काम हो सकता है......?
मैने एक बार फिर....फ़कीर की डायरी ...देखी और फिर से सम्हाल दी.
साहब....माफ़ करियेगा....आप को इंतज़ार करना पड़ा. लीजिये....मिठाई खाइए.
पंडित जी बड़ा शांत वातावरण है यहाँ का. बरगद का पेड़....पोखरा.....काफी समय बाद गाँव देखा.
काम की बात करो..... कुमोनिका जी का..... भाई साहब को आदेश.
अच्छा..पंडित जी आप ने इस इंसान को देखा है....?
हाँ साहब देखा है.... यहाँ पर था.
अच्छा....अब कहाँ होंगे...भैया?
कुमोनिका .... जी का वात्सल्य से भरा स्वर.....
क्या काम आन पड़ा...साहब. ...... आप अगर उचित समझें तो बता सकते हैं. पंडित जी के स्वर में दृढ़ता.
अरे...पंडित जी अब क्या बताऊँ......ये २-३ कागज हैं.... इस पर छोटे भाई के दस्तखत चाहिए थे.....
क्या .... जायदाद के कागज हैं.....पंडित जी ने अपने ७० साल का अनुभव सामने रखते हुए पूंछा.
हाँ .....पंडित जी. लेकिन वो साहब हैं कहाँ......?
वो मेरा बेटा था....पंडित जी का दो टूक जवाब. और अब वो इस दुनिया मे नहीं हैं. आज से पहले आप ने कभी उनको ढूँढने की कोशिश नहीं की.... वो कहाँ है...कैसा है....है भी या नहीं है......
नहीं पंडित जी ऐसा नहीं है.....कुमोनिका जी का रक्षात्मक जवाब. इनके पास टाइम नहीं होता.... फिर बच्चे...और घर....आप तो सब कुछ छोड़ कर मंदिर में रहते हैं.....आप क्या समझ.....
जी...आप ठीक कह रहीं हैं....बेटी.....प्लेट में लगा कर मिठाई ला. और चाय भी ला....चाय तो पीते हैं ना आप लोग.....?
अरे नहीं...पंडित जी इसकी क्या जरूरत है......?
साहब......रति राम की दूकान की मिठाई है.....पास के गाँव तक नाम है उसका. और ये लीजिये... ये मिठाई मेरी एक बेटी ने आप लोगों के लिए भेजी है. ... वैसे साहब.....आप के भाई का नाम क्या था......
आनंद....
जैसा नाम....वैसा ही उसका स्वभाव...पंडित जी अपने आप से बोले.
अच्छा...साहब...अगर वो नहीं मिलेगा...तो आप क्या करोगे?
क्या करेंगे......ढूंढेंगे.
नहीं साहब...वो आप को इतना कष्ट नहीं देगा. ये कह कर पंडित जी अपने कमरे में गए.... और हाँथ मे एक मिट्टी की हंडिया , लाल कपड़े से बंधी हुई, ले कर लौटे.....ये है साहब...आनंद.
क्या.........................ये क्या...................
जी.... आज १५ दिन हो गए. अब इसके दस्तखत की जरूरत नहीं पड़ेगी आप को.....वो एक सतफ़ितेक (certificate ) बनता है...ना आदमी के मर जाने पर.... वो लगा दीजियेगा.....आप के सारे काम आसन कर गया ...आनंद. .... शक ना करिए मेरे उपर.....आप ने जब तस्वीर दिखाई..... तो मैं चौंक गया.......क्योंकि..... वो तो मेरा फ़कीर था.....मेरा बेटा था......उसकी कुछ चीजें थी...जो यहाँ एक बिटिया.....है...उसके पास हैं......
पंडित जी.....एहसान होगा....अगर आप उन तक हमे पहुंचा दें.....रोहित का शांत स्वर.
अंजलि....मैं साहब लोगों के साथ.... राधा बिटिया के घर जा रहा हूँ...जरा मंदिर देख लीजियो.....बिटिया.
जी बाबा.....अंजलि का जिम्मेदारी से भरा जवाब.
राधा बिटिया......देख कौन आये हैं.
आओ...बाबा....कौन है....
मुझे अंदेशा था...नमस्ते...आइये.
अरे राधा..... तुम...?
रोहित... जी का अपनत्व से भरा आश्चर्य .....
तुम....कुमोनिका जी..... का आश्चर्य से भरा... सवाल.
बैठिये..... क्रमश:
Tuesday, December 7, 2010
इजहार......
ज्योति....अपने घर चली गयी. मैं उसके सवालों से नहीं उसकी मनोदशा को लेकर चिंतित था. मै उसके मनोभावों को लेकर चिंतित था. क्या मैं गलत हूँ.....? आज काफी समय बाद मेरे अंदर ये शोर मचा. वो शोर...जिसको मैं काफी समय पहले दफना चुका था. अलमारी से गरम चादर निकाल कर मै नदी के किनारे घूमने निकल गया.
ऐसा क्या हुआ...जो मुझे विचलित कर रहा है.....?
मै जिस दौर से गुजरा हूँ...आम इंसान को तोड़ने के लिए काफी था. नहीं..... मुझे ज्योति से मिलना चाहिए.....चलो. उसीके घर चलते हैं.
क्या मैं अंदर आ सकता हूँ...........
आप......ज्योति का विस्मित सा स्वर.
हाँ...मैं..................क्यों मैं अंदर नहीं आ सकता हूँ??
आनंद .... ये तुम्हारा ही घर है......उसके मुँह से शब्द निकल गए. यहाँ तुमको , अगर पूंछ कर आना पड़े.....तो.
अच्छा अब तो से आगे मत बोलना .....
लो बाबूजी .... काका ने एक कुर्सी रखते हुए कहा.
आता हूँ.... जरा चाची को पा लागन तो कह दूँ.
चाची राम - राम.....
अरे.... आनंद बेटा...कब आया तू? तबीयत कैसी है...अब?
अभी आ आया हूँ...चाची और तबीयत तो रानी लक्ष्मी बाई की कृपा से पहले से ठीक है.
ईश्वर की कृपा तो सुनी थी.....ये रानी लक्ष्मीबाई की कृपा.....? ज्योति.... के चेहरे पर एक हलकी सी मुस्कराहट.
अरे...... चाची.... अब क्या बताऊँ....
लो बाबूजी पानी पी लो............
अब ठंड मे ठंडा पानी पिला दो...काका. इतने दिनों बाद तो चलने लायक हुए हैं.......फिर लिटा दो बिस्तर पर. ज्योति की डांट काका को.
बेटा चाय..पिएगा....?
चाची... जरा अदरक और तुलसी डाल देना. गले को आराम मिलेगा.
अभी लाई....
बैठो लक्ष्मी बाई......ज्योति से मेरा आग्रह.
ये लक्ष्मी बाई- लक्ष्मी बाई क्या लगा रखा है.... बैठते हुए ज्योति का विरोध.
आज बुरा लगा.... सवेरे जो मैने कहा....? मेरा प्रश्न ज्योति से.
नहीं.....
ज्योति..... जो कुछ समझता हूँ....तुमको अपना समझ कर बोल देता हूँ.... अगर बुरा लगा हो...तो मै माफ़ी......
ये क्या कह रहे हैं......क्या इसलिए आये हो?
सच बोलूं तो हाँ.......तुम्हारे जाने के बाद काफी देर तक सोचता रहा....और मंत्रमुग्ध हो गया तुम्हारी साफगोई पर. कितनी हिम्मत कर के तुमने आज अपना दिल खोला मेरे आगे.
मुरीद तो मै हो गयी आप की....कुछ भी नहीं छुपाया आपने. मेरे सारे सवालों के जवाब दे दिए. कितना संतुलन. मैने आपकी दुखती रग पर हाँथ रखने का पाप आज किया है. बहुत अच्छा किया की आप घर आये. कम से कम दिल को तसल्ली तो हो गयी..नहीं तो आज नींद ना आती. .................बिना रुके हुए ज्योति सारी बातें कहती चली जा रही थी ..मै सुनता रहा......
लो बेटा ...चाय लो.
लाओ चाची..... आज खाने मे क्या बन रहा है.....? रोटी सब्जी.....खाना खा कर ही जाना.
जी चाची....वो बढ़ गयीं रसोई की तरफ.
शुक्रिया..... आप ने खाने के लिए कहा. ज्योति का स्वर.
अरे...भाई...मुझे भी भूख लगती है...?
आनंद ...... आप बहुत सुलझे हुए इंसान हो. मै आप को खोना नहीं चाहती.
खोना...मै भी नहीं चाहता. कई सालों से एक स्वस्थ रिश्ते की खोज मे भटक रहा था. उस खोज पर दुबारा निकलने का साहस नहीं है. अगर एक सवस्थ रिश्ता चाहिए... तो एक दूसरे को समझना पड़ता है.....कई बार अपने आप को छोड़ना पड़ता है. जब किसी दूसरे को स्वीकार करें.... तो उसकी हर अच्छाई और हर बुराई के साथ स्वीकार करें....तभी रिश्ता पूर्ण होता है. नहीं तो .... रिश्ते शर्तों पर बनते हैं.......
ठीक कह रहे हो आनंद..... लेकिन..जहाँ मेरा रिश्ता हुआ... वो अगर ऐसा ना सोचते हुए तो?
किसी को अपने साथ लाने के लिए पहले उसको समझो. अपने आप को लादो मत उसके उपर. पति होने के नाते , वो एक इज्ज़त जरूर चाहेंगे....स्वाभाविक है. और एक पत्नी होने के नाते... तुम थोड़ा सा प्रेम चाहोगी.... वो भी natural है....लेकिन.....अगर तुमको , उनको अपने साथ लाना है.....तो अपने अंदर एक flexibility जरूर रखना. जैसे बच्चे के साथ बच्चा बन कर ही खेला जाता है..... और जब वो आप का हो जाए.....तो फिर जो उसको सीखाएँ....बोलो है की नहीं.....?
ज्योति.... ज़िन्दगी बहुत सरल है.....हम सोच-सोच कर, अपनी तरफ से किन्तु-परन्तु लगा कर उसको complicated बना देते हैं......और जब सब उलझ जाता है..... तो किस्मत और भगवान् को दोष देते हैं......बोलो.... इसमे भगवान् का क्या दोष? लो एक शेर सुनो.....
ज़िन्दगी जीने को दी, जी मैने. (बोलो हाँ.... ज्योति ...हाँ)
किस्मत मे लिखा था पी, तो पी मैने. (बोलो हाँ.... ज्योति ...हाँ)
मै ना पीता तो उसका लिखा गलत हो जाता, (बोलो हाँ.... ज्योति ...हाँ)
उसके लिक्खे को निभाया, क्या खता की मैने. (बोलो हाँ.... ज्योति ..... चुप)
आप भी ना....आनंद...क्या करूँ, मै आप का.
काका..... जरा चाची से पूंछो....के नाराज़ होना है तो होलें....लेकिन क्या एक कप चाय और मिल जायेगी.
जी..... बाबूजी .... अभी लाया. आप तो वैसे भी इतने टेम बाद आये हो.
आनंद.................... आप लोगों को कैसे जीत लेते हो...?
ज्योति....मेरे बारे मैं.....जो तुम्हारे मन पर प्रभाव है उसको दूर करो.
क्या प्रभाव..है.... हाय राम... जरा जानूं तो.
अगर किसी को जीतना है...... तो प्यार बांटो. जहाँ तक मेरा अनुभव जाता है... दुनिया मे हर आदमी दो चीज़ों का भूखा होता है.....
वो क्या भला.......
प्यार और सम्मान....सम्मान का मतलब फूल-मालों से लादना नहीं होता है.
ठीक कह रहे हैं आप......मैं समझती हूँ.
जो हम देते हैं- वही हमें वापस मिलता है. ये दुनिया का, कुदरत का नियम है....प्यार दो-प्यार ही वापस मिलेगा, इज्ज़त दो- इज्ज़त ही वापस मिलेगी.......
कई बार ऐसा भी होता है...आनंद, की हम तो प्यार बांटते हैं, बदले में गालियाँ मिलती हैं.....अपमान मिलता है....
हाँ ये भी होता है..... लेकिन, दूसरे ने हमे साथ क्या किया...ये बाद मे आता है. हमारा जो स्वभाव है, जो धर्म है... उस से हम तो विमुख ना हुए..... ये जरूरी है. कर्तव्य करा...और आगे बढ़ गए. क्यों हम उसके परिणाम जानने के लिए उससे चिपक जाते हैं... तकलीफ तब होती है....ज्योति.
जिसकी फितरत ही है डसना, वो तो डसेगा,
मत सोचा कर मर जावेगा,
तनहा-तनहा मत सोच कर, मर जावेगा,
ये सब इतना आसान नहीं है ...आनंद.
मुश्किल भी नहीं.....हमारे उपर है...की हम सूरज की तरफ देखते हैं... या परछाइं की तरफ.
अच्छा एक बात और पूंछु....
बोलो...
जिसको भी आप ने प्रेम किया....क्या उसने कभी आप का हाल-चाल जाने की नहीं कोशिश करी...? अगर आप जवाब ना देना चाहें....तो रहने दीजियेगा.
नहीं ज्योति.....ऐसा अब कुछ नहीं है...जिससे मै विमुख हूँ. रही बात हाल-चाल जानने की..... किस के पास वक़्त है.... और किस को जरूरत है..? प्लास्टिक के ग्लास मे कोका-कोला पी कर ग्लास को हम जेब या पर्स मे तो नहीं रखते... use and throw.
आनंद...अब आगे कुछ मत बोलो..... कोई कैसे कर सकता है आप के साथ....?
कुछ तो मजबूरियां रही होंगी,
यूँ ही कोई बेवफा नहीं होता....... खैर छोड़ो.....इन बातों को. मेरा जवाब.
अभी भी आप उसके पक्ष मे बोलते हो......
पगली... ये प्रेम है....कोई चुनाव का मैदान नहीं जहाँ पक्ष और विपक्ष हो.
चाची...... पेट में चूहे दौड़ रहे हैं.......
बस बेटा ....... लगा रही हूँ.....
क्यों झूठ बोल रहें हैं........घर में तो चाय और चुरुट से पेट भर जाता है.....माँ को खुश कर रहे हैं...?
ज्योति....अगर उनको इस बात से ख़ुशी मिल रही है.... तो इसमे कोई नुकसान तो नहीं है?
आनंद...किनती छोटी छोटी बातों का ध्यान रखते हो आप....?
पागल.... ये बाते ध्यान रखने वाली नहीं हैं........हम बड़ी बड़ी खुशियों की तलाश मे , छोटी छोटी खुशियों को नज़रंदाज़ कर जाते हैं......जो हमारे चारों तरफ बिखरी पड़ी हैं......
लाओ चाची...वाह....मूली के पराठे और मेथी का साग......साथ में अदरक की चटनी.... चाची ... तुझे सलाम.
बस कर कर.... चल खा....
और रानी लक्ष्मी बाई की थाली......?
ला रहीं हूँ...उसके लिए भी.
आप जानते हो...आनंद मुझे सबसे बड़ी चिंता किस बात की है...? जब में चली जाउंगी.... दूसरे घर..तो आप की देखभाल कौन करेगा? आप तो मुँह खोलोगे नहीं....?
बस चाची .... और नहीं......दो दिन का खाना खा लिया, आज.
सांप हैं क्या आप?
लो सुन लो चाची क्या पूंछ रहीं हैं..... आप की बेटी.
क्या.....?
पूंछ रहीं है की क्या मैं सांप हूँ....?
हाय राम.... क्यों?
अरे माँ.... सांप जाड़ों मे एक दिन मे इतना खा लेता है की फिर ३- ४ दिन की फुर्सत.
चाची समझा लो बिटिया को......... कहीं डस लिया तो अनर्थ हो जायेगा......
तो डस लो..... डसो तो सही....
मे ज्योति के चेहरा देखता रह गया.
चलो अपना लड़ाई-झगडा खुद ही निपटाओ.
अच्छा चाची... अब चलता हूँ.....
ठीक है बेटा... आते रहना.
जी... चाची से विदा लेकर मैं बाहर निकला ... ज्योति दहलीज तक आई......
अच्छा .... अब इज्ज़ाज़त दो.....
आनंद....... ...........
बोलो........
............कुछ नहीं......
उसकी झुकी हुई नज़र.....एक नाज़ुक सी मुस्कराहट सब कह गयी......
इजहार......
ऐसा क्या हुआ...जो मुझे विचलित कर रहा है.....?
मै जिस दौर से गुजरा हूँ...आम इंसान को तोड़ने के लिए काफी था. नहीं..... मुझे ज्योति से मिलना चाहिए.....चलो. उसीके घर चलते हैं.
क्या मैं अंदर आ सकता हूँ...........
आप......ज्योति का विस्मित सा स्वर.
हाँ...मैं..................क्यों मैं अंदर नहीं आ सकता हूँ??
आनंद .... ये तुम्हारा ही घर है......उसके मुँह से शब्द निकल गए. यहाँ तुमको , अगर पूंछ कर आना पड़े.....तो.
अच्छा अब तो से आगे मत बोलना .....
लो बाबूजी .... काका ने एक कुर्सी रखते हुए कहा.
आता हूँ.... जरा चाची को पा लागन तो कह दूँ.
चाची राम - राम.....
अरे.... आनंद बेटा...कब आया तू? तबीयत कैसी है...अब?
अभी आ आया हूँ...चाची और तबीयत तो रानी लक्ष्मी बाई की कृपा से पहले से ठीक है.
ईश्वर की कृपा तो सुनी थी.....ये रानी लक्ष्मीबाई की कृपा.....? ज्योति.... के चेहरे पर एक हलकी सी मुस्कराहट.
अरे...... चाची.... अब क्या बताऊँ....
लो बाबूजी पानी पी लो............
अब ठंड मे ठंडा पानी पिला दो...काका. इतने दिनों बाद तो चलने लायक हुए हैं.......फिर लिटा दो बिस्तर पर. ज्योति की डांट काका को.
बेटा चाय..पिएगा....?
चाची... जरा अदरक और तुलसी डाल देना. गले को आराम मिलेगा.
अभी लाई....
बैठो लक्ष्मी बाई......ज्योति से मेरा आग्रह.
ये लक्ष्मी बाई- लक्ष्मी बाई क्या लगा रखा है.... बैठते हुए ज्योति का विरोध.
आज बुरा लगा.... सवेरे जो मैने कहा....? मेरा प्रश्न ज्योति से.
नहीं.....
ज्योति..... जो कुछ समझता हूँ....तुमको अपना समझ कर बोल देता हूँ.... अगर बुरा लगा हो...तो मै माफ़ी......
ये क्या कह रहे हैं......क्या इसलिए आये हो?
सच बोलूं तो हाँ.......तुम्हारे जाने के बाद काफी देर तक सोचता रहा....और मंत्रमुग्ध हो गया तुम्हारी साफगोई पर. कितनी हिम्मत कर के तुमने आज अपना दिल खोला मेरे आगे.
मुरीद तो मै हो गयी आप की....कुछ भी नहीं छुपाया आपने. मेरे सारे सवालों के जवाब दे दिए. कितना संतुलन. मैने आपकी दुखती रग पर हाँथ रखने का पाप आज किया है. बहुत अच्छा किया की आप घर आये. कम से कम दिल को तसल्ली तो हो गयी..नहीं तो आज नींद ना आती. .................बिना रुके हुए ज्योति सारी बातें कहती चली जा रही थी ..मै सुनता रहा......
लो बेटा ...चाय लो.
लाओ चाची..... आज खाने मे क्या बन रहा है.....? रोटी सब्जी.....खाना खा कर ही जाना.
जी चाची....वो बढ़ गयीं रसोई की तरफ.
शुक्रिया..... आप ने खाने के लिए कहा. ज्योति का स्वर.
अरे...भाई...मुझे भी भूख लगती है...?
आनंद ...... आप बहुत सुलझे हुए इंसान हो. मै आप को खोना नहीं चाहती.
खोना...मै भी नहीं चाहता. कई सालों से एक स्वस्थ रिश्ते की खोज मे भटक रहा था. उस खोज पर दुबारा निकलने का साहस नहीं है. अगर एक सवस्थ रिश्ता चाहिए... तो एक दूसरे को समझना पड़ता है.....कई बार अपने आप को छोड़ना पड़ता है. जब किसी दूसरे को स्वीकार करें.... तो उसकी हर अच्छाई और हर बुराई के साथ स्वीकार करें....तभी रिश्ता पूर्ण होता है. नहीं तो .... रिश्ते शर्तों पर बनते हैं.......
ठीक कह रहे हो आनंद..... लेकिन..जहाँ मेरा रिश्ता हुआ... वो अगर ऐसा ना सोचते हुए तो?
किसी को अपने साथ लाने के लिए पहले उसको समझो. अपने आप को लादो मत उसके उपर. पति होने के नाते , वो एक इज्ज़त जरूर चाहेंगे....स्वाभाविक है. और एक पत्नी होने के नाते... तुम थोड़ा सा प्रेम चाहोगी.... वो भी natural है....लेकिन.....अगर तुमको , उनको अपने साथ लाना है.....तो अपने अंदर एक flexibility जरूर रखना. जैसे बच्चे के साथ बच्चा बन कर ही खेला जाता है..... और जब वो आप का हो जाए.....तो फिर जो उसको सीखाएँ....बोलो है की नहीं.....?
ज्योति.... ज़िन्दगी बहुत सरल है.....हम सोच-सोच कर, अपनी तरफ से किन्तु-परन्तु लगा कर उसको complicated बना देते हैं......और जब सब उलझ जाता है..... तो किस्मत और भगवान् को दोष देते हैं......बोलो.... इसमे भगवान् का क्या दोष? लो एक शेर सुनो.....
ज़िन्दगी जीने को दी, जी मैने. (बोलो हाँ.... ज्योति ...हाँ)
किस्मत मे लिखा था पी, तो पी मैने. (बोलो हाँ.... ज्योति ...हाँ)
मै ना पीता तो उसका लिखा गलत हो जाता, (बोलो हाँ.... ज्योति ...हाँ)
उसके लिक्खे को निभाया, क्या खता की मैने. (बोलो हाँ.... ज्योति ..... चुप)
आप भी ना....आनंद...क्या करूँ, मै आप का.
काका..... जरा चाची से पूंछो....के नाराज़ होना है तो होलें....लेकिन क्या एक कप चाय और मिल जायेगी.
जी..... बाबूजी .... अभी लाया. आप तो वैसे भी इतने टेम बाद आये हो.
आनंद.................... आप लोगों को कैसे जीत लेते हो...?
ज्योति....मेरे बारे मैं.....जो तुम्हारे मन पर प्रभाव है उसको दूर करो.
क्या प्रभाव..है.... हाय राम... जरा जानूं तो.
अगर किसी को जीतना है...... तो प्यार बांटो. जहाँ तक मेरा अनुभव जाता है... दुनिया मे हर आदमी दो चीज़ों का भूखा होता है.....
वो क्या भला.......
प्यार और सम्मान....सम्मान का मतलब फूल-मालों से लादना नहीं होता है.
ठीक कह रहे हैं आप......मैं समझती हूँ.
जो हम देते हैं- वही हमें वापस मिलता है. ये दुनिया का, कुदरत का नियम है....प्यार दो-प्यार ही वापस मिलेगा, इज्ज़त दो- इज्ज़त ही वापस मिलेगी.......
कई बार ऐसा भी होता है...आनंद, की हम तो प्यार बांटते हैं, बदले में गालियाँ मिलती हैं.....अपमान मिलता है....
हाँ ये भी होता है..... लेकिन, दूसरे ने हमे साथ क्या किया...ये बाद मे आता है. हमारा जो स्वभाव है, जो धर्म है... उस से हम तो विमुख ना हुए..... ये जरूरी है. कर्तव्य करा...और आगे बढ़ गए. क्यों हम उसके परिणाम जानने के लिए उससे चिपक जाते हैं... तकलीफ तब होती है....ज्योति.
जिसकी फितरत ही है डसना, वो तो डसेगा,
मत सोचा कर मर जावेगा,
तनहा-तनहा मत सोच कर, मर जावेगा,
ये सब इतना आसान नहीं है ...आनंद.
मुश्किल भी नहीं.....हमारे उपर है...की हम सूरज की तरफ देखते हैं... या परछाइं की तरफ.
अच्छा एक बात और पूंछु....
बोलो...
जिसको भी आप ने प्रेम किया....क्या उसने कभी आप का हाल-चाल जाने की नहीं कोशिश करी...? अगर आप जवाब ना देना चाहें....तो रहने दीजियेगा.
नहीं ज्योति.....ऐसा अब कुछ नहीं है...जिससे मै विमुख हूँ. रही बात हाल-चाल जानने की..... किस के पास वक़्त है.... और किस को जरूरत है..? प्लास्टिक के ग्लास मे कोका-कोला पी कर ग्लास को हम जेब या पर्स मे तो नहीं रखते... use and throw.
आनंद...अब आगे कुछ मत बोलो..... कोई कैसे कर सकता है आप के साथ....?
कुछ तो मजबूरियां रही होंगी,
यूँ ही कोई बेवफा नहीं होता....... खैर छोड़ो.....इन बातों को. मेरा जवाब.
अभी भी आप उसके पक्ष मे बोलते हो......
पगली... ये प्रेम है....कोई चुनाव का मैदान नहीं जहाँ पक्ष और विपक्ष हो.
चाची...... पेट में चूहे दौड़ रहे हैं.......
बस बेटा ....... लगा रही हूँ.....
क्यों झूठ बोल रहें हैं........घर में तो चाय और चुरुट से पेट भर जाता है.....माँ को खुश कर रहे हैं...?
ज्योति....अगर उनको इस बात से ख़ुशी मिल रही है.... तो इसमे कोई नुकसान तो नहीं है?
आनंद...किनती छोटी छोटी बातों का ध्यान रखते हो आप....?
पागल.... ये बाते ध्यान रखने वाली नहीं हैं........हम बड़ी बड़ी खुशियों की तलाश मे , छोटी छोटी खुशियों को नज़रंदाज़ कर जाते हैं......जो हमारे चारों तरफ बिखरी पड़ी हैं......
लाओ चाची...वाह....मूली के पराठे और मेथी का साग......साथ में अदरक की चटनी.... चाची ... तुझे सलाम.
बस कर कर.... चल खा....
और रानी लक्ष्मी बाई की थाली......?
ला रहीं हूँ...उसके लिए भी.
आप जानते हो...आनंद मुझे सबसे बड़ी चिंता किस बात की है...? जब में चली जाउंगी.... दूसरे घर..तो आप की देखभाल कौन करेगा? आप तो मुँह खोलोगे नहीं....?
बस चाची .... और नहीं......दो दिन का खाना खा लिया, आज.
सांप हैं क्या आप?
लो सुन लो चाची क्या पूंछ रहीं हैं..... आप की बेटी.
क्या.....?
पूंछ रहीं है की क्या मैं सांप हूँ....?
हाय राम.... क्यों?
अरे माँ.... सांप जाड़ों मे एक दिन मे इतना खा लेता है की फिर ३- ४ दिन की फुर्सत.
चाची समझा लो बिटिया को......... कहीं डस लिया तो अनर्थ हो जायेगा......
तो डस लो..... डसो तो सही....
मे ज्योति के चेहरा देखता रह गया.
चलो अपना लड़ाई-झगडा खुद ही निपटाओ.
अच्छा चाची... अब चलता हूँ.....
ठीक है बेटा... आते रहना.
जी... चाची से विदा लेकर मैं बाहर निकला ... ज्योति दहलीज तक आई......
अच्छा .... अब इज्ज़ाज़त दो.....
आनंद....... ...........
बोलो........
............कुछ नहीं......
उसकी झुकी हुई नज़र.....एक नाज़ुक सी मुस्कराहट सब कह गयी......
इजहार......
दूर ही से सही, तुझ से निस्बत रहे.
कुछ वाक्ये खत्म नहीं होते हैं...... उनको दबा दिया जाता है. और कुछ लोग इस काम मे माहिर होते हैं....आनंद उनमे से एक हैं. अगर कुछ समझाना है... तो शब्दों के जादूगर, और कुछ नहीं बताना है.... तो इतने सीधे जैसे कुछ जानते ही नहीं हों....कुछ समझते ही नहीं हों. .... उनकी इस आदत पर कभी गुस्सा भी आता ...... और कभी प्यार भी....मैं अभी तक नहीं समझ पाई की मुझ से विवाह की बात वो घुमा क्यों गए.....आज पूंछुगी. सीधे पूंछुगी.....
माँ.... मैं आनंद जी के घर जा रही हूँ....
सुन...... ये फल लेती जा....
लाओ.....और सुनो...मेरा खाना वहीं भिजवा देना....
मैं चल दी.....आज मन की सारी दुविधा दूर करने के लिए.
आनंद घर के बाहर ही मिल गए......बाग़ मे थे.....
क्या उखाड़ रहे हैं......
घास-पात.....जो काम की नहीं हो....उसको क्यों व्यर्थ बढने दें.....वो दूसरों का भी रास्ता रोकते हैं.
आनंद का पहला तीर.
तुम बैठो...मे १० मिनट मे आता हूँ.....और सुनो..खाली बैठ कर तो तुमको विचारों के पंख लग जाते हैं......इसलिए... अपने आप को चाय बनाने में व्यस्त कर सकती हो....
आनंद का फरमाइश करने का अंदाज ऐसा है....की मैं मना कर ही नहीं पाती... या कर नहीं सकती...पता नहीं.
आइये..... चाय... साहब के इंतज़ार में भाप बन कर उडती जा रही है......
जी.....लाइए.....महक तो दिलकश है...... अब पीकर भी देखली जाए....
आप.....
अरे, अरे.....गुस्सा ना होइए....खूबसूरत लड़कियों को गुस्सा नहीं करना चाहिए.....वो और ख़ूबसूरत लगती हैं.
क्या बात है.... आज सरकार.... बड़े मूड में हैं........
हाँ ... वो तो है.......दीनानाथ की बिटिया ...जिले मे 2nd आई है....दसवीं के इम्तेहान मे.
अरे वाह.....
अरे..... रसोई मे मिठाई रखी है .....लाओ तो. दीनानाथ दे गया था.
जी......मैं सोचने लगी.....आनंद इतने अच्छे मूड में हैं, इतने खुश हैं.....बात करूँ.....या ना करूँ....... चलो देखते हैं....
लो....खाओ. इस मिठाई की मिठास अलग है....इसमे रानी बिटिया के पसीने की महक है.....
माथे से पसीने की महक, आये ना जिसके
वो खून मेरे जिस्म में गर्दिश नहीं करता....
आप ने सवेरे - सवेरे कैसे दर्शन दिए....
आप के दर्शन के लिए आई हूँ......
अरे....वाह..... आप ने तो मुझे भगवान् बना दिया. अरे...मुझे इंसान ही रहने दो. लेकिन...कुछ कहना या पूंछना है तो झिझको मत....
आप को कैसे पता......की
ज्योति......कितने सालों से जानता हूँ तुमको..... बताओ.....उसके बाद भी अगर इतनी सी बात ना समझ सकूँ तो फिर.......
आप गुस्सा तो नहीं करोगे.......
आप से , या आप पर कभी गुस्सा किया है......इसका मतलब की आज....कुछ ना कुछ तो जरूर होना है, सामना आज उनसे होना है. ...... बोलो......
आप.....मुझसे शादी क्यों नहीं करना चाहते.....मेरा सीधा सवाल..... आनंद मेरी तरफ देखते रहे....
मैने आप को बताया की माँ-पिता जी मेरे लिए रिश्ता देख रहे हैं.....तभी भी आप ने कोई प्रतिक्रया नहीं दी. क्यों...? आप अकेले क्यों और कब तक रहना चाहते हैं......कब तक तो बाद मे...पहले क्यों का जवाब दीजिये....इतना हक तो मैं रखती हूँ....पूंछने का. और मुझे भैया जी वाला आनंद नहीं चाहिए, बाबूजी वाला आनंद नहीं चाहिएमुझे सर वाला आनंद नहीं चाहिए.... मुझे आनंद वाला आनंद चाहिए.....
हम्म्म्म..............तो आज रानी लक्ष्मीबाई आई हैं.
यही समझ लो.....
देखो... ज्योति, हर रिश्ते की एक मियाद होती है.....एक समय सीमा होती है. वो रिश्ता उसके बाद मर जाता है....सोल्हो आने ना सही लेकिन सच है. जब विवाह होता है.....तो एक निश्चित समय बाद घर मे दो लोग रह जाते हैं.... जिसको समाज पति-पत्नी का नाम देता है. नाम रह जाता है...इंसान मर जाते हैं. सम्मान खत्म हो जाता है.
पति...एक पति, एक पिता, एक बेटा, एक भाई.....और पत्नी... एक पत्नी, एक माँ, एक बहन और एक बेटी बन कर रह जाती है.....मैं ये नहीं कहता की मे सही हूँ......लेकिन, आजकल की जो ज़िन्दगी है ना...ज्योति... वो अपना टैक्स मांगती है. और उस टैक्स को भरते भरते .... कब लकडियाँ मिल गयीं, या कब कब्र नसीब हो गयी यही नहीं पता चलता. मै तुमको ....ज्योति की तरह ही देखना चाहता हूँ..... तुम्हारा अपना जो एक अस्तित्व है.....उसको तुम मिटाओ....या वो मिटे....मुझे गंवारा नहीं.
इसलिए..... तुमपर मेरा एक अधिकार है, या मुझ पर तुम्हारा एक अधिकार है.... और उसकी जो ख़ूबसूरती है.....वो ज्यादा जरूरी है. तुम को अच्छी तरह से ये ज्ञान है...की अगर तुम पर कभी कोई मुसीबत आये..... तो मै हूँ.....एक दोस्त. अगर कभी मेरी जरुरत हुई... तो मै हूँ.....
अगर हर आदमी और औरत आपकी तरह सोचने लगे तो कोई विवाह ही ना हो......
मुझे इस प्रश्न की उम्मीद थी. तुमने प्रश्न मुझसे किया..... और मैने अपनी सोच बताई. मै ये नहीं कहता सब मेरे तरह सोचते हों..... और संभव भी नहीं है.....तुम्हारे घर मे पांच लोग है..... उनसे इस विषय या किसी भी विषय मे राय लो....... पांच अलग-अलग राय मिलेंगी.
क्या आप किसी को प्रेम करते हैं......? मेरे पूर्व सोचे गए सवालों मे से ये आखरी सवाल.
कोई जवाब नहीं..... आज पहली बार आनंद को मैने अपने सामने इतना खामोश पाया.
क्या मै इस मौन को अपने प्रश्न की स्वीक्रति समझूँ.....?
ज्योति..... प्रेम....गूंगे का गुड़ है. मुझे ये नहीं पता की प्रेम क्या होता है... तो मै तुम्हारे सवाल का क्या उत्तर दूँ...? अगर कोई .... किसी का बिना वजह इंतज़ार करता है.....ना मिलने पर मन बैचैन होता है......जिस सिम्त भी नज़र उठ जाएँ....उसी का इंतज़ार लगे......पल पल अगर वो हो तो कैसा हो, ये सोचने लगे ..... तुझे बरबाद तो होना था खुमार, नाज़ कर नाज़ की उसने तुझे बर्बाद किया. अगर अपने बरबाद होने पर भी गुरूर होना... प्रेम है.... तो मैने प्रेम किया है.
क़त्ल कर के मुझे कातिल ने बहुत हाँथ मले
जब उसने मेरे तडपने का तरीका देखा.
आनंद खामोश हो गए........
मुझे लगने लगा की शायद मैने गलत समय पर सवाल कर दिया...कितने खुश थे आज.
अचानक ...खामोशी टूटी.....ज्योति.... दिल पर कोई बोझ ना लेना. क्योंकि... तुमको सब कुछ पता है....जब डूबते को तिनके का सहारा मिला... वो तिनका तुम ही हो......तुमने उस वक़्त मेरा साथ दिया....जब सब कुछ बिखर गया था. अब मै अपने आप को इतना मसरूफ रखना चाहता हूँ...की अतीत की पर्छाइ भी अगर गुजरे तो मेरे पास उसको देखने का वक़्त ना हो.
ओह............ सूरज तो सर चढ़ आया.
दीदी..... काका की आवाज़.
आओ काका.....खाना लाये हो?
हाँ दीदी..... और बाबूजी कहाँ हैं...?
काका राम-राम....कैसे हो.
ठीक हूँ बेटा..... दीनानाथ तो तुम्हारे के गुण गा रहा हैं गाँव भर मे.
हाल चाल पूँछ कर आनंद बाहर चले गए...चुरुट पीने... मेरा अंदाज़ से ज्यादा यकीन.
वो क्या भला..... काका से मेरा सवाल....
अरे दीदी.... आप को नहीं पता....?
उसकी बिटिया .... अव्वल आई है जिले में.
हाँ वो तो पता है.....तो ?
अरे.... अपने बाबूजी ही तो पढ़ाते थे उसको.....
क्या..................????
मै चलता हूँ.... माँ जी ने कुछ सामान भी मंगवाया है बाज़ार से.
..........मै सवेरे - सवेरे से बैठीं हूँ......इतनी बात कर चुके आनंद....मिठाई... भी खा ली...लेकिन इस इंसान के मुँह से एक बार भी ना निकला......की उसको मै पढ़ाता था....... हे भगवान्......क्या इंसान हे ये. कोई गालियाँ दे तो सामने खडे हो के खा लेंगे....लेकिन तारीफ़ करे..... तो इधर-उधर बच निकलने का रास्ता ढूंढते हैं......
आनंद ....... तू मिले ना मिले, पर सलामत रहे, दूर ही से सही, तुझ से निस्बत रहे.
अरे वाह... आज तो दावत है......
आनंद....एक बात बोलूं..मानोगे?
तुम उपर कुर्सी पर बैठो....मै नीचे बैठ कर खाऊँगी.....
वो क्यों भला......आज इतना सम्मान किसलिए...?
मै कुछ स्वार्थी हो गयी थी.....इसलिए सिर्फ आनंद मै ही चाहती थी....लेकिन
आनंद तो सब का है.... और आनंद से है.
सब के आनंद मे ही मेरा आनंद है... और
मेरे आनंद के आनंद मे ही, मेरा आनंद है.
चल....पगली.
माँ.... मैं आनंद जी के घर जा रही हूँ....
सुन...... ये फल लेती जा....
लाओ.....और सुनो...मेरा खाना वहीं भिजवा देना....
मैं चल दी.....आज मन की सारी दुविधा दूर करने के लिए.
आनंद घर के बाहर ही मिल गए......बाग़ मे थे.....
क्या उखाड़ रहे हैं......
घास-पात.....जो काम की नहीं हो....उसको क्यों व्यर्थ बढने दें.....वो दूसरों का भी रास्ता रोकते हैं.
आनंद का पहला तीर.
तुम बैठो...मे १० मिनट मे आता हूँ.....और सुनो..खाली बैठ कर तो तुमको विचारों के पंख लग जाते हैं......इसलिए... अपने आप को चाय बनाने में व्यस्त कर सकती हो....
आनंद का फरमाइश करने का अंदाज ऐसा है....की मैं मना कर ही नहीं पाती... या कर नहीं सकती...पता नहीं.
आइये..... चाय... साहब के इंतज़ार में भाप बन कर उडती जा रही है......
जी.....लाइए.....महक तो दिलकश है...... अब पीकर भी देखली जाए....
आप.....
अरे, अरे.....गुस्सा ना होइए....खूबसूरत लड़कियों को गुस्सा नहीं करना चाहिए.....वो और ख़ूबसूरत लगती हैं.
क्या बात है.... आज सरकार.... बड़े मूड में हैं........
हाँ ... वो तो है.......दीनानाथ की बिटिया ...जिले मे 2nd आई है....दसवीं के इम्तेहान मे.
अरे वाह.....
अरे..... रसोई मे मिठाई रखी है .....लाओ तो. दीनानाथ दे गया था.
जी......मैं सोचने लगी.....आनंद इतने अच्छे मूड में हैं, इतने खुश हैं.....बात करूँ.....या ना करूँ....... चलो देखते हैं....
लो....खाओ. इस मिठाई की मिठास अलग है....इसमे रानी बिटिया के पसीने की महक है.....
माथे से पसीने की महक, आये ना जिसके
वो खून मेरे जिस्म में गर्दिश नहीं करता....
आप ने सवेरे - सवेरे कैसे दर्शन दिए....
आप के दर्शन के लिए आई हूँ......
अरे....वाह..... आप ने तो मुझे भगवान् बना दिया. अरे...मुझे इंसान ही रहने दो. लेकिन...कुछ कहना या पूंछना है तो झिझको मत....
आप को कैसे पता......की
ज्योति......कितने सालों से जानता हूँ तुमको..... बताओ.....उसके बाद भी अगर इतनी सी बात ना समझ सकूँ तो फिर.......
आप गुस्सा तो नहीं करोगे.......
आप से , या आप पर कभी गुस्सा किया है......इसका मतलब की आज....कुछ ना कुछ तो जरूर होना है, सामना आज उनसे होना है. ...... बोलो......
आप.....मुझसे शादी क्यों नहीं करना चाहते.....मेरा सीधा सवाल..... आनंद मेरी तरफ देखते रहे....
मैने आप को बताया की माँ-पिता जी मेरे लिए रिश्ता देख रहे हैं.....तभी भी आप ने कोई प्रतिक्रया नहीं दी. क्यों...? आप अकेले क्यों और कब तक रहना चाहते हैं......कब तक तो बाद मे...पहले क्यों का जवाब दीजिये....इतना हक तो मैं रखती हूँ....पूंछने का. और मुझे भैया जी वाला आनंद नहीं चाहिए, बाबूजी वाला आनंद नहीं चाहिएमुझे सर वाला आनंद नहीं चाहिए.... मुझे आनंद वाला आनंद चाहिए.....
हम्म्म्म..............तो आज रानी लक्ष्मीबाई आई हैं.
यही समझ लो.....
देखो... ज्योति, हर रिश्ते की एक मियाद होती है.....एक समय सीमा होती है. वो रिश्ता उसके बाद मर जाता है....सोल्हो आने ना सही लेकिन सच है. जब विवाह होता है.....तो एक निश्चित समय बाद घर मे दो लोग रह जाते हैं.... जिसको समाज पति-पत्नी का नाम देता है. नाम रह जाता है...इंसान मर जाते हैं. सम्मान खत्म हो जाता है.
पति...एक पति, एक पिता, एक बेटा, एक भाई.....और पत्नी... एक पत्नी, एक माँ, एक बहन और एक बेटी बन कर रह जाती है.....मैं ये नहीं कहता की मे सही हूँ......लेकिन, आजकल की जो ज़िन्दगी है ना...ज्योति... वो अपना टैक्स मांगती है. और उस टैक्स को भरते भरते .... कब लकडियाँ मिल गयीं, या कब कब्र नसीब हो गयी यही नहीं पता चलता. मै तुमको ....ज्योति की तरह ही देखना चाहता हूँ..... तुम्हारा अपना जो एक अस्तित्व है.....उसको तुम मिटाओ....या वो मिटे....मुझे गंवारा नहीं.
इसलिए..... तुमपर मेरा एक अधिकार है, या मुझ पर तुम्हारा एक अधिकार है.... और उसकी जो ख़ूबसूरती है.....वो ज्यादा जरूरी है. तुम को अच्छी तरह से ये ज्ञान है...की अगर तुम पर कभी कोई मुसीबत आये..... तो मै हूँ.....एक दोस्त. अगर कभी मेरी जरुरत हुई... तो मै हूँ.....
अगर हर आदमी और औरत आपकी तरह सोचने लगे तो कोई विवाह ही ना हो......
मुझे इस प्रश्न की उम्मीद थी. तुमने प्रश्न मुझसे किया..... और मैने अपनी सोच बताई. मै ये नहीं कहता सब मेरे तरह सोचते हों..... और संभव भी नहीं है.....तुम्हारे घर मे पांच लोग है..... उनसे इस विषय या किसी भी विषय मे राय लो....... पांच अलग-अलग राय मिलेंगी.
क्या आप किसी को प्रेम करते हैं......? मेरे पूर्व सोचे गए सवालों मे से ये आखरी सवाल.
कोई जवाब नहीं..... आज पहली बार आनंद को मैने अपने सामने इतना खामोश पाया.
क्या मै इस मौन को अपने प्रश्न की स्वीक्रति समझूँ.....?
ज्योति..... प्रेम....गूंगे का गुड़ है. मुझे ये नहीं पता की प्रेम क्या होता है... तो मै तुम्हारे सवाल का क्या उत्तर दूँ...? अगर कोई .... किसी का बिना वजह इंतज़ार करता है.....ना मिलने पर मन बैचैन होता है......जिस सिम्त भी नज़र उठ जाएँ....उसी का इंतज़ार लगे......पल पल अगर वो हो तो कैसा हो, ये सोचने लगे ..... तुझे बरबाद तो होना था खुमार, नाज़ कर नाज़ की उसने तुझे बर्बाद किया. अगर अपने बरबाद होने पर भी गुरूर होना... प्रेम है.... तो मैने प्रेम किया है.
क़त्ल कर के मुझे कातिल ने बहुत हाँथ मले
जब उसने मेरे तडपने का तरीका देखा.
आनंद खामोश हो गए........
मुझे लगने लगा की शायद मैने गलत समय पर सवाल कर दिया...कितने खुश थे आज.
अचानक ...खामोशी टूटी.....ज्योति.... दिल पर कोई बोझ ना लेना. क्योंकि... तुमको सब कुछ पता है....जब डूबते को तिनके का सहारा मिला... वो तिनका तुम ही हो......तुमने उस वक़्त मेरा साथ दिया....जब सब कुछ बिखर गया था. अब मै अपने आप को इतना मसरूफ रखना चाहता हूँ...की अतीत की पर्छाइ भी अगर गुजरे तो मेरे पास उसको देखने का वक़्त ना हो.
ओह............ सूरज तो सर चढ़ आया.
दीदी..... काका की आवाज़.
आओ काका.....खाना लाये हो?
हाँ दीदी..... और बाबूजी कहाँ हैं...?
काका राम-राम....कैसे हो.
ठीक हूँ बेटा..... दीनानाथ तो तुम्हारे के गुण गा रहा हैं गाँव भर मे.
हाल चाल पूँछ कर आनंद बाहर चले गए...चुरुट पीने... मेरा अंदाज़ से ज्यादा यकीन.
वो क्या भला..... काका से मेरा सवाल....
अरे दीदी.... आप को नहीं पता....?
उसकी बिटिया .... अव्वल आई है जिले में.
हाँ वो तो पता है.....तो ?
अरे.... अपने बाबूजी ही तो पढ़ाते थे उसको.....
क्या..................????
मै चलता हूँ.... माँ जी ने कुछ सामान भी मंगवाया है बाज़ार से.
..........मै सवेरे - सवेरे से बैठीं हूँ......इतनी बात कर चुके आनंद....मिठाई... भी खा ली...लेकिन इस इंसान के मुँह से एक बार भी ना निकला......की उसको मै पढ़ाता था....... हे भगवान्......क्या इंसान हे ये. कोई गालियाँ दे तो सामने खडे हो के खा लेंगे....लेकिन तारीफ़ करे..... तो इधर-उधर बच निकलने का रास्ता ढूंढते हैं......
आनंद ....... तू मिले ना मिले, पर सलामत रहे, दूर ही से सही, तुझ से निस्बत रहे.
अरे वाह... आज तो दावत है......
आनंद....एक बात बोलूं..मानोगे?
तुम उपर कुर्सी पर बैठो....मै नीचे बैठ कर खाऊँगी.....
वो क्यों भला......आज इतना सम्मान किसलिए...?
मै कुछ स्वार्थी हो गयी थी.....इसलिए सिर्फ आनंद मै ही चाहती थी....लेकिन
आनंद तो सब का है.... और आनंद से है.
सब के आनंद मे ही मेरा आनंद है... और
मेरे आनंद के आनंद मे ही, मेरा आनंद है.
चल....पगली.
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