देखिये मेरी बात का गलत मतलब मत निकालिए. . क्योंकि
सच्ची बात कही थी मैने , लोगो ने सूली पे चढ़ाया,
मुझको जहर का जाम पिलाया, फिर भी उनको चैन न आया.
मैं और मेरा दोस्त सुंदर लाल दोनों उस वर्ग में आते है, जो ये महसूस करते हैं कि ईश्वर ने अगर दुनिया में भेजा है तो कुछ करने के लिए ही भेजा होगा. न कि स्वार्थी की तरह अपने लिए जियो. वो तो जानवर भी करते हैं. हम सभी अपने चारो तरफ गलत होता हुआ देखते हैं, लेकिन जुबान खोलने से डरते हैं. जमाना बाहुबलियों का है. और अगर घर मे बीबी , बच्चे हैं तो हम नपुंसक बन जाते है. जानते हैं कि गलत है, फिर भी बर्दाशत करते है. आवाज़ उठाने से डरते हैं. इसलिए नहीं कि हम सब डरपोक हैं, बल्कि इसलिए कि कल घर पे गुंडों का सामना कौन करे.
आजकल तो गुंडे भी वर्दी मे घुमते हैं. कोई जात के नाम पर रोटिया सेंक रहा है, कोई भाषा के नाम पर. क्या आप मेरी बात से सहमत हैं? मुझको नहीं लगता कि भगवान् ने आदमी मे कोई भेदभाव रखकर उसको बनाया होगा. लेकिन हमने इंसान के साथ इंसानियत को मार डाला. मुझे याद आता है निदा फाजली साहब का एक शेर-
" हिंदु भी मजे मैं हैं, मुसल्मा भी मजे मे,
इंसान परेशान है, यहाँ भी , वहां भी. "
मुझको गुस्से के साथ साथ तरस भी आता है उनलोगों पे, जो इन राजनितिज्ञो के हाँथ का खिलौना बन कर खेलते हैं. कोई राम के नाम पर लड़ता है और तो कोई रहीम के नाम पर और मजे कि बात ये हैं कि उसके बाद उपदेश भी देते हैं कि सब का मालिक एक. और हम सब सुनते भी हैं, तालियाँ भी बजाते है. क्यों नहीं हम उन पर जूता फेंकने कि हिम्मत रखते ? ऐसा हम सब के साथ होता है कि कोई दुर्घटना देखते है तो वहां से बच कर निकलने कि सोचते है, क्यों ????? क्योंकि पुलिस का सामना कौन करे. पुलिस वालों कि गन्दी जुबान कौन सुने? अपनी इज्ज़त अपने हाँथ, और इसीलिए वहां से बच निकालने मे ही हम अपनी भलाई समझते हैं. और भलाई है ही उसमे. कोई आरुशी मरती है तो हम को उसमे अपनी बेटी नज़र नहीं आती. कोई रुचिका अपमानित होकर आत्महत्या कर लेती है, हम बेचारी कह कर चुप हो जाते है. क्या हो गया हम सब को ??????? एक लड़की का बलात्कार होता है और उसके बचाव मे वकील खडा हो जाता है. मुझे तो शर्म आती उस वकील पे.
" शहर मे हादसों के लोग आदी हो गए, एक जगह एक लाश थी और कोई हंगामा न था.
दुश्मनी और दोस्ती पहले भी होती थी मगर, इसकदर माहौल का माहौल जहरीला न था.
कब तक हम ये सब देखकर चुप रहंगे. क्या हम सब के अंदर अंतरात्मा मर गयी. क्या हम सिर्फ चार दीवारी को ही अपना घर मानते रहंगे ?? क्या हम इन सब से बाहर आना नहीं चाहते या बाहर आने से डरते हैं. किसी न किसी को तो ये बीड़ा उठाना ही पडेगा. कब तक हम दूसरे की तरफ देखंगे ????
झूठी सच्ची आस पे जीना, कब तक आखिर आखिर कब तक,
मय की जगह खूने दिल पीना, कब तक आखिर, आखिर कब तक.
सोचा है अब पार उतरंगे, या टकरा कर डूब मरेंगे ,
तूफानों कि ज़द पे सफीना, कब तक आखिर , आखिर कब तक.
मेरे दोस्तों, एक बार अपने आप से हम सभी को पूछना पड़ेगा, क्या हम ज़िंदा हैं ?? क्या हमारे सीने मे दिल है ?? दिल है तो दूसरे की तकलीफ में रोता क्यों नहीं ?? अगर हम ज़िंदा हैं तो हम में प्रतिक्रया क्यों नहीं होती ????
मै अपने आप को अपने उन सभी भाइयों और बहनों को समर्पित करता हूँ, जो मेरी सेवा लेना चाहे.
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है, कि ये सूरत बदलनी चाहिए.
तेरे सीने मे नहीं, तो मेरे सीने सही, हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए.
आएये, आप का स्वागत है. जो घर फूंके आपना, चले हमारे साथ....................
Wednesday, March 3, 2010
Tuesday, March 2, 2010
गुमशुदा की तलाश
माँ............ आज फिर पापा लेट आयेंगे क्या? बिटिया ने पूंछा।
मैं क्या बताऊँ.... वो मुझ से कह के गए नहीं हैं। एक ठंडा सा जवाब मिला माँ से।
मेरा इतना सारा होम वर्क पड़ा है और पापा का कुछ पता नहीं। बिटिया की शिकायत थी।
तुम को अपने होम वर्क कि चिंता है, यहाँ घर के सारे काम लटक रहे हैं, लेकिन साहब को जब घर के बारे मैं सोचने का वक़्त मिले तभी तो। उनको तो दुनिया कि ज्यादा चिंता है अपने घर में चाहे आग लगी हो। एक विश्लेषक आलोचना।
आप सोच रहे होंगे कि अब ये क्या शुरू कर दिया मैने। घर कि बाते भी मैं ब्लॉग पे लिखने लगा। नहीं ऐसा कुछ नहीं है। ये मेरे मित्र सुंदर लाल के घर का छोटा सा दृश्य है। और ये रोज़ का है। मै सुंदर लाल को अच्छी तरह जानता हूँ, समझता हूँ। लेकिन, सुंदर लाल को एक पिता कि तरह उसकी बेटियाँ जानती हैं, पति के रूप मे उसकी पत्नी जानती है, लेकिन सुंदर लाल को सुंदर लाल के रूप मे कोई नहीं जानता और न ही कोई जानना चाहता है। वक़्त किस के पास है जो इंसान को इंसान के रूप मे समझे। कोई पति, कोई पिता, कोई दोस्त, कोई पेप्सी के प्लास्टिक के ग्लास कि तरह होता है। इंसान बचा कहाँ है। बेचारा सुंदर लाल। वो तो एक रोबोट बन गया।
" चमकते चाँद को टूटा हुआ तारा बना डाला।
मेरी आवारगी ने मुझको क्या से क्या बना डाला"।
कल मिला था सुंदर लाल, हंस रहा था। मैने पूंछा क्या बात है भाई, बड़े खुश हो। तो एक दार्शनिक कि तरह जवाब दिया- मैं तो हर वक़्त हंसता हूँ, यार। कभी हालात पर और कभी खुद पर। भाई, रोने से फायदा क्या। कौन समझता है यहाँ पर। सब अपना अपना काम निकालते हैं। मेरी बेजुबान आँखों से जो गिरे हैं चंद कतरे, जो समझ सको तो आंसू, न समझ सको तो पानी। ड्यूटी - ड्यूटी-ड्यूटी- यही तो जिन्दगी है। जज़्बातों की कद्र कहाँ होती है बाज़ार मे। मैं सुंदर लाल का मुहं देखता रहा। वो एक दार्शनिक की तरह बोलता ही जा रहा था। जैसे कोई बाँध टूट रहा हो। मैं भी चुप था, और सुंदर लाल को, सुंदर लाल की तरह महसूस करने कि कोशिश कर रहा था।
"बहुत गहरी चोट लगी है ", मैने पूंछा। वो मेरी तरफ घुमा, कुछ देर तक मेरी आँखों मे आंखे डालकर देखता रहा, फिर मुस्करा कर बोला " कुछ तो नाज़ुक मिजाज हैं हम भी, और ये चोट भी नई है अभी" , मैने कहा, यार, शेर सुना कर कब तक अपने आप को छुपाते रहोगे" बोलो मेरे भाई बोलो, ये जमाना समझता नहीं है, सुनता है, और वो भी सिर्फ वो बातें जो उसके मतलब की होती हैं।
सुंदर लाल ने जवाब दिया - बड़े भाई, अगर हम भी आम लोगो जैसे बन जायें , तो क्या फर्क है उनमे और मुझमे. मुझे तकलीफ कम और आश्चर्य ज्यादा है. क्योंकि लोग ऐसे भी होते हैं, ये किताबो में पढ़ा था, पहली बार सामना हुआ. मजा आता हैं उन लोगो का सामना करने मे. जिनकी खातिर कभी इलज़ाम उठाये हमने, वही पेश आए हैं इन्साफ के शाहों कि तरह. जब चोट उनसे लगती है जिनसे उम्मीद हो, तो तकलीफ कम होती है। लेकिन जब चोट उनसे लगती है, जो "अपने" हो , तो दर्द बर्दाश्त के बाहर हो जाता है। और रही बात जमाने कि तो सुनो जमाने कि चिन्ता मैने कभी नहीं की. हाँ इतना जरूर सीख लिया कि वो कौन से लोग होते हैं जो चोट खा कर भी दुआ ही देते हैं, कि खुश रहो. में तो उनको इतना ही कहता हूँ, कि " आओ सिकंदर -ऐ - हुनर आजमाए, तुम तीर आज़माना, हम जिगर आजमाए।"
सुंदर लाल मुझे अपने जीवन का दर्शन समझा कर और झूठा बहाना बना कर की जरूरी काम है, चला गया. मैं वही खड़ा खड़ा सोचता रहा, कि ये आदमी किस मिट्टी का बना है. जिनसे चोट खाता , उन्हीं से जा कर पूंछता है- कोई तकलीफ तो नहीं हुई आप को. और अभी कुछ दिन पहले ही तो उसका दिल टूटा.............
Friday, February 26, 2010
मैं कहूंगा तो रूठ जाओगे.....
यहाँ हर शख्स हर पल हादसा होने से डरता है,
खिलौना है जो मिटटी का, फ़ना होने से डरता है.
मेरे दिल के किसी कोने एक मासूम सा बच्चा,
बड़ो को देख कर दुनिया में, बड़ा होने से डरता है.
न बस मे जिन्दगी उसके, न काबू मौत पर उसका,
मगर इंसान फिर भी कब खुदा होने से डरता है.
अजब ये जिन्दगी कि कैद है, दुनिया का हर इंसा,
रिहाई माँगता है, और रिहा होने से डरता है.
Thursday, February 25, 2010
जय रघुनन्दन, जय सिया राम.....
ब्लोग्वानी के सभी पाठको को देवतोष का नमस्कार। साथियों मुझ से थोड़ी दूर ही रहे। मै दिल का इस्तेमाल ज्यादा करता हूँ, आम आदमी दिमाग का इस्तेमाल ज्यादा करता है। वो लोग सफल हैं और मैं खुश हूँ। मुझे याद आता है वसीम बरेलवी साहब का एक शेर " झूठ वाले कहीं से कहीं बढ़ गए, और मै था कि सच बोलता रह गया"। मेरे अब्बा हुज़ूर मुझे सीखा के गए कि दिमाग मतलब की बात करता है , लेकिन दिल हमेशा सच बोलता है। अगर खुश रहना है तो दिल कि सुनो। खुश रहने के साथ साथ सफल होना भी तो जरूरी है , सफल मतलब- गाड़ी, बंगला, रूतबा, पैसा और अंग्रेजी।
मेरा दिल बोलता बहुत है और मेरे हर निर्णय, हर बात मे टांग अड़ाता है इसीलिये मैं पीछे रह जाता हूँ। मैं दिल की सुनता हूँ और बाद मे चोट का दर्द महसूस करता हूँ। और कमबख्त फिर भी नहीं सीखता हूँ। तुरंत दिल आड़े आ जाता है, कि देवतोष, जो उसका स्तर था, उसने उस स्तर से काम किया, तुम अपना स्तर क्यों छोड़ रहे हो। देखा फिर मैं पीछे रह गया। अरे भाई " जिस के आगन मे अमीरी का शजर लगता है, उनका हर एब भी लोगो को हुनर लगता है"।
जय हो सुंदर लाल, बिना तुम्हारे तो मेरी कोई बात पूरी नहीं होती। अब तुम ही बताओ, कि इस दिल और दिमाग कि लड़ाई मै किस का साथ दूँ? अगर दिल का साथ नहीं देता तो लगता है कि खुद से बिछुड़ रहा हूँ और अगर दिमाग के हांथो बिका तो लगता है कि खुद को बेच दिया। मैं तो अख़लाक़ के हांथो ही बिका करता हूँ, वो और होंगे तेरे बाज़ार मे बिकने वाले। जब दुनिया को देखता हूँ तो खुद पे शर्म सी आती है। और कभी कभी तो सोचने पे मजबूर हो जाता हूँ कि क्या मेरे वालिद हुज़ूर मुझे सही सिखा के गए या गलत। क्योंकि भाई देखो , ईमानदारी से दो टाइम कि रोटी चल जाये वही बहुत है। उपर से आयकर......
अब कम से कम इस बात पे मेरा साथ दो, मेरे दोस्तों, कि मिला किसी को है क्या, सोचिए ये अमीरी से, दिल के शाह तो अक्सर फ़कीर होते है। और फकीरों से कौन दोस्ती करे। दुनिया माल की बात करती है और फ़कीर मौला की। दुनिया को जर और जोरू से फुरसत नहीं, फ़कीर को इसमे कोई दिलचस्पी नहीं। भाई इस्तेमाल करो और आगे बढ़ो।
कौन होता है यहाँ किसी का उमर भर के लिए,
लोग तो जनाज़े मे भी कंधा बदलते रहते हैं।
कोई शक ? सुंदर लाल
मेरा दिल बोलता बहुत है और मेरे हर निर्णय, हर बात मे टांग अड़ाता है इसीलिये मैं पीछे रह जाता हूँ। मैं दिल की सुनता हूँ और बाद मे चोट का दर्द महसूस करता हूँ। और कमबख्त फिर भी नहीं सीखता हूँ। तुरंत दिल आड़े आ जाता है, कि देवतोष, जो उसका स्तर था, उसने उस स्तर से काम किया, तुम अपना स्तर क्यों छोड़ रहे हो। देखा फिर मैं पीछे रह गया। अरे भाई " जिस के आगन मे अमीरी का शजर लगता है, उनका हर एब भी लोगो को हुनर लगता है"।
जय हो सुंदर लाल, बिना तुम्हारे तो मेरी कोई बात पूरी नहीं होती। अब तुम ही बताओ, कि इस दिल और दिमाग कि लड़ाई मै किस का साथ दूँ? अगर दिल का साथ नहीं देता तो लगता है कि खुद से बिछुड़ रहा हूँ और अगर दिमाग के हांथो बिका तो लगता है कि खुद को बेच दिया। मैं तो अख़लाक़ के हांथो ही बिका करता हूँ, वो और होंगे तेरे बाज़ार मे बिकने वाले। जब दुनिया को देखता हूँ तो खुद पे शर्म सी आती है। और कभी कभी तो सोचने पे मजबूर हो जाता हूँ कि क्या मेरे वालिद हुज़ूर मुझे सही सिखा के गए या गलत। क्योंकि भाई देखो , ईमानदारी से दो टाइम कि रोटी चल जाये वही बहुत है। उपर से आयकर......
अब कम से कम इस बात पे मेरा साथ दो, मेरे दोस्तों, कि मिला किसी को है क्या, सोचिए ये अमीरी से, दिल के शाह तो अक्सर फ़कीर होते है। और फकीरों से कौन दोस्ती करे। दुनिया माल की बात करती है और फ़कीर मौला की। दुनिया को जर और जोरू से फुरसत नहीं, फ़कीर को इसमे कोई दिलचस्पी नहीं। भाई इस्तेमाल करो और आगे बढ़ो।
कौन होता है यहाँ किसी का उमर भर के लिए,
लोग तो जनाज़े मे भी कंधा बदलते रहते हैं।
कोई शक ? सुंदर लाल
Wednesday, February 24, 2010
मैं आप अपनी तलाश में हूँ.......
मेरी खामोशियों में भी फसाने ढूंढ लेती है,
बड़ी शातिर है ये दुनिया, बहाने ढूंढ लेती है।
कौन....... अरे... सुंदर लाल, मेरे भाई, अंदर आ जाओ। हाँ भाई, तबियत ठीक नहीं है, पिछले कुछ दिनों से। नहीं भाई चिंता करने वाली बीमारी नहीं है, मौसम का मिजाज़ बदल रहा है, थोड़ी बहुत ठण्ड लग गयी है। थोड़ी लालटेन कि रौशनी बढ़ा दो। बिजली का बिल पे नहीं किया तो बिजली वाले खफा हो गए। आजकल खफा हो जाना बड़ा आसान है। खैर ....... जाने दो। तुम बताओ कैसे आना हुआ।हाँ.... तुमने बताया तो था। मैं ही भूल गया। जब से खोया गया है दिल अपना, चीज़ रखता हूँ, भूल जाता हूँ। एक लेख लिख रहा हूँ आजकल। तुम हँसना मत। नहीं, भाई अब मे वक़्त के उपर और लोगो के उपर नहीं लिखता। पिछली बार जब से तुम ने टोका था, मै सोच रहा था और मुझे ये लगा कि सबसे रोचक विषय तो मै खुद ही हूँ, क्यों न अपने उपर लिखूं ..... दुसरो के उपर लिखने से क्या फायदा। भाई सुंदर लाल, मुझे भगवान् से कोई शिकायत अगर है तो सिर्फ इतनी है कि जब मुझे इस दुनिया में भेजा तो दिल क्यों दिया। क्योंकि यहाँ तो " हर धडकते हुए पत्थर को दिल समझते हैं, उमर बीत जाती है, दिल को दिल बनाने में "। तो मुझ को भी दिल को दिल बनाने का टाइम तो दिया होता। अपनी तरफ से दिल डाल के मुझे भेजना ही था, तो इंसानों के बीच में भेजना था। व्यापारियों के बीच में क्यों भेज दिया। लेकिन सुंदर लाल, जो भी मिलता है फरिश्तो कि तरह मिलता है, क्या तेरे शहर मे, इंसान नहीं हैं कोई। अरे... भाई मुझे फरिश्तो और परियों के बीच रहने की आदत नहीं है। मैं तो ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ, " या धरती के ज़ख्मो पर मरहम रख दे, या मेरा दिल पत्थर कर दे .....या अल्लाह...."। अच्छा.... मेरे जैसे लोगो को भगवान् दिल लगाने कि पूरी सजा देता है, और उन्ही के हांथो देता है, जिस से दिल लगाया। लेकिन ये सजा भी किस्मत वालों को मिलती है। जहाँ तक सजा कि बात है , मेरी तकदीर काफी बुलंद है।" दोस्तों से इस कदर सदमे उठाये जान पर, दिल से दुश्मन की अदावत का गिला जाता रहा". मैं एक लड़ाई लड़ रहा हूँ। औरो से नहीं भाई, अपने आप से। " हकीकत जिद किये बैठी है, चकनाचूर करने को, मगर मेरी आँख फिर सपना सुहाना ढूंढ लेती है।" वक़्त कह रहा है , कि अपने आप को बदलो, और जैसे और लोग है, वैसे तुम भी बनो। मगर माँ-बाप कि सीख फिर आड़े आ जाती है। कि जो वक़्त के साथ रंग बदलते हो, वो गिरगिट की तरह होते है। चट्टान की तरह बनो। बड़ी बड़ी लहरे भी चट्टान को तोड़ नहीं पाती है, बल्कि उस से टकराकर टूट जाती हैं, बिखर जाती हैं। विश्वास करो तो जम कर करो, नहीं तो मत करो। ये बीच का रास्ता मत अपनाओ । जैसा मौका , वैसा रूप, ये तरीका मुझे पसंद हैं, सुंदर लाल। जब तूफ़ान आता है तभी तो वक़्त होता है अपने अंदर के लोहे को जांचने का, अपने आप को परखने का। और जो प्यार करते है, उनका तो वक़्त हर मोड़ पे इम्तेहान लेता है। वही तो समय होता है, अपने आप को साबित करने का, अपने दिए हुए वचन और वादों को निभाने का, न कि हाँथ छोड़ देने। अरे बहाव के साथ तो हर आदमी तैरता है, हो बहाव के विरुद्ध तैर सके वही तो इंसान है। खैर.... ये बातें झूठी बातें हैं, ये लोगो ने फैलाई है। जब अपने उपर आंच आती है, तो जानवर भी बचता है। वो लोग किताबो और सिनेमा में ही होते "जो कह दिया , सो कह दिया"। प्राण जाए पर वचन न जाए। हंसो मत.... यार। मैं अपने आप से वैसे ही लड़ रहा हूँ, तुम मेरी बातो पे और हंस रहे हो। मुझे बिलकुल ऐसा लग रहा है, जैसे वक़्त मेरे अंदर सागर मंथन चल रहा , देखते हैं विष निकलता है या अमृत। सुंदर लाल, जरा एक गिलास पानी दे दो। प्यास लगी है। क्या कहा, रात बहुत बीत गयी..... अच्छा है भाई, सन्नाटे में कलम खूब चलती है। और मैं अपने आप से मिल तो सकता हूँ। तुम्हारे शहर में ये शोर सुन कर तो लगता है, कि इंसानों के जंगल में कोई हांका हुआ होगा। सुनो.... अगर उनसे मुलाक़ात हो, तो कहना में ठीक हूँ। मेरी चिंता न करे।
बड़ी शातिर है ये दुनिया, बहाने ढूंढ लेती है।
कौन....... अरे... सुंदर लाल, मेरे भाई, अंदर आ जाओ। हाँ भाई, तबियत ठीक नहीं है, पिछले कुछ दिनों से। नहीं भाई चिंता करने वाली बीमारी नहीं है, मौसम का मिजाज़ बदल रहा है, थोड़ी बहुत ठण्ड लग गयी है। थोड़ी लालटेन कि रौशनी बढ़ा दो। बिजली का बिल पे नहीं किया तो बिजली वाले खफा हो गए। आजकल खफा हो जाना बड़ा आसान है। खैर ....... जाने दो। तुम बताओ कैसे आना हुआ।हाँ.... तुमने बताया तो था। मैं ही भूल गया। जब से खोया गया है दिल अपना, चीज़ रखता हूँ, भूल जाता हूँ। एक लेख लिख रहा हूँ आजकल। तुम हँसना मत। नहीं, भाई अब मे वक़्त के उपर और लोगो के उपर नहीं लिखता। पिछली बार जब से तुम ने टोका था, मै सोच रहा था और मुझे ये लगा कि सबसे रोचक विषय तो मै खुद ही हूँ, क्यों न अपने उपर लिखूं ..... दुसरो के उपर लिखने से क्या फायदा। भाई सुंदर लाल, मुझे भगवान् से कोई शिकायत अगर है तो सिर्फ इतनी है कि जब मुझे इस दुनिया में भेजा तो दिल क्यों दिया। क्योंकि यहाँ तो " हर धडकते हुए पत्थर को दिल समझते हैं, उमर बीत जाती है, दिल को दिल बनाने में "। तो मुझ को भी दिल को दिल बनाने का टाइम तो दिया होता। अपनी तरफ से दिल डाल के मुझे भेजना ही था, तो इंसानों के बीच में भेजना था। व्यापारियों के बीच में क्यों भेज दिया। लेकिन सुंदर लाल, जो भी मिलता है फरिश्तो कि तरह मिलता है, क्या तेरे शहर मे, इंसान नहीं हैं कोई। अरे... भाई मुझे फरिश्तो और परियों के बीच रहने की आदत नहीं है। मैं तो ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ, " या धरती के ज़ख्मो पर मरहम रख दे, या मेरा दिल पत्थर कर दे .....या अल्लाह...."। अच्छा.... मेरे जैसे लोगो को भगवान् दिल लगाने कि पूरी सजा देता है, और उन्ही के हांथो देता है, जिस से दिल लगाया। लेकिन ये सजा भी किस्मत वालों को मिलती है। जहाँ तक सजा कि बात है , मेरी तकदीर काफी बुलंद है।" दोस्तों से इस कदर सदमे उठाये जान पर, दिल से दुश्मन की अदावत का गिला जाता रहा". मैं एक लड़ाई लड़ रहा हूँ। औरो से नहीं भाई, अपने आप से। " हकीकत जिद किये बैठी है, चकनाचूर करने को, मगर मेरी आँख फिर सपना सुहाना ढूंढ लेती है।" वक़्त कह रहा है , कि अपने आप को बदलो, और जैसे और लोग है, वैसे तुम भी बनो। मगर माँ-बाप कि सीख फिर आड़े आ जाती है। कि जो वक़्त के साथ रंग बदलते हो, वो गिरगिट की तरह होते है। चट्टान की तरह बनो। बड़ी बड़ी लहरे भी चट्टान को तोड़ नहीं पाती है, बल्कि उस से टकराकर टूट जाती हैं, बिखर जाती हैं। विश्वास करो तो जम कर करो, नहीं तो मत करो। ये बीच का रास्ता मत अपनाओ । जैसा मौका , वैसा रूप, ये तरीका मुझे पसंद हैं, सुंदर लाल। जब तूफ़ान आता है तभी तो वक़्त होता है अपने अंदर के लोहे को जांचने का, अपने आप को परखने का। और जो प्यार करते है, उनका तो वक़्त हर मोड़ पे इम्तेहान लेता है। वही तो समय होता है, अपने आप को साबित करने का, अपने दिए हुए वचन और वादों को निभाने का, न कि हाँथ छोड़ देने। अरे बहाव के साथ तो हर आदमी तैरता है, हो बहाव के विरुद्ध तैर सके वही तो इंसान है। खैर.... ये बातें झूठी बातें हैं, ये लोगो ने फैलाई है। जब अपने उपर आंच आती है, तो जानवर भी बचता है। वो लोग किताबो और सिनेमा में ही होते "जो कह दिया , सो कह दिया"। प्राण जाए पर वचन न जाए। हंसो मत.... यार। मैं अपने आप से वैसे ही लड़ रहा हूँ, तुम मेरी बातो पे और हंस रहे हो। मुझे बिलकुल ऐसा लग रहा है, जैसे वक़्त मेरे अंदर सागर मंथन चल रहा , देखते हैं विष निकलता है या अमृत। सुंदर लाल, जरा एक गिलास पानी दे दो। प्यास लगी है। क्या कहा, रात बहुत बीत गयी..... अच्छा है भाई, सन्नाटे में कलम खूब चलती है। और मैं अपने आप से मिल तो सकता हूँ। तुम्हारे शहर में ये शोर सुन कर तो लगता है, कि इंसानों के जंगल में कोई हांका हुआ होगा। सुनो.... अगर उनसे मुलाक़ात हो, तो कहना में ठीक हूँ। मेरी चिंता न करे।
Tuesday, February 23, 2010
मेरे खुदा, मेरे मौला.............
वो फिराक हो, या विसाल हो, तेरी याद महकेगी एक दिन ,
वो गुलाब बन के खिलेगा क्या, जो चिराग बन के जला न हो.
कभी धूप दे कभी बदलियाँ , दिल-ओ-जान से दोनों क़ुबूल हैं.
मगर उस नज़र में न क़ैद कर , जहाँ जिन्दगी कि हवा न हो।
वो गुलाब बन के खिलेगा क्या, जो चिराग बन के जला न हो.
कभी धूप दे कभी बदलियाँ , दिल-ओ-जान से दोनों क़ुबूल हैं.
मगर उस नज़र में न क़ैद कर , जहाँ जिन्दगी कि हवा न हो।
Monday, February 22, 2010
मैं आप अपनी तलाश मैं हूँ....
मेरी खामोशियों में भी फसाने ढूंढ लेती है,
बड़ी शातिर है ये दुनिया, बहाने ढूंढ लेती है।
कौन....... अरे... सुंदर लाल, मेरे भाई, अंदर आ जाओ।हाँ भाई, कुछ तबियत ठीक नहीं है, पिछले कुछ दिनों से। नहीं भाई चिंता करने वाली बीमारी नहीं है, मौसम का मिजाज़ बदल रहा है, थोड़ी बहुत ठण्ड लग गयी है। थोड़ी लालटेन कि रौशनी बढ़ा दो। बिजली का बिल पे नहीं किया तो बिजली वाले खफा हो गए। आजकल खफा हो जाना बड़ा आसान है। खैर ....... जाने दो। तुम बताओ कैसे आना हुआ।
हाँ.... तुमने बताया तो था। मैं ही भूल गया। जब से खोया गया है दिल अपना, चीज़ रखता हूँ, भूल जाता हूँ। एक लेख लिख रहा हूँ आजकल। तुम हँसना मत। नहीं, भाई अब मे वक़्त के उपर और लोगो के उपर नहीं लिखता। पिछली बार जब से तुम ने टोका था, मै सोच रहा था और मुझे ये लगा कि सबसे रोचक विषय तो मै खुद ही हूँ, क्यों न अपने उपर लिखूं ..... दुसरो के उपर लिखने से क्या फायदा। भाई सुंदर लाल, मुझे भगवान् से कोई शिकायत अगर है तो सिर्फ इतनी है कि जब मुझे इस दुनिया मै भेजा तो दिल क्यों दिया। क्योंकि यहाँ तो " हर धडकते हुए पत्थर को दिल समझते हैं, उमर बीत जाती है, दिल को दिल बनाने मैं"। तो मुझ को भी दिल को दिल बनाने का टाइम तो दिया होता। पानी तरफ से दिल डाल के मुझे भेजना ही था, तो इंसानों के बीच मै भेजना था। व्यापारियों के बीच मे क्यों भेज दिया।
लेकिन सुंदर लाल, जो भी मिलता है फरिश्तो कि तरह मिलता है, क्या तेरे शहर मे, इंसान नहीं हैं कोई। अरे... भाई मुझे फरिश्तो और परियों के बीच रहने कि आदत नहीं है। मे तो ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ, " या धरती के ज़ख्मो पर मरहम रख दे, या मेरा दिल पत्थर कर दे या अल्लाह...."। अच्छा.... मेरे जैसे लोगो को भगवान् दिल लगाने कि पूरी सजा देता है, और उन्ही के हांथो देता है, जिस से दिल लगाया। लेकिन ये सजा भी किस्मत वालों को मिलती है। जहाँ तक सजा कि बात है , मेरी तकदीर काफी बुलंद है।
" दोस्तों से इस कदर सदमे उठाएय जान पर, दिल से दुश्मन कि अदावत का गिला जाता रहा"। मे एक लड़ाई लड़ रहा हूँ। ओरो से नहीं भाई, अपने आप से। " हकीकत जिद किये बैठी है, चकनाचूर करने को, मगर मेरी आँख फिर सपना सुहाना ढूंढ लेती है।" वक़्त कह रहा है , कि अपने आप को बदलो, और जैसे और लोग है, वैसे तुम भी बनो। मगर माँ-बाप कि सीख फिर आड़े आ जाती है। कि जो वक़्त के साथ रंग बदलते हो, वो गिरगिट कि तरह होते है। चट्टान कि तरह बनो। बड़ी बड़ी लहरे भी चट्टान को तोड़ नहीं पाती है, बल्कि उस से टकराकर टूट जाती हैं, बिखर जाती हैं। विश्वास करो तो जम कर करो, नहीं तो मत करो। ये बीच का रास्ता मत अपनाओ । जैसा मौका , वैसा रूप, ये तरीका मुझे पसंद हैं, सुंदर लाल।
जब तूफ़ान आता है तभी तो वक़्त होता है अपने अंदर के लोहे को जांचने का, अपनी आप को परखने का। और जो प्यार करते है, उनका तो वक़्त हर मोड़ पे इम्तेहान लेता है। वही तो समय होता है, अपने आप को साबित करने का, अपने दिए हुए वचन और वादों को निभाने का, न कि हाँथ छोड़ देने। अरे बहाव के साथ तो हर आदमी तैरता है, हो बहाव के विरुद्ध तैर सके वही तो इंसान है।
खैर.... ये बातें झूठी बातें हैं, ये लोगो ने फैलाई है। जब अपने उपर आंच आती है, तो जानवर भी बचता है। वो लोग किताबो और सिनेमा मे ही होते "जो कह दिया , सो कह दिया"। प्राण जाए पर वचन न जाए। हंसो मत.... यार। मैं अपने आप से वैसे ही लड़ रहा हूँ, तुम मेरी बातो पे और हंस रहे हो। मुझे बिलकुल ऐसा लग रहा है, जैसे वक़्त मेरे अंदर सागर मंथन चल रहा , देखते हैं विष निकलता है या अमृत।
सुंदर लाल, जरा एक गिलास पानी दे दो। प्यास लगी है। क्या कहा, रात बहुत बीत गयी..... अच्छा है भाई, सन्नाटे मैं कलम खूब चलती है। और मे अपने आप से मिल तो सकता हूँ। तुम्हारे शहर में ये शोर सुन कर तो लगता है,कि इंसानों के जंगल में कोई हांका हुआ होगा। सुनो.... अगर उनसे मुलाक़ात हो, तो कहना मे ठीक हूँ। मेरी चिंता न करे।
Subscribe to:
Posts (Atom)